बिरसा की लोकप्रियता देख सहम गये थे अंग्रेज [When the British were frightened after seeing the popularity of Birsa]

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500 रु. की लालच में पकड़वा दिये बिरसा को

रांची: देश-दुनिया के इतिहास में 09 जून की तारीख तमाम अहम वजह से दर्ज है। यह तारीख जननायक बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि के रूप में हर साल याद की जाती है।

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई ऐसे कई नायक पैदा हुए हैं जिन्होंने इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों से दर्ज कराया है।

बिरसा मुंडा ऐसे ही एक आदिवासी योद्धा हैं। उन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आदिवासी समाज की दिशा व दशा बदलकर नवीन सामाजिक और राजनीतिक युग का शुरूआत किया।

उन्होंने न केवल आदिवासियों के अधिकारों की बल्कि आजादी की लड़ाई भी लड़ी। झारखंड के एक आदिवासी परिवार में 15 नवम्बर 1875 को जन्मे बिरसा मुंडा को झारखंड ही नहीं ।

बल्कि बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भगवान की तरह पूजा जाता है।

ब्रितानी हुकूमत में आदिवासियों की स्वतंत्रता, स्वायत्ता और सुरक्षा पर ग्रहण लग गया। अंग्रेजों ने जब आदिवासियों से उनके जल, जंगल, जमीन के अधिकार को छीनने की कोशिश की तो आदिवासी भाषा में ‘उलगुलान’ यानी आंदोलन हुआ।

बिरसा से पहले हुए आदिवासी विद्रोह जमीन बचाने के लिए हुए थे लेकिन बिरसा का उलगुलान तीन लक्ष्यों पर केंद्रित था।

पहला जल-जंगल व जमीन की रक्षा, दूसरा नारी की सुरक्षा व सम्मान और तीसरा भारतीय धर्म व संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा।

बिरसा मुण्डा ने आदिवासी समाज को ब्रिटिश शासकों व उनके चाटुकार जमींदारों-जागीरदारों के शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए संगठित किया।

इसकी वजह से जमींदारों और जागीरदारों के घरों तथा खेतों और वन की भूमि पर कार्य रुक गया।

अपने मूल पैतृक अधिकारों को बहाल करने की मांग के साथ आदिवासियों ने जब बिरसा के नेतृत्व में अदालत में याचिका दायर की तो शासक वर्ग बुरी तरह घबरा गया।

बिरसा ने अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया

झारखंड जिला गजेटियर के अभिलेख से पता चलता है कि बिरसा मुण्डा के तेजी से बढ़ते प्रभाव और लोकप्रियता को देखकर अंग्रेज प्रशासन, जमींदार, जागीरदार और मिशनरी सभी बुरी तरह चिंतित हो उठे थे।

अतः सुनियोजित संघर्ष के तहत रांची के अंग्रेज कप्तान मेयर्स ने 24 अगस्त 1895 को बिरसा मुंडा को रात में सोते समय बेहोशी की दवा का रुमाल मुंह में ठूस रातो रात उन्हें उठवाकर, उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलाकर दो वर्ष के सश्रम कारावास के तहत हजारीबाग के केन्द्रीय कारागार में डाल दिया गया।

इस घटना से बिरसा के मन में अंग्रेजों के प्रति घृणा और बढ़ गई और उन्होंने अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया।

जेल से छूट कर बिरसा अपनी लक्ष्य सिद्धि में प्राण प्रण से जुट गए। बिरसा ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष के लिए हजारों वनवासियों को पुनः संगठित कर उनको शस्त्र संग्रह करने, तीर कमान बनाने और कुल्हाड़ी की धार तेज करने के निर्देश देकर अन्याय के विरुद्ध महायुद्ध का शंखनाद किया।

अगस्त 1897 में बिरसा और उनके 400 सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोल अंग्रेज सिपाहियों के छक्के छुड़ा दिए।

वे अभी संभले भी नहीं थे कि 1898 में तांगा नदी के किनारे आदिवासियों से भिड़ंत में अंग्रेज सेना पुनः हार गई। इन हमलों से घबराकर अंग्रेजों ने हजारीबाग और कलकत्ता से सेना बुलवानी पड़ी।

24 दिसम्बर 1899 को हुई लड़ाई में बिरसा मुण्डा के लगभग चार सौ साथी मारे गये। इसके बाद जनवरी 1900 में डोमबाड़ी पहाड़ी पर जब बिरसा मुण्डा एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे, अंग्रेजी सेना ने अचानक धावा बोल दिया।

इस हमले में बहुत सी स्त्रियां और बच्चे भी मारे गए और बिरसा के कई अनुयायियों की गिरफ्तारी भी हुई।

अंग्रेजी सेना ने बिरसा को पकड़ने के लिए 500 रु ईनाम रखी

उनके विद्रोह ने ब्रिटिश शासन की नींदे उड़ा दी थीं। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए कवायद तेज की।

कई बार वह अंग्रेजों को चकमा देने में कामयाब रहे।अंततः 500 रुपये के सरकारी इनाम के लालच में जीराकेल गांवों के कुछ विश्वासघातियों के कारण बिरसा 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ्तार कर लिए गए।

जंजीरों में जकड़कर उन्हें रांची जेल में डाल दिया गया। वहां लंबे समय तक हंसते-हंसते कठोर यातनाएं सहते हुए यह महान योद्धा 09 जून 1900 को सदा-सदा के लिए इस संसार से विदा हो गया।

कहते हैं कि जेल के भोजन में संभवतः उन्हें मीठा जहर दिया गया था जबकि प्रचारित यह किया गया कि उनकी मृत्यु हैजा हो जाने से हुई।

लेकिन तब तक मुंडा ने आदिवासियों की मानसिकता को बदल दिया और उन्हें इस तरह से संगठित किया कि वे न केवल यह जान सके कि उनका क्या अधिकार है, बल्कि उन्होंने पारंपरिक तरीकों से भी अपने अधिकारों और हितों की रक्षा की।

आदिवासियों के लिए, मुंडा आशा की एक किरण थे जिन्होंने न केवल क्षेत्र के आदिवासियों को प्रबुद्ध किया, बल्कि उनके निधन के सदियों बाद भी आदिवासी एकता और विद्रोह का प्रतीक हैं।

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