इंटेलेक्चुअल्स को क्यों भा रही आजसू पार्टी?

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दयानंद राय

झारखंड में आनेवाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों से पहले आजसू का कुनबा लगातार बड़ा हो रहा है। खास तो ये है कि इंटेलेक्चुअल्स की बड़ी जमात आजसू पार्टी को ज्वाइन कर रही है। बीते दिनों वाइबीएन विश्वविद्यालय के चेयरमैन रामजी यादव और इसी विश्वविद्यालय के सलाहकार डॉ सुधीर यादव समेत कई  इंटेलेक्चुअल्स ने पार्टी का दामन थामा। पार्टी की सदस्यता लेने के बाद रामजी यादव ने कहा कि बीते कई सालों से सुदेश जी के साथ जुड़ा हुआ हूं। इनके विचारों से प्रभावित होकर पार्टी में शामिल हुआ हूं। पार्टी के साथ जुड़ कर सुदेश जी के नेतृत्व में शिक्षा के स्तर को ऊपर ले जाना मुख्य लक्ष्य है। वहीं, डॉ. सुधीर यादव ने कहा कि आजसू पार्टी और सुदेश महतो जी के मिशन और विजन से प्रभावित हो कर पार्टी की सदस्यता ग्रहण की है। भविष्य में पार्टी जो भी जिम्मेदारी देगी उसे निःस्वार्थ रूप से पूरी मेहनत के साथ निभाने का प्रयास करूंगा।

इससे पहले पूर्व आइएएस अधिकारी ब्रज मोहन कुमार ने भी आजसू का दामन थामा था। पार्टी की सदस्यता लेने के बाद पूर्व आईएएस अधिकारी ब्रज मोहन कुमार कहा था कि सुदेश जी की नेतृत्व क्षमता और पार्टी की नीतियों तथा कार्यक्रमों से प्रभावित होकर आजसू में शामिल हो रहा हूं। मुझे शुरू से ही समाज के लिए कुछ बेहतर करने की इच्छा रही है। इसलिए रिटायरमेंट के बाद राजनीति से जुड़ कर लोगों के हित के लिए काम करने के लिए आजसू पार्टी से बेहतर कोई राजनीतिक विकल्प नहीं दिखा। आज झारखंड के विकास के लिए आजसू पार्टी और सुदेश महतो ही एक मात्र विकल्प है। पार्टी जो भी जिम्मेदारी देगी उसे हर संभव पूरा करने की कोशिश करूंगा।

 इनके अलावा अल्पसंख्यक समाज के नेता भी आजसू से जड़ रहे हैं। झाविमो के खालिद खलील और आमया के अध्यक्ष एस अली भी आजसू ज्वाइन कर चुके हैं। यही नहीं कई इंटरप्रेन्योर और आइआइटी तथा आइआइएम के पासआउट भी आजसू का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इंटेलेक्चुअल्स को आजसू पार्टी क्यों भा रही है। इसका जवाब ये है कि आजसू पार्टी के पास सुदेश महतो और डॉ देवशरण भगत जैसे लोगों का डायनेमिक नेतृत्व है। उन्हें ये भरोसा है कि आजसू से जुड़ने के बाद न सिर्फ उनकी दक्षता और क्षमता का पूरा उपयोग होगा। बल्कि उन्हें नेतृत्व का भी मौका मिलेगा।

दरअसल, आजसू पार्टी का बुद्धिजीवी मंच पार्टी का वह विंग है जो पार्टी के लिए नीतियां तैयार करता है और उन्हें इंप्लीमेंट भी कराता है। पार्टी का बुद्धिजीवी मंच जितना सशक्त होगा, उतने ही बेहतर आइडियाज पार्टी को मिलेंगे। पार्टी में इंटेलेक्चुअल्स की अहमियत के बाबत केंद्रीय मुख्य प्रवक्ता डॉ देवशरण भगत कहते हैं कि 100 साल से अधिक समय से झारखंड अलग राज्य की लड़ाई लड़ी जा रही थी पर यह अंजाम तक तभी पहुंची जब बुद्धिजीवियों जैसे डॉ रामदयाल मुंडा, बीपी केशरी सरीखे नेताओं ने इसका नेतृत्व किया। उन्होंने अपनी कन्विंशिंग पावर से केंद्र सरकार के सामने झारखंड अलग राज्य क्यों बनना चाहिए इसपर बातें रखी। इसके बाद यह राष्ट्रीय विषय बना और अंतत वर्ष 2000 में झारखंड अलग राज्य अस्तित्व में आया।

श्री भगत ने कहा कि झारखंड की लीडरशिप में बौद्धिकता का घोर अभाव रहा है। जब झारखंड के विकास की जरूरतों की समझ बेहतर होगी, तभी उनका बेहतर निदान होगा। झारखंड की राजनीतिक पार्टियां यहां के लोगों की भूख-प्यास और विकास की जरूरतों को इसलिए पूरा नहीं कर पा रही हैं क्योंकि उन्हें इसकी समझ नहीं है। मिशन के साथ विजन क्लीयर होगा तभी टारगेट अचीव हो पायेगा। इसलिए आजसू इंटेलेक्चुअल्स को अपने साथ जोड़ रही है। दूसरी बात ये है कि आजसू पार्टी के पास सुदेश महतो जैसी लीडरशिप है। वे एक बेदाग चेहरा तो हैं ही बेबाक भी हैं और राज्य के विकास के प्रति कमिटेड हैं। कोई भी पार्टी अपने कार्यकर्ताओं से बड़ी होती है। इसलिए हमारे पास समाज के हर वर्ग से कार्यकर्ता हैं और हम सबको उनकी क्षमता और दक्षता के अनुसार मौका देते हैं।

आजसू में हाल के दिनों में नेताओं और कार्यकर्ताओं के जुड़ने की वजह ये है कि पार्टी का चेहरा सेक्यूलर है। पार्टी में शामिल जेएमएम के पूर्व पंचायत अध्यक्ष विजेंद्र कुमार कहते हैं कि कई सालों से झामुमो के साथ काम किया, लेकिन उनके काम करने के तरीके से संतुष्टि नहीं मिली। इसी वजह से आजसू पार्टी में शामिल हुआ हूं। आजसू पार्टी से जुड़ कर क्षेत्र के लोगों की सेवा करूंगा। वहीं, गढ़वा के सामाजिक कार्यकर्ता शैलेंद्र सिंह का कहना है कि आजसू पार्टी के नीति-सिद्धांत तथा राज्य के विकास के प्रति पार्टी अध्यक्ष सुदेश महतो के दूरदर्शी सोच और काम करने के जज्बे से प्रभावित हो कर आजसू पार्टी की सदयस्ता ली है।

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