रांची : इच्छाशक्ति मजबूत हो तो दिव्यांग होना सफलता की राह में बाधक नहीं बनता। इसे साबित किया है धुर्वा निवासी दिव्यांग अरुण सिंह ने। जवानी के दिनों में ही अपनी आंखों की रौशनी गंवानेवाले अरुण सिंह पहले तो रौशनी जाने से डिप्रेशन में चले गये थे पर बाद में अपनी कमजोरी को ही अपनी मजबूती बनाकर न सिर्फ उन्होंने ब्रेल लिपि सीखकर दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी की बल्कि रेलवे में नौकरी करते हुए हजारों दिव्यांगों के जीवन में बदलाव ला रहे हैं। दिव्यांगों की मदद करने के लिए उन्होंने एक संस्था लक्ष्य फॉर डिफरेंटली एबल्ड स्थापित की है। अपने जैसे लोगों का जीवन बेहतर बनाने की उनकी पहल को टाटा स्टील ने भी सराहा है और उन्हें सबल अवार्ड से सम्मानित किया है।
बचपन से ही आंखों से कम दिखायी देता था
अरुण सिंह ने बताया कि वे जन्मजात ब्लाइंड नहीं थे। पर उन्हें बचपन से ही आंखों से कम दिखायी देता था। शुरूआत में ही उन्हें ब्लैकबोर्ड और किताबों के छोटे अक्षर पढ़ने में मुश्किलें आती थीं। इसके बाद भी उन्होंने जैसे-तैसे उन्होंने इंटर तक की पढ़ाई पूरी की। बाद में जब वे ग्रेजुएशन में पहुंचे तो उन्हें आंखों से दिखायी देना बिल्कुल कम हो गया। लिखने-पढ़ने में ज्यादा समस्या होने पर उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। इसके बाद उन्हें अवसाद ने घेर लिया। उन्हें जीवन में चारो ओर अंधेरा दिखायी देने लगा। पर अरुण ने हिम्मत नहीं हारी। उन्हें पता चला कि कई ऐसी सुविधाएं हैं जिससे दृष्टिहीन पढ़-लिख सकते हैं। इसके बाद उन्होंने ब्रेल लिपि सीखी और दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया।
आंखों की रौशनी गयी है हौसला तो नहीं गया
जल्द ही अरुण इस नतीजे पर पहुंचे कि हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहने से कुछ नहीं होगा। उन्हें अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बनाना होगा। इसके बाद उन्हें रेलवे की तैयारी करनी शुरू की और जल्द की रेलवे में नौकरी पाने में सफल हो गये। पांच वर्षों से अधिक समय से वे रेलवे में नौकरी कर रहे हैं। आर्थिक मोर्चे पर सफलता हासिल करने के बाद अरुण खुश तो थे लेकिन उनके दिल में अपने जैसे लोगों की मदद करने का ख्याल शोर मचा रहा था। अरुण ने अपने दिल की सुनी और फिर अपनी संस्था बनायी जिसका नाम था लक्ष्य फॉर डिफरेंटली एबल्ड। इस संस्था का लक्ष्य था दिव्यांगों की मदद करना। इस संस्था के जरिये उन्होंने दृष्टिहीनों का जीवन आसान बनानेवाले उपकरणों तथा शिक्षा-दीक्षा में प्रयोग आनेवाली चीजों की जानकारी देनी शुरू कर दी। दृष्टिहीनों को कंप्यूटर और व्हाट्सएप चलाना सिखाने के साथ उन्हें ई मेल और फेसबुक चलाने की शिक्षा देने लगे। बाद में उन्होंने दिव्यांगों को ब्लाइंड क्रिकेट और चेस प्रतियोगिता से भी जोड़ना शुरू किया। अरुण की ये पहल रंग लायी और धीरे-धीरे दिव्यांग उनकी संस्था से जुड़ते चले गये। इसके बाद उन्होंने संस्था के जरिये ई लाइब्रेरी की स्थापना की।
अरुण की संस्था ने बनायी है सुगम्य पुस्तक
दृष्टिहीनों को पढ़ने में होनेवाली दिक्कतों को देखते हुए अरुण सिंह की संस्था लक्ष्य फॉर डिफरेंटली एबल्ड ने सुगम्य पुस्तक बनायी है जिससे दृष्टिहीन आराम से पढ़ाई कर सकते हैं। इसे मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट के जरिये पढ़ा जा सकता है। सुगम्य पुस्तक बनाने के लिए उन्हें इंडिया बुक शेयर की सहायता मिली थी।
यारों के यार हैं अरुण सिंह
अरुण सिंह समाजसेवा में तो आगे हैं ही दोस्ती निभाने में भी पीछे नहीं रहते। उनके एक खास दोस्त हैं सत्यजीत। अरुण जहां आंखों से देख नहीं सकते वहीं डोरंडा निवासी सत्यजीत पैरों से चल नहीं सकते। पर दोनों की दोस्ती एक मिसाल है। सत्यजीत चार पहियोवाली स्कूटी चलाते हैं और अरुण इस स्कूटी में पीछे की सीट पर बैठकर घूमते हैं। जब स्कूटी से सत्यजीत उतरते हैं तो हाथों में चप्पल पहनकर चलते हैं। वहीं, अरुण उन्हें सहारा देते हैं। व्हील चेयर पर सत्यजीत को बैठाकर अरुण उन्हें जगह-जगह घुमाते हैं। इस दौरान रास्ता सत्यजीत बताते हैं। सत्यजीत बताते हैं कि अरुण और उनकी दोस्ती तीन साल पुरानी है। एक कार्यक्रम के दौरान दोनों मिले थे और दोनों को एक-दूसरे का साथ पसंद आया और दोनों पक्के दोस्त बन गये। अरुण धुर्वा में रहते हैं और सत्यजीत उन्हें डोरंडा से लेने जाते हैं। अपना काम पूरा करने के बाद दोनों जगह-जगह घूमते हैं।








