एक महीने पहले किसान एक रुपये प्रति किलो टमाटर बेच रहे थे। अच्छी कीमत नहीं मिलने पर किसान सड़कों पर टमाटर फेंक रहे थे। पर महीने भर बाद की विडंबना देखिए। लोग आज 110 से 120 रुपये प्रति किलो टमाटर खरीद रहे हैं। कहा जा रहा है कि टमाटर की कीमतों में अचानक उछाल मानसून और बारिश की वजह से आया है। इस मौसम में टमाटर की कीमतें हर साल बढ़ती हैं।
आज हम बतायेंगे कि टमाटर की किल्लत के पीछे इस बार सिर्फ मानसून जिम्मेदार क्यों नहीं है। मानसून के अलावा कौन-से फैक्टर हैं और ये कीमतों को कब तक बढ़ाकर रख सकते हैं। टमाटर की कीमतों में उछाल की वजह जानने के लिए टमाटर की पैदावार को समझना जरूरी है। भारत में टमाटर की दो फसलें उगाई जाती हैं। एक रबी सीजन दिसंबर से जनवरी में बुआई और दूसरी खरीफ अप्रैल-मई में बुआई के सीजन में।
टमाटर की फसल लगभग तीन महीने में तैयार हो जाती है और 45 दिनों तक इसे तोड़ने का काम चलता है। रबी की फसल मुख्य रूप से महाराष्ट्र के जुन्नार तालुका, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात और छत्तीसगढ़ में उगाई जाती है। इन इलाकों में 5 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में लगाए टमाटर की फसल की सप्लाई मार्च से अगस्त तक होती है। खरीफ की फसल उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र के नासिक और देश के अन्य हिस्सों में उगाई जाती है। 8-9 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में लगाए गए टमाटर की फसल की सप्लाई देश भर के बाजारों में अगस्त के बाद से होती है।
टमाटर के भाव आसमान छूने की जो प्रमुख वजहें हैं, उनमें बारिश भी एक है। टमाटर जल्दी खराब होने वाली सब्जी है। इसलिए इसकी निरंतर सप्लाई जरूरी है। पिछले कुछ दिनों से कर्नाटक, तेलंगाना समेत दक्षिणी राज्यों के साथ कुछ पहाड़ी राज्यों में भी भारी बारिश हुई है। इससे टमाटर की फसल को नुकसान पहुंचा है और सप्लाई में बाधा आई है।
रबी के सीजन यानी दिसंबर-जनवरी में बोए गए टमाटर की फसल पर इस बार गर्मी की मार पड़ी। दक्षिण भारत में इसकी वजह से टमाटर में लीफ कर्ल वायरस से काफी नुकसान हुआ। महाराष्ट्र में सर्दी कम पड़ने और मार्च-अप्रैल में अत्यधिक गर्मी की वजह से ककड़ी वायरस के हमले देखे गए। इस वजह से टमाटर के पौधे सूख गए।
कर्नाटक में व्हाइट फ्लाई कीट के चलते टमाटर की फसल को नुकसान हुआ। इससे टमाटर की सप्लाई में कमी आई।
इस साल मार्च-अप्रैल में टमाटर की खेती से जुड़े किसानों को झटका लगा। थोक बाजार में मार्च में टमाटर की औसत कीमत 5 से 10 रुपए किलो थी। वहीं अप्रैल में यह लगभग 5 से 15 रुपए प्रति किलो थी। मई में किसानों को 2.50 से 5 रुपए प्रति किलो के बीच बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। कीमतों में कमी की वजह से कई किसानों ने अपनी फसलें खेत में ही छोड़ दीं।
इससे मार्केट में कम टमाटर आए। पिछले दो साल से नुकसान झेल रहे किसानों ने इस बार टमाटर की बुआई कम की। वेजिटेबल ट्रेडर्स एसोसिएशन के मुताबिक 2020 और 2021 में टमाटर की बंपर फसल हुई और कम कीमत की वजह से किसानों को अपनी उपज डंप करनी पड़ी। इस वजह से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड में किसानों ने इस साल टमाटर के उत्पादन में कटौती की और फूल उगाए। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों की तुलना में इस बार टमाटर का उत्पादन आधा हो गया।
वहीं, कर्नाटक में किसानों ने बीन्स के लिए टमाटर का त्याग कर दिया। वहां कई किसानों ने इस साल बीन्स की खेती की, क्योंकि पिछले साल बीन्स ने काफी ज्यादा मुनाफा दिया था। ऐसे में टमाटर की फसल सामान्य से केवल 30% ही हो सकी।
तो ये थी वो प्रमुख वजहें, जिनके कारण टमाटर के भाव आज आसमान छू रहे हैं।
अब बात करें कि आखिर टमाटर की कीमतें कब तक घटेंगी..
टमाटर की कीमतें सस्ती होने के लिए जरूरी है कि मार्केट में डिमांड के मुकाबले सप्लाई बढ़ जाए। हालांकि जल्द सप्लाई बढ़ने की उम्मीद नहीं है। क्योंकि खरीफ सीजन में बोए जाने वाले टमाटर की सप्लाई जुलाई लास्ट और अगस्त तक होगी।
कर्नाटक जैसे राज्यों से नई खेप आने से टमाटर की सप्लाई बढ़ जाएगी। इससे दाम भी कम होंगे। होलसेल ट्रेडर का मानना है कि लास्ट क्रॉप साइकिल यानी फसल चक्र खत्म हो गया है और एक नया चक्र शुरू होगा। नई फसल को बाजार में आने में 20-25 दिन लगेंगे। इसके बाद कीमतों में कमी आने की उम्मीद है।








