Supreme Court:
रांची। सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा है कि सारंडा वन को अभयारण्य घोषित न करना अदालत की घोर अवमानना है। न्यायालय ने राज्य के मुख्य सचिव को 8 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है। साथ ही कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर तब तक अधिसूचना जारी नहीं हुई तो उन्हें जेल जाना पड़ेगा।
सारंडा वन से जुड़ा क्या है मामला?
29 अप्रैल को झारखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया था कि वह 576 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र (पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला ज़िला) को अभयारण्य और अतिरिक्त 136 वर्ग किलोमीटर को संरक्षण रिज़र्व के रूप में अधिसूचित करेगी। यह इलाका दुनिया का एकमात्र प्राचीन साल वृक्षों का वन है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून ने इस संबंध में एक अनुकूल रिपोर्ट दी। इसके बावजूद राज्य सरकार ने अधिसूचना जारी करने के बजाय खनन और अन्य हितों की जांच के लिए एक नई समिति बना दी।
एमिकस क्यूरी का आरोपः
एमिकस क्यूरी और वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने अदालत को बताया कि सरकार ने जानबूझकर कोर्ट के आदेश की अनदेखी की है। उन्होंने कहा कि राज्य ने सीमा निर्धारण का बहाना बनाकर अधिसूचना टाल दी और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने से बचा।
कोर्ट ने जताई नाराजगीः
मामले पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि, ‘ऐसा प्रतीत होता है कि झारखंड सरकार न केवल टालमटोल कर रही है, बल्कि न्यायालय के साथ छल भी कर रही है। हमारा मानना है कि राज्य सर्वोच्च न्यायालय के 29 अप्रैल के आदेश की स्पष्ट अवमानना कर रहा है।’ पीठ ने कहा, ‘हम झारखंड के मुख्य सचिव को निर्देश देते हैं कि वे 8 अक्टूबर को अदालत में उपस्थित होकर कारण बताएं कि उनके खिलाफ अवमानना के लिए कार्रवाई क्यों न की जाए।’
..तो जारी होगा परमादेशः
पीठ ने राज्य के वकील से कहा कि अगर 8 अक्टूबर तक सारंडा वन को अभयारण्य घोषित करने संबंधी अधिसूचना जारी नहीं की जाती है तो मुख्य सचिव जेल जाएंगे और सुप्रीम कोर्ट वन को अभयारण्य घोषित करने के लिए परमादेश जारी करेगा।
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