सिल्लीः त्रिकोणीय मुकाबले में कुड़मी नहीं, निर्णायक होंगे मुस्लिम-आदिवासी, जानिये कैसे [Silli: Muslim-tribal will be the decider in the triangular contest, not Kudmi, know how]

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शुभम राय

रांची: झारखंड विधानसभा चुनाव की बिसात बिछ चुकी है। पार्टियों ने प्रत्याशियों को चुनावी रण में उतार दिया है। पिछले पांच साल से सत्ता से बाहर भाजपा-आजसू की जोड़ी करो या मरो की स्थिति में है।

सिल्ली में इस बार का विधानसभा चुनाव जोरदार होने वाला है। क्योंकि सिल्ली के चुनावी रण में इस बार मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना है।

एक ओर है आजसू प्रमुख और सिल्ली से चार बार के विधायक सुदेश महतो, दूसरी ओर है जयराम महतो की पार्टी जेएलकेएम से देवेन्द्रनाथ महतो और तीसरी ओर होंगे झामुमो नेता और सिल्ली के पूर्व विधायक अमित महतो।

सुदेश महतो सिल्ली से चार बार चुनाव जीत चुके हैं। कहा जाता है कि सिल्ली में उनकी तूती बोलती है। सिल्ली उनकी परंपरागत सीट है। देवेन्द्रनाथ महतो जेएलकेएम के केंद्रीय उपाध्यक्ष हैं।

बीते लोकसभा चुनाव में रांची सीट से उन्हें 1 लाख 30 हजार के अधिक वोट मिले थे। खास बात यह रही कि सिल्ली क्षेत्र से उन्हें 49 हजार तीन सौ 62 वोट मिले थे।

इसे देखते हुए पार्टी ने उन्हें सिल्ली की कमान दी है। तीसरी ओर अमित महतो होंगे, जो एक बार फिर जेएमएम के सिंबल पर सिल्ली से चुनाव लड़ने को तैयार हैं। हालांकि अभी इसकी औपचारिक घोषणा नहीं हुई।

अमित महतो ने 2014 के चुनाव में सुदेश महतो को करीब तीस हजार वोट के अंतर से मात दी थी और पहली बार सिल्ली से विधायक बने थे। सिल्ली विधानसभा सीट कुड़मी बहुल सीट है और ये तीनों ही नेता कुड़मी समाज से आते हैं।

1995 से लेकर 2019 तक सिल्ली विधानसभा सीट पर सात बार चुनाव हुए हैं और सातों बार जीत कुड़मी प्रत्याशियों की ही हुई है। इसमें चार बार सुदेश महतो, एक-एक बार जेएमएम के टिकट पर अमित महतो और उनकी पत्नी सीमा महतो और साल 1995 में कांग्रेस की टिकट पर केशव महतो कमलेश सिल्ली से विजई हुए हैं।

अनुमानित आंकड़ों के अनुसार सिल्ली में कुड़मी वोटरों की संख्या लगभग 30 से 35 प्रतिशत है, वहीं आदिवासी वोटरों की संख्या 31 प्रतिशत है, जो चुनाव में जीत और हार में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा सिल्ली में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 6 से 7 प्रतिशत है।

इस बार के चुनाव में सिल्ली के चुनावी रण में तीन कुड़मी नेताओं का आमना सामना होगा। तीनों ही नेताओं ने पिछले चुनावों में खुद को जनता के बीच साबित किया है।

इससे ये अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बार सिल्ली में कुड़मी वोटरों में बिखराव देखने को मिल सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो इसका सीधा फायदा जेएमएम प्रत्याशी अमित महतो को मिल सकता है।

क्योंकि सिल्ली में कुड़मियों के बाद सबसे बड़ी आबादी आदिवासियों की है और पिछले चुनावों में ये देखा गया है कि सिल्ली के आदिवासी वोटरों ने बढ़चढ़कर जेएमएम को वोट किया है, जो इस बार के चुनाव में भी बरकरार रहेगा। इसके अलावा मुस्लिम और क्रिश्चियन वोटर भी जेएमएम के पाले में बढ़चढ़ कर वोट कर सकते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि कुड़मी वोटों को साधने के लिए जेएमएम इस बार सिल्ली में किसी आदिवासी नेता को टिकट नहीं देना चाहती है।

कुछ दिन पहले जेएमएम के सिल्ली जिला के उपाध्यक्ष रामानंद बेदिया ने सिल्ली से चुनाव लड़ने के लिए अपनी दावेदारी पेश की है। लेकिन पार्टी किसी कुड़मी को ही सिल्ली से चुनाव लड़ाना चाहती है।

आदिवासी और अल्पसंख्यक वोटों के साथ अगर कुछ कुड़मी वोट जेएमएम के खाते में आते हैं तो शायद सिल्ली में जेएमएम की नैया पार लग जाए। वहीं कुड़मी वोटरों में बिखराव और जेएमएम के पीछे आदिवासी और अल्पसंख्यक वोटरों का लामबंद होना, सुदेश महतो के लिए खतरे की खंटी है।

शायद यही कारण है, कि राजनीति गलियारों से रह-रह कर ये खबर सामने आती रहीं कि सुदेश महतो सिल्ली के अलावा टुंडी से भी चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं।

वैसे जानकारी के लिए बता दें कि टुंडी विधानसभा सीट भाजपा के खाते में गई है और भाजपा के प्रत्याशियों की पहली सूची में टुंडी सीट गायब है।

यानी अब तक भाजपा में यह तय नहीं हुआ है कि टुंडी से कौन चुनाव लड़ेगा। संभव है इसी कारण इस सीट को होल्ड पर रखा गया हो।

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