रांची : आदिवासियों को शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए अलग झारखंड राज्य बना। इसे अबुआ राज भी कहा गया। लेकिन आदिवासियों की अंतिम कतार में खड़ी आदिम जनजातियां अबुआ राज में भी सियासत से दूर हैं। किसी प्रमुख पार्टी ने इन्हें विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं दिया।
लोकसभा चुनाव में तो आदिम जनजातियों को पार्टियां टिकट देती हीं नहीं। 1951 के पहले लोकसभा चुनाव से लेकर बीते 73 सालों में कभी भी इन्हें संसदीय चुनाव में प्रत्याशी नहीं बनाया गया। आदिवासियों के नाम पर बने झारखंड में भी आदिम जनजातियों के मुद्दे गौण हैं।
विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 2009 और 2019 में सिमोन मालतो को बरहेट से टिकट दिया था। झाविमो ने सिमोन को ही 2014 में ही उम्मीदवार बनाया। कांग्रेस ने शिवचरण मालतो को 2014 में लिट्टीपाड़ा से टिकट दिया था।
इससे पहले कांग्रेस ने ही 1985 में क्रिस्टो चंद्र मालतो को लिट्टीपाड़ा विधानसभा सीट पर प्रत्याशी बनाया था। वे पहाड़िया जनजाति से थे। सीपीआई ने भी अनिल असुर को एकबार विशुनपुर विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। इनमें से कोई भी जीत नहीं सका।
आदिम जनजाति का कोई भी व्यक्ति सांसद या विधायक बनना तो दूर, मुखिया भी नहीं बन सका है। ऐसा नहीं कि समुदाय के लोग केवल चुनावी मंचों से ही गायब हैं, बल्कि जिला स्तर की बैठकों में भी देखने को नहीं मिलते हैं।
सत्ता और सरकार भी संवेदनशील सामाजिक समूहों के साथ संवेदनशीलता नहीं दिखा रही है। हिल असेंबली पहाड़िया महासभा के अध्यक्ष शिवचरण मालतो कहते हैं कि नेताओं को डर है कि अगर आदिम जनजाति के लोग सशक्त हो गए, तो कहीं वैसी ही राजनीतिक पहचान न बनाने लगें, जैसा बिहार के महादलितों ने दलितों से और अति पिछड़ों ने पिछड़े वर्ग से अलग बनाई।
विधानसभा चुनाव में पार्टियों ने 3-4 बार इसलिए टिकट दिया, क्योंकि प्रतिद्वंद्वी की जीत तय थी।आदिम जनजाति समुदाय के लोग राज्य के 22 जिलों के 127 प्रखंडों और 2649 गांव में रहते हैं। जहां राज्य में आदिम जनजाति की कुल जनसंख्या 2,92,359 है।
झारखंड में वास करने वाली आठों आदिम जनजातियों असुर, कोरबा, बिरहोर, बिरजिया, माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, सबर और परहिया झारखंड में सबसे बदतर जिंदगी जीने वाले समुदायों में से हैं। अधिकतर तो खेती करना भी नहीं सीख पाए हैं।
डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान की रिपोर्ट बताती है कि इन समुदायों के शत-प्रतिशत परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं। इनमें भी बिरहोर, बिरजिया, परहिया, और सबर की स्थिति भोजन-पोषण की दृष्टि से अत्यंत ही चिंताजनक है।
विनोबा भावे यूनिवर्सिटी के मानशास्त्र के प्राध्यापक डा गंगानाथ झा कहते हैं कि हम राजनीति में हाशिए पर पड़े लोगों की बात करते हैं पर सत्ता में अत्यंत संवेदनशील आदिवासी समूहों की भागीदारी हो, इसके लिए प्रयास नहीं करते हैं। यह सिर्फ टिकट देकर नहीं होगा। पहले इनकी शैक्षणिक स्थिति को सुधारना होगा और फिर जागरुकता के माध्यम से इन्हें राजनीति के लिए तैयार कर सकते हैं।
डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान के पूर्व निदेशक रणेंद्र कहते हैं कि लोकतंत्र में जहां सिर गिने जाते हैं, वहां आदिम जनजातियों को कौन पूछेगा। कई आदिम जनजातीय समुदाय की आबादी मुश्किल से 15 हजार तक है।
पहाड़िया, माल पहाड़िया की आबादी लगभग दो लाख तक है, लेकिन ये बिखरे हुए हैं। इन्हें अब तक प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। यहां तक कि इन्हें बोर्ड निगम तक में जगह नहीं मिल सकी है।
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