Tribal Culture and Life style: प्रकृति से जुड़ी है आदिवासी जीवन शैली

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आदिवासी जीवन शैली

आदिवासी समुदाय प्रकृति के सभी घटकों- पेड़-पौधे, धरती, सूर्य, नदियों और पहाड़ों का सादर वंदन और पूजा करते हैं।

ये जल-जंगल के बेहद करीब होते हैं और पावन धरती को अपनी मां समान मानते हैं। इनका मुख्य पेशा ज्यादातर खेती-किसानी से जुड़ा होता है।

ये जल-जंगल को अपना रखवाला मानते हैं, इसलिए वे इसकी रक्षा करते हैं। भारत में आदिवासी मुख्य रूप से जीववाद, हिंदू धर्म और ईसाई धर्म का पालन करते हैं।

आदिवासी समाज और संस्कृति के प्रति हमारे तथाकथित सुसंस्कृत समाज का रवैया क्या है?

वो चाहे सैलानी – पत्रकार लेखक हों या समाजशास्त्री, आम तौर पर सबकी एक ही मिलीजुली कोशिश इस बात को खोज निकलने की रही है कि आदिवासियों में अदभुत और विलक्षण क्या है?

उनके जीवन और व्यवहार में आश्चर्य और तमाशे के लायक चीजों की तलाश और हमसे बेमेल और पराए पहलुओं को इकहरे तरीके से रोशन करने लोगों का ध्यान आकर्षित करने और मनोरंजन के लिए ही लोग आदिवासी समाज और सुसंस्कृति की ओर जाते रहे हैं।

नतीजा हमारे सामने है : उनके यौन जीवन और रीति- रीवाजों के बारे में गुदगुदाने वाले सनसनीखेज ब्योरे तो खूब मिलते हैं, पर उनके पारिवारिक जीवन की मानवीय व्यथा नहीं।

उनके अलौकिक विश्वास, जादू – टोने और विलक्षण अनूष्ठानों का आँखों देख हाल तो मिलता है, उनकी जिंदगी के हर सिम्त हाड़तोड़ संघर्ष की बहुरूपी और प्रमाणिक तस्वीर नहीं। वे आज भी आदमी की अलग नस्ल के रूप में अजूबा की तरह पेश किए जाते हैं।

आदिवासियों की जीवन शैली

आदिवासियों की जीवन शैली, उनकी सांस्कृतिक परंपरा और समाज – संस्कृति पर कई लेख लिखे गये हैं, जिनसे पता चलता है कि कितना निश्चल है, उनका जीवन।

प्रकृति की गोद में रहना, प्रकृति का दिया खाना और प्रकृति की पूजा करना। मानव विज्ञानियों और समाजशास्त्र के अध्यनों ने जनजातीय समुदायों का व्यापक अध्ययन किया है और उसके आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि आदिवासियों की अपनी दुनिया, जिसमें वे बाहरी छेड़छाड़ पसंद नहीं करते। उनकी संस्कृति और परंपराएं काफी समृद्ध है।

दुनिया भर के लगभग 90 देशों में 47.6 करोड़ मूलनिवासी अर्थात आदिवासी रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र हर साल एक विषय निर्धारित करता है, जिसके अनुसार सभी लोग नौ अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाते हैं।

चाहे कोई भी जनजाति हो, इस खास दिन को सभी आदिवासी बहुत ही खुशी और उल्लास के साथ मनाते हैं।

सब एक साथ मिल कर बहुत ही परम्परागत तरीके से नाच गाना करते हैं। लोग अपने लोकगीत गाते हैं।

इस दिन बहुत से सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। लोग तलवार और धनुष-बाण लेकर नाचते हैं। साथ ही कुछ लोग हल के साथ अपने लोक गीतों पर नाचते हैं।

भारतीय संविधान में आदिवासियों के लिए अनुसूचित जनजाति शब्द पद का प्रयोग किया गया है। आदिवासी मूलत: प्रकृति प्रेमी होते हैं।

प्रकृति की शांत और निश्चकल गोद में पलनेवाले इस मानव समाज की अपनी विशिष्टताएं है। इस समुदाय की पहचान इनकी संस्कृति, इनकी भाषा और इनके पर्व-त्योहारों झलकती है।

आदिवासी समुदाय प्रकृति के सभी घटकों- पेड़-पौधे, धरती, सूर्य, नदियों और पहाड़ों का सादर वंदन और पूजा करते हैं।

ये जल-जंगल के बेहद करीब होते हैं और पावन धरती को अपनी मां समान मानते हैं। इनका मुख्य पेशा ज्यादातर खेती-किसानी से जुड़ा होता है।

ये जल-जंगल को अपना रखवाला मानते हैं इसलिए वे इसकी रक्षा करते हैं। ये कुछ विशिष्ट पेड़-पौधों की पूजा करते हैं और इसलिए वे इसे काटते नहीं।

ये सीख देते हैं कि अगर हम प्रकृति की रक्षा करेंगे तो वो भी हमारी रक्षा करेंगे। ये अपनी कई मूलभूत सुविधाएं जंगलों से प्राप्त करते हैं।

इनके जरूरत की ज्यादातर चीजें लकड़ियों से बनी होती है। ये लोग सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर प्रकृति से गहरे जुड़े होते हैं।

आदिवासी लोकगीत के बड़े मायनेः

आदिवासियों के पास हर मौसम के अनुसार लोकगीतों की धरोहर है। इनक मानना है कि मौसम के अनुकूल नृत्य-संगीत एवं रागों के अलाप से प्रकृति खुश होती है।

वर्षा अच्छी होती है। उनकी फसल अच्छी उपजती है और उन्हें शक्ति मिलती है। पर्यावरण के प्रति सजगता है और प्रकृति के प्रति जीवंत लगाव है।

इनके पास गीतों और नृत्योंण की भरपूर संपदा है जिसमें प्रकृति को संरक्षित करने की बात की जाती हैं।

इनके गीतों में पशु-पक्षियों, जंगल-जमीन का जिक्र भी है। ये इसे अपने परिवार समान मानते हैं।

नृत्योंण और लोकगीतों के माध्यम से इनके आकांक्षाओं, उल्लाेस की अभिव्यंक्ति सहज भाव से परिलक्षित होती है।

इनके पर्व त्योहार भी प्रकृति से जुड़े होते हैं। इनके त्योहार अपनों के बिना पूरे नहीं होते हैं। ये मिलजुल का पर्व मनाते हैं और बिना किसी भेदभाव के हाथ थामे वाद्य यंत्रों की धुन पर नृत्य करते हैं।

इनके गीतों में भी एक अलग मिठास होती है, क्योंकि वो प्रकृति की वंदना करते हैं। कोई भी पर्व आदिवासी एक दिन नहीं मनाते, इसका कारण यह है कि मुख्य पर्व के दिन के बाद ये लोग अपने करीबियों के यहां जाते हैं और पर्व मनाते है।

ये परंपरा चली आ रही है और इसे निभाया जा रहा है। समय के साथ इसमें बदलाव देखा गया है, लेकिन सुदूर इलाकों में आज भी ये परंपराएं और भाईचारे की भावना जिंदा है।

प्रकृति ही देवी और देवता हैं

आदिवासी लोग जल, जंगल, ज़मीन और जानवरों की ही पूजा करते हैं। साथ ही वे सूर्य और चंद्रमा की भी पूजा करते हैं। यह सभी बातें अलग-अलग जनजातियों के लिए अलग हो सकती हैं।

लैंगिक समानता प्रमुख विशेषताः

आदिवासी समुदायों को लोग पिछड़ा हुआ मानते हैं, क्योंकि यह आधुनिकता को नहीं अपनाना चाहते, लेकिन एक ऐसी चीज़ है जो सबको इस एक समुदाय से सीखनी चाहिए।

वह है आदिवासी समुदायों में लैंगिक समानता। यानी इनके यहां लड़कियों की संख्या लड़कों के बराबर है और यहां दोनों ही लिंग के लोगों को समान हक दिए जाते हैं।

आदिवासियों का खास पहनावाः

आज भी आदिवासी समाज के कई लोग अपने सांस्कृतिक कपडे़ पहनते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि आदिवासियों की पहचान उनके कपड़ों व आभूषण से की जा सकती है।

खास बात यह है कि आदिवासी दिवस पर भी लोग अपना पारम्परिक पहनावा ही पहनते हैं।

आज भी लोग धोती, आधी बांह की कमीज़, सर पर गोफन के साथ पगड़ी (फलिया) पहनते हैं।

कुछ लोग तो 3 से 4 किलोग्राम चांदी का बेल्ट कमर पर बांधते हैं। यह बेल्ट बस वही लोग पहनते हैं जो इसको खरीद सकते हैं।

कुछ लोग तो अपने चेहरे पर अलग-अलग तरह की चित्रकारी भी करते हैं। यह पूर्ण सत्य है कि आज भी तमाम मूलनिवासी अपनी सभी परम्पराएं पहले की तरह निभाते हैं। चाहे फिर वह ब्याह हो, जन्मदिन हो या कोई और त्यौहार।

आदिवासी समाज में शादी के रस्मः

अलग-अलग क्षेत्रों में आदिवासियों की भाषा से लेकर उनकी परम्पराओं में बदलाव दिखाई देता है।

इन बदलाव में आदिवासी समुदायों में होने वाली शादियां भी विभिन्न रस्मों के द्वारा सम्पन्न होती हैं।

अत: कुछ समुदायों में अदा की जाने वाली शादी की रस्मों पर प्रकाश डालना ज़रूरी हैं। गुजरात और राजस्थान की भील जनजाति में उल्टे फेरे लगाए जाते हैं।

ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि धरती भी उल्टी ही घूमती है। दरअसल आदिवासी अपनी ज़िंदगी को प्रकृति के अनुसार ही जीते हैं।

इसी कारण लोग अपने घरों में भी उल्टी चलने वाली घड़ी रखते हैं। इस जनजाति में एक और अलग रस्म होती है।

यहां शादी के वक्त जब लड़के वाले लड़की के घर जाते हैं, तो वह लोग लड़की की चाल पर ध्यान देते हैं।

अगर लड़की के पैर चलते हुए अंदर की ओर जाते है, तो लड़की को घर के लिए शुभ माना जाती है, लेकिन अगर उसके पैर चलते हुए बाहर की तरफ आते हैं तो माना जाता है कि वह घर के लिए ठीक नहीं है।

लड़के के घर वाले लड़की की बोल-चाल पर भी बहुत ध्यान देते हैं। भील जनजाति के लोग दूसरी जनजाति, जाति, धर्म में शादी कर सकते हैं लेकिन अपने ही गोत्र में शादी करना सख्त मना है।

ऐसा करने पर जनजाति से बाहर निकाल दिया जाता है। यह लोग आज भी शादी सांस्कृतिक तरीके से ही करते हैं।

बाकी लोगों को शादी की सूचना देने का तरीका भी इस जनजाति का बहुत ही अलग है। यहां लोग अपने घर के मुख्य दरवाज़े के बाहर चावल और गेंहू के कुछ दाने रख देते हैं। जिसे देखकर लोग समझ जाते हैं कि इस घर में किसी का रिश्ता तय हो गया है।

भील जनजाति में शादी 3 से 4 दिनों में पूरी हो जाती है। इस जनजाति में और भी कई अनोखी रस्में हैं।

उनमें से एक “चांदला” है। इस रस्म में जनजाति के लोग लड़के और लड़की के घर वालों को कुछ पैसे देकर उनकी आर्थिक मदद करते हैं।

लड़की और लड़के के घर वाले एक कॉपी में यह लिखते हैं कि किसने कितनी मदद की।

ताकि जब उनके घर कोई शादी हो तो वह भी उनकी मदद कर सकें। इसी तरह यहां दहेज नहीं होता, बल्कि दोनों परिवार मिलकर सभी तैयारियां करते हैं।

झारखंड में शादी के 12 तरीकेः

झारखंड एक ऐसा राज्य है जहां ज़्यादातर आदिवासी-मूल निवासी रहते हैं। उनमे से कुछ संताल, उरांव, मुंडा, असुर, बैगा हैं।

इन सभी जनजातियों में पारंपरिक रीति-रिवाज बहुत मायने रखते हैं। यहां शादी-विवाह भी पूरे रीति-रिवाज के साथ किए जाते हैं।

झारखण्ड की एक जनजाति है संताल। संताल जनजाति में 12 तरीकों से शादियां हो सकती हैं।

उनमें से एक “सादय बपला” है, शादी के इस तरीके में दोनों परिवारों की रज़ामंदी बहुत ही ज़रूरी है।

इस विवाह को एक आदर्श विवाह माना जाता है। दूसरे तरह के विवाह को “घरदी जवाय” कहा जाता है।

यह विवाह तभी होता है जब लड़की का भाई नाबालिग हो। लड़का अपने लड़की के भाई के बालिग होने तक लड़की के घर में ही रहता है। फिर उसके बाद अपनी पत्नी के साथ अपने घर लौट जाता है।

विवाह के तरीके का अगला नम्बर “हीरोम चेतान बापला” है। इस विवाह में लड़का पहली पत्नी के होते हुए दूसरा विवाह कर सकता है लेकिन यह तभी सम्भव है अगर पहली पत्नी इसकी मंज़ूरी दे।

यह विवाह एक परिस्थिति में ही होता है अगर पहली पत्नी से कोई सन्तान ना हो और अगर हो भी तो सिर्फ लड़की हो।

बहरहाल और भी 9 तरह की शादी इस जनजाति में होती हैं। संताल जनजाति में शादी के दिन दूल्हा और दुल्हन अपनी छोटी उंगली में से खून निकालकर एक-दूसरे के माथे पर लगाते हैं।

लीव इन रिलेशनशिप मान्यः

‘लीव इन रिलेशन’ जैसी रस्म पश्चिमी संस्कृति में शादी से पहले सम्बन्ध बनाना और साथ रहना आम बात है, लेकिन भारतीय संस्कृति में यह एक असाधारण बात है।

बावजूद इसके भारत में भी कुछ ऐसी जनजातियां हैं, जहां इसे एक रस्म माना जाता है।

इस रस्म के अनुसार, लड़का-लड़की शादी से पहले एक साथ एक घर में रह सकते हैं और शारारिक सम्बन्ध भी बना सकते हैं। इस रस्म को “घोटूल” कहते हैं। झारखंड में तो यह आम बात है।

यह रस्म छत्तीसगढ़ की गोंड जनजाति के बीच बहुत ही लोकप्रिय है। इस रस्म में लड़के और लड़कियां आपस में मिलते हैं और अगर उन्हें एक-दूसरे से बात करके अच्छा लगता है, तो वह एक-दूसरे को अच्छे से जानने के लिए एक साथ रहना शुरु करते हैं। इस रस्म को करने के लिए 10 से अधिक उम्र होनी चाहिए।

सबको अपने जीवन में कम-से-कम एक बार इस रस्म को करना होता है। इस रस्म के दौरान अगर किसी लड़के को किसी लड़की को अपनी तरफ आकर्षित करना होता है, तो वह उसके लिए एक कंघी अपने हाथों से बनाता है।

अगर लड़का और लड़की एक-दूसरे को पसन्द करने लगते हैं, तो वह दोनों एक साथ रहना शुरु कर देते हैं।

जहां जीवन से सम्बन्धित कई तरह की चीज़ों को सीखते हैं और एक-दूसरे को अच्छे से जानने के बाद घर वालो की मंज़ूरी के साथ शादी कर लेते हैं।

आज के समय में आधुनिक बनना एक ट्रेंड-सा बन गया है। सब अपने संस्कारों को छोड़ कर आधुनिकता की तरफ भाग रहे हैं।

जब से विज्ञान ने तरक्की की है, सबको लगने लगा है आधुनिकता ही जीवन जीने का मूल है लेकिन इस नई दुनिया में आज भी आदिवासी जनजातियां अपनी संस्कृति, परम्परा, रिवाज को बचाने की कोशिश कर रही हैं।

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