मुंबई: बंबई उच्च न्यायालय ने मंगलवार को 2014 के एक मुकदमे को खारिज कर दिया, जिसमें दाऊदी बोहरा समुदाय के नेता के तौर पर सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन की नियुक्ति को चुनौती दी गई थी।
न्यायमूर्ति गौतम पटेल की एकल पीठ ने कहा, ‘‘अदालत ने केवल सबूत के मुद्दे पर फैसला किया है, आस्था पर नहीं।’’
उन्होंने शुरू में खुजैमा कुतबुद्दीन द्वारा दायर मुकदमे को खारिज कर दिया। कुतबुद्दीन ने अपने भाई और तत्कालीन सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन का जनवरी 2014 में 102 साल की आयु में निधन होने के बाद यह वाद दाखिल किया था। बुरहानुद्दीन के दूसरे बेटे मुफद्दल सैफुद्दीन ने तब सैयदना का पद संभाला था।
साल 2016 में कुतबुद्दीन के निधन के बाद उनके बेटे ताहिर फखरुद्दीन ने मुकदमे को आगे बढ़ाया और दावा किया कि उनके पिता ने उन्हें अधिकार दिया था।
इस मामले में अदालत से सैफुद्दीन को सैयदना के रूप में काम करने से रोकने का अनुरोध किया गया था।
कुतबुद्दीन ने अपने मुकदमे में दावा किया था कि उनके भाई बुरहानुद्दीन ने उन्हें माजून (दूसरे नंबर का अधिकारी) नियुक्त किया था और 10 दिसंबर, 1965 को माजून की घोषणा से पहले एक गुप्त ‘नास’ (उत्तराधिकार का चुनाव) के माध्यम से उन्हें निजी तौर पर अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था।
फखरुद्दीन ने दावा किया कि उनके पिता ने निधन से पहले उन्हें इस पद पर नियुक्त किया था।
न्यायमूर्ति पटेल ने मुकदमे को खारिज करते हुए कहा, ‘‘मैं कोई उथल-पुथल की स्थिति नहीं चाहता।
मैंने फैसले को यथासंभव तटस्थ रखा है। मैंने केवल साक्ष्य के मुद्दे पर फैसला सुनाया है, आस्था पर नहीं।’’
दाऊदी बोहरा समाज शिया मुसलमानों में एक धार्मिक पंथ है।
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