देश की आजादी का गवाह- फांसी टुंगरी [Witness of the country’s independence – Hanged Tungri]

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जब 14 अगस्त की आधी रात सैकड़ों लोग पहुंच गए थे रांची के पहाड़ी मंदिर

रांची। रांची का पहाड़ी मंदिर धार्मिक मान्यताओं के लिए बेहद प्रसिद्ध है। भक्त दूर-दराज से यहां शिव जी के दर्शन के लिए आते करते हैं।

पर बहुत कम लोग जानते हैं कि रांची का पहाड़ी मंदिर देश के स्वतंत्रता संग्राम और देशभक्तों के बलिदान के लिए भी जाना जाता है।

इस मंदिर की छांव में स्वतंत्रता सेनानियों ने कई महत्वपूर्ण बैठकें की और यहां उनकी बहादुरी और बलिदान की गूंज सुनाई देती है।

क्रूर अंग्रेज स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाने वाले वीरों को पहाड़ी मंदिर में फांसी की सजा देते थे। इसलिए पहाड़ी मंदिर को फांसी टुंगरी के नाम से भी जाना जाता है।

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि रांची का पहाड़ी मंदिर देश का इकलौता मंदिर है, जहां 1947 से हर स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है।

इस परंपरा की शुरुआत 14 अगस्त 1947 से शुरू हुई थी। 14 अगस्त की आधी रात को मांदर और कुर्सी की थाप पर स्वतंत्रता सेनानियों ने पहली बार पहाड़ी मंदिर पर तिरंगा झंडा फहराया था।

उनकी अगुवाई कर रहे थे कृष्ण चंद्र दास। लोग बताते हैं कि उस रात चुटिया से सैकड़ों की संख्या में लोग आजादी के नारे लगाते हुए पहाड़ी मंदिर पहुंचे थे।

रांची का पहाड़ी मंदिर उन वीरों की गाथाओं का साक्षी है, जिन्होंने स्वतंत्रता की राह में अपने प्राणों की आहुति दी। रांची का पहाड़ी मंदिर एक ऐसा स्थल है जहाँ इतिहास, धर्म, और राष्ट्रभक्ति का संगम होता है।

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