रांची। झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष और राज्य के दिशोम गुरु शिबू सोरेन 11 जनवरी को 80 साल के हो गये। पूरा राज्य आज उनका जन्मदिन धूमधाम से मना रहा है। उनके पुत्र और राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन गुरुजी के आवास पर जन्मदिन का केक कटवाने पहुंचे हैं। इसके लिए 80 पाउंड का केक मंगवाया गया है। मौके पर पार्टी के नेता और कार्यकर्ता बड़ी संख्या में मौजूद हैं। आज का दिन झारखंडवासियों के लिए किसी पर्व से कम नहीं है।
बता दें कि गुरुजी की छवि एक आंदोलनकारी की रही है। उन्होंने झारखंड अलग राज्य के लिए पूरा जीवन आंदोलन करते हुए गुजार दिया। दिशोम गुरु बनने का उनका सफर काफी संघर्षपूर्ण रहा है।
ऐसी रही है दिशोम गुरु की संघर्ष यात्रा
- रामगढ़ जिले के नेमरा में 11 जनवरी, 1944 को जन्म हुआ।
- उनके बचपन का नाम शिवपाल था।
- गोला हाइ स्कूल से 10वीं तक पढ़ाई की।
- प्रारंभिक पढ़ाई उन्होंने नेमरा के ही सरकारी स्कूल से की थी।
- 27 नवंबर, 1957 को उनके पिता सोबरन सोरेन की महाजनों ने हत्या कर दी थी।
- उनके पिता शिक्षक थे और गांधीवादी थे। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते थे।
- महाजनों द्वारा जमीन पर कब्जा करने का वे विरोध करते थे।
- शिबू सोरेन ने पिता की हत्या के बाद पढ़ाई छोड़ दी और महाजनों के खिलाफ संघर्ष शरू कर दिया।
- गोला के आसपास महाजनों के खिलाफ युवाओं को एकजुट कर आंदोलन शुरू किया।
- युवा अवस्था में ही मुखिया का चुनाव लड़ा, पर धोखे से उन्हें हराया गया।
- संथाल युवाओं को एक कर पहले संथाल नवयुवक संघ बनाया।
- संथाल के उत्थान के लिए सोनोत संथाल समाज का गठन किया।
- संथाल की जमीन पर महाजनों द्वारा कब्जा करने के खिलाफ धानकटनी आंदोलन किया।
- गोला, पेटरवार, जैनामोड़, बोकारो में आंदोलन के दौरान विनोद बिहारी महतो से मुलाकात हुई।
- फिर धनबाद गये। वहां कुछ दिनों तक विनोद बाबू के घर पर ही रहे।
- पुलिस से बचने के लिए शिबू सोरेन ने पारसनाथ की पहाड़ियों के बीच पलमा गांव को अपना केंद्र बनाया।
- फिर टुंडी के पास पोखरिया में आश्रम बनाया।
- टुंडी के आसपास महाजनों के कब्जे से संथालों की जमीन को मुक्त कराया।
- आदिवासियों के विकास के लिए सामूहिक खेती, पशुपालन, रात्रि पाठशाला आदि कार्यक्रम चलाया।
- टुंडी और उसके आसपास शिबू सोरेन की समानांतर सरकार चलती थी।
- उनकी अपनी न्याय व्यवस्था थी। कोर्ट लगाते थे और फैसला सुनाते थे।
- तोपचांची के पास जंगल में एक दारोगा की हत्या के बाद शिबू सोरेन को किसी भी हाल में पकड़ने का सरकार ने आदेश दिया था।
- धनबाद के तब के वरीय अधिकारी केबी सक्सेना ने शिबू सोरेन से जंगल में मुलाकात कर उन्हें मुख्य धारा में शामिल करने के लिए राजी किया था।
- 1973 में शिबू सोरेन, विनोद बिहारी महतो और एके राय ने मिल कर झारखंड मुक्ति मोरचा की स्थापना की।
- विनोद बाबू अध्यक्ष और शिबू सोरेन महासचिव बने।
- 1975 में आपातकाल के दौरान शिबू सोरेन को समर्पण के लिए तैयार कराया गया था।
- धनबाद जेल में उन्हें रखा गया था। झगडू पंडित उनके साथ थे।
- पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश पर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्र ने शिबू सोरेन की रिहाई कराई।
- जेल में बंद शिबू सोरेन से गोपनीय तरीके से बोकारो मेंडॉ मिश्र ने मुलाकात की थी
- 1977 में शिबू सोरेन ने टुंडी से विधानसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन चुनाव हार गये।
- टुंडी से चुनाव में हार के बाद शिबू सोरेन ने संथाल परगना को अपना नया ठिकाना बनाया।
- 1980 में शिबू सोरेन ने दुमका संसदीय सीट से चुनाव लड़ा और पहली बार सांसद बने।
- उसके बाद कई बार दुमका से सांसद बनते बने। राज्यसभा से सांसद रहे।
- झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अलग झारखंड राज्य के लिए उनकी अगुवाई में लंबा आंदोलन चलाया। आंदोलन के दौरान आर्थिक नाकेबंदी की और झारखंड बंद रखा।
- विनोद बाबू के अलग होने के बाद शिबू सोरेन ने निर्मल महतो को नया अध्यक्ष बनाया।
- 1987 में निर्मल महतो की हत्या के बाद शिबू सोरेन खुद अध्यक्ष बने और शैलेंद्र महतो को महासचिव बनाया।
- 1993 में नरसिंह राव सरकार को बचाने के लिए शिबू सोरेन और उनके सहयोगी सांसदों पर गंभीर आरोप लगे और उन्हें जेल भी जाना पड़ा।
- झारखंड राज्य बनने के पहले झारखंड स्वायत्त परिषद (जैक) बना। 9 अगस्त, 1995 को शिबू सोरेन जैक के अध्यक्ष बने।
- 1999 का लोकसभा चुनाव हार जाने के कारण जब 2000 में संसद में झारखंड विधेयक पारित हुआ, तब वह सांसद नहीं थे।
- 15 नवंबर, 2000 को जब झारखंड का गठन हुआ, तो उनका सपना साकार हुआ पर संख्या बल में कमी होने के कारण वे झारखंड के पहले मुख्यमंत्री नहीं बन सके।
- 2005 के विधानसभा चुनाव के बाद 2 मार्च, 2005 को शिबू सोरेन पहली बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने, लेकिन संख्या बल कम होने के कारण बहुमत सिद्ध होने के पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
- इससे पूर्व वह केंद्र में कोयला मंत्री भी बने।
- 27 अगस्त, 2008 को दूसरी बार शिबू सोरेन झारखंड के मुख्यमंत्री बने।
- शिबू सोरेन मुख्यमंत्री थे और उन्हें छह माह के भीतर किसी भी सीट से विधायक बनना था,न्होंने तमाड़ विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। 9 जनवरी, 2009 को मुख्यमंत्री रहते हुए वे चुनाव हार गये और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
- तमाड़ चुनाव में हार के बावजूद हालात ऐसे बने कि उसी साल (30 दिसंबर, 2009) को शिबू सोरेन को फिर से मुख्यमंत्री बनाया गया। पर मई 2010 में उनकी सरकार गिर गयी।
- 2014 में जब पूरे देश में मोदी लहर थी, उस लहर में भी शिबू सोरेन झामुमो से जीत कर सांसद बने।
- 2019 के लोकसभा चुनाव में दुमका से हार गये। बाद में राज्य सभा से सांसद बन गये। अभी वे राज्यसभा के सदस्य हैं।
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