कौन हैं सरफराज अहमद, जिनके इस्तीफे से झारखंड की राजनीति में आया भूचाल

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मामूली नहीं है इस राजनीतिज्ञ की हैसियत

रांची। साल के पहले ही दिन झारखंड की राजनीति में भूचाल आ गई। झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक सरफराज अहमद ने राज्य की विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। इस खबर ने पूरे राज्य को चौंका दिया। झारखंड से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारे में एक विधायक के इस्तीफे ने हलचल मचा दी। पहले तो लोगो को लगा कि एक मामूली विधायक के इस्तीफे को इतना तूल क्यों दिया जा रहा है। पर हम बता दें कि न तो यह विधायक मामूली है और न ही यह इस्तीफा।

इस इस्तीफे के पीछे एक धैर्यवान राजनीतिज्ञ की कुर्बानी छिपी है, जिसने पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा दिखायी है। हालांकि  सरफराज अहमद ने अभी तक इस्तीफा देने का कारण स्पष्ट नहीं किया है। बता दें कि राज्य की गांडेय विधानसभा सीट से झामुमो विधायक डॉक्टर सरफराज अहमद के इस्तीफा को बलिदान बताया जा रहा है।

कहा जा रहा है कि उन्होंने यह कदम पार्टी हित के लिए उठाया है। इधर सरफराज अहमद के इस्तीफे के बाद बीजेपी ने JMM पर बड़ा आरोप लगाया कि उन्होंने खुद इस्तीफा नहीं दिया है, बल्कि उन्हें विवश किया गया है। ताकि, सीएम हेमंत सोरेन अपनी पत्नी कल्पना सोरेन को वहां से विधानसभा चुनाव लड़वा सकें।

खैर ये तो राजनीतिक बातें हैं, होती ही रहेंगी। यहां हम बात करेंगे और आपको बतायेंगे कि ये डॉक्टर सरफराज अहमद  मामूसी राजनीतिज्ञ नहीं हैं। ये वो पॉलिटिशन हैं, जो एकीकृत बिहार के जमाने में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और ऑल इंडिया कांग्रेस के ज्वाइंट सेक्रेटरी रह चुके हैं। मतलब ये कि डॉ अहमद कांग्रेस के बड़े नेता रहे हैं।

आज भले ही झामुमो के विधायक के तौर पर पार्टी के लिए कुर्बानी देनेवाले आम विधायक या नेता के रूप में लोग उन्हें देख रहे हों, पर उनका राजनीतिक कद काफी ऊंचा है। 2019 यानी पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर वह पार्टी छोड़कर झारखंड मुक्ति मोर्चा में शामिल हो गये थे।

झामुमो ने उन्हें गांडेय से उम्मीदवार बनाया और वह जीत कर विधानसभा पहुंच गये। इससे पहले वह गिरिडीह लोकसभा सीट से कांग्रेस के सांसद भी रह चुके हैं। सरफराज अहमद कांग्रेस के कद्दावर नेता माने जाते रहे हैं। करीब 50 साल के राजनीतिक जीवन में 46 साल वह कांग्रेस से जुड़े रहे। कांग्रेस के टिकट पर 1984 में गिरिडीह से जीत कर लोकसभा पहुंचे थे। उनके पिता डॉक्टर इम्तियाज अहमद भी गिरिडीह से कांग्रेस के ही सांसद रह चुके हैं।

उनके निधन के बाद सरफराज यहां से सांसद बने। 1985 में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी के कार्यकाल के दौरान वह कांग्रेस के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव भी रहे। 1990 के बाद जब बिहार प्रदेश कांग्रेस में दिगग्जों की भरमार थी। जगजीवन राम, जगन्नाथ मिश्रा, रामचंद्र केसरी, श्याम सुंदर सिंह धीरज, प्रेमचंद मिश्रा, रांची के पीएन सिंह, कोयलांचल के सुरेश सिंह जैसे राजनीतिज्ञों के बीच से डॉ सरफराज अहमद को बिहार प्रदेश का अध्यक्ष बनाया गया, तब उनकी अहमियत का सबको पता चला। उन्होंने भली भांति पार्टी को संभाला और आगे बढ़ाया। कहा जाता है कि एक जमाने में राजीव गांधी, फिर सोनिया गांधी के करीबी एके एंटनी, रामचंद्र केसरी जैसे नेताओं के काफी नजदीक रहे।

इतना ही नहीं, सरफराज अहमद कांग्रेस के दिग्गज नेता और झारखंड के किंग मेकर कहे जानेवाले ज्ञानरंजन के विश्वासपात्र भी माने जाते रहे हैं। कहा जाता है कि इन्हें आगे बढ़ाने में ज्ञानरंजन की अहम भूमिका रही। आज एक बार फिर डॉ सरफराज अहमद की चर्चा हो रही है। विधायिकी से इस्तीफे के बाद लोग उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकले भी लगा रहे हैं।

चर्चा है कि इस कुर्बानी के लिए झामुमो उन्हें लोकसभा का टिकट थमा सकता है और वह कोडरमा या गिरिडीह से पार्टी के उम्मीदवार हो सकते हैं। इतना ही नहीं, उन्हें राज्यसभा में भेजे जाने की भी चर्चा है। वहीं, कुछ लोगों का दावा है कि मंत्री हाजी अंसारी के निधन के बाद मंत्री नहीं बनाये जाने से भी सरफराज नाराज था। ऐसे में कांग्रेस में उनकी वापसी हो सकती है। परंतु ये सब बातें है, होती ही रहेंगी। परंतु यह तो हकीकत है कि राजनीति में कोई भी कदम यूं ही नहीं उठाया जाता और न ही व्यर्थ की कुर्बानी होती है।

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