ओरमांझी के इस गांव में पानी को तरस रहे लोग [People yearning for water in this village of Ormanjhi]

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रांची। जल ही जीवन है। यानी जल के बिना जीवन संभव नहीं है। पर झारखंड में ऐसी विडंबना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी 50 फीसदी लोग नदी, तालाब, कुआं और सरकारी चापानल पर निर्भर हैं।

ऐसा नहीं है कि इन्हें जल सुलभ कराने के लिए सरकार प्रयास नहीं कर रही, योजनाएं चल रही हैं, पर ये अधिकारियों की लापरवाही से परवान नहीं चढ़ पा रहीं।

झारखंड में जल जीवन मिशन योजना आज भी लक्ष्य से काफी पीछे है। यही कारण है कि आज भी गांवों में लोगों के घरों तक पानी नहीं पहुंच पा रहा है।

हालांकि गांवों के घरों में नल लग गये हैं, पाइपलाइन भी बिछ गई है, लेकिन उससे पानी नहीं आता।

ग्रामीण इलाकों में लोग आज भी चापानलों पर आश्रित हैं। हालत यह है कि एक-एक चापानल पर 200 से 250 लोग आश्रित हैं।

यह हालत तब है जब इस योजना को शुरू हुए करीब 5 साल गुजर चुके हैं, जबकि इस योजना का लक्ष्य 2024 तक पूरा हो जाना था।

यानी कि इसी साल ग्रामीण इलाकों के एक-एक घर में पाइपलाइन से पानी पहुंचा दिया जाना था। परंतु झारखंड में यह योजना लक्ष्य से भटक गई है। यहां बमुश्किल 53 प्रतिशत ही काम हो सका है।

बताते चलें कि ग्रामीण घरों तक साफ पीने का पानी पहुंचाने के लिये 2019 में केंद्र सरकार ने जल जीवन मिशन लांच किया था।

इस मिशन का लक्ष्य था कि 2024 तक देश के प्रत्येक घर में पाइपलाइन से साफ पानी पहुंचाना। 2024 के जून महीने तक देश भर में 77.30 प्रतिशत ग्रामीण घरों को इस योजना से जोड़ा जा चुका है।

लेकिन झारखंड में इस योजना की स्थिति डावांडोल है। योजना को शुरु हुए साढ़े चार साल से अधिक का समय हो चुका है।

लेकिन अब तक केवल 53.90 प्रतिशत घरों तक ही ये योजना पहुंच पाई है। इस योजना की पड़ताल करने हम रांची जिले के ओरमांझी प्रखंड के बरवे गांव पहुंचे।

हमने देखा कि इस गांव में अब भी अधिकांश लोगों को पानी के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।

लोगों के घरों तक पानी का पाइप तो बिछ चुकी है, लेकिन उममें पानी आने का कोई संकेत नहीं हैं।

महिलाएं पीने का पानी से लेकर बरतन धोने जैसे काम भी सरकारी चापाकल पर करती हैं। एक चापाकल पर 200 से 300 लोग आश्रित हैं।

पंचायत की मुखिया पूनम देवी ने बताया कि जल जीवन मिशन के कारण पीएचडी विभाग बंद पड़े चापाकल को ठीक करने में देरी करता है।

यह हाल सिर्फ एक बरवे पंचायत का ही नहीं, बल्कि अन्य गांवों का भी है। मामले में हमने जब अधिकारियों से बात करना चाहा, तो वे टाल मटोल करते दिखे।

जूनियर इंजीनियर ने कहा एसडीओ बतायेंगे, एसडीओ ने कहा कि ऐसे जानकारी लेनी हो तो ले लें, पर वह कैमरे पर बयान देने के लिए आथराइज्ड नहीं है।

आफिशियल बयान तो एक्जिक्यूटिव इंजीनियर ही दे सकते हैं। हमने तीन दिन एग्जिक्यूटिव इंजीनियर के दफ्तर के चक्कर लगाये, पर उनसे भेट ही नहीं हुई।

जूनियर इंजीनियर से जब भी संपर्क करने की कोशिश की गई, वे नहीं मिले। अंततः पीएचडी विभाग के ओरमांझी प्रखंड के एसडीओ भूपेंद्र सिंह ने बिना कैमरे के सामने आये बताया कि जल जीवन मिशन के कारण चापाकल मरम्मत का काम बाधित नहीं है। हम हर रोज एक प्रखंड में तीन से चार चापाकल की मरम्मत कर रहे हैं।

वरवे गांव के आदिवासी टोला में एक ही जगह तीन बोरिंग फेल होने की बात पर उन्होंने कहा कि हमारे पास वो उपकरण मौजूद नहीं है, जिनसे हम ग्राउंड वाटर लेवल का पता लगा सकें।

इस कारण हम अनुमान लगा कर ही बोरिंग करते हैं कि यहां पानी निकलना चाहिए। साथ ही, उन्होंने कहा कि जहां बोरिंग फेल हुई है, वहां 7 दिन में नया बोरिंग कर दिया जायेगा, ताकि लोगों को साफ पानी मिल सके।

बहरहाल गांव के लोगों को अब भी पानी का इंतजार है। देखना है कि विभाग कब तक इन ग्रामीणों के घरों तक पानी पहुंचा पाता है।

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