रांची। उन्होने कभी विधानसभा या लोकसभा का चुनाव तक नहीं लड़ा, पर अब चुनेंगी मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री। जी हां हम बात कर रहे हैं रांची की मेयर आशा लकड़ा की। जिन्हें मध्य प्रदेश का नया मुख्यमंत्री तय करने के लिए भाजपा द्वारा गठित तीन सदस्यीय पर्यवेक्षकों की टीम में शामिल किया गया है।
मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री पद के चयने के लिए भाजपा ने पर्यवेक्षकों के नाम तय कर दिया है। मध्य प्रदेश के लिए जो तीन नाम तय किए गए हैं उनमें हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, के लक्ष्मेण और रांची की मेयर आशा लकड़ा शामिल हैं। इन तीन में आशा लकड़ा का नाम शायद झारखंड के बाहर के लोगों को नया लग रहा हो।
आशा लकड़ा ने अभी तक कोई विधान सभा चुनाव नहीं लड़ा और अब मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री का चेहरा तय करने वाले पर्यवेक्षकों की टीम में होंगी। आशा लकड़ा रांची की मेयर होने के साथ-साथ भाजपा की राष्ट्रीय मंत्री हैं। झारखंड के गुमला जिले के चुहरू गांव की रहने वाली हैं। आशा के पिता हरि चरण भगत सीआरपीएफ के जवान थे। आशा की मां नहीं हैं ये चार बहनें हैं। साधारण परिवार की आशा के घर से कोई भी सदस्य का राजनीति से नहीं है।
आशा के राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से हुई। वह प्रारंभिक दौर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ी रहीं। एबीवीपी में कॉलेज सचिव से लेकर राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य तक की जिम्मेदारियां निभाईं। 2010 में आशा ने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की टीम में महिला विंग की राष्ट्रीय सचिव बनीं और दिल्ली और पश्चिम बंगाल की प्रभारी रहीं।
आज आशा लकड़ा झारखंड में भाजपा की आशा बन कर उभरी हैं। बीजेपी उन्हें बतौर महिला आदिवासी चेहरा के तौर पर आगे बढ़ा रही है। इसके संकेत तब ही मिल गये थे, जब उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया था। रांची की मेयर आशा लकड़ा को जब भाजपा ने बड़ा दायित्व दिया, तो किसी को भी एकबारगी एहसास तक नहीं हुआ कि पार्टी आखिर चाहती क्या है।
पहली बार उन्हें 2021 में इस पद की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। फिर दूसरी बार इसी साल ढाई महीने पहले उन्हें राष्ट्रीय सचिव बनाया गया। तब यह संकेत जरूर मिला कि बीजेपी आशा लकड़ा को लेकर कुछ खास प्लान जरूर कर रही है। पर अब जब उन्हें एक मुख्यमंत्री के चयन के लिए तीन सदस्यीय पर्यवेक्षकों की टीम में शामिल किया गया है, तब झारखंड से लेकर दिल्ली तक उनकी चर्चा शुरू हो गई है।
इससे पहले भी आशा लकड़ा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में काम करते हुए परिषद की राष्ट्रीय सचिव रह चुकी हैं। इसलिए बीजेपी उनकी निष्ठा से भली भांति अवगत है। और चूकि वब एबीवीपी से जुड़ी रही हैं, तो निष्ठा के साथ अनुशासन भी उनके चरित्र में कूट-कूट भरा है, जिसे पार्टी के आलाकमान भी जानते हैं। उनका सबसे बड़ा पॉलिटिकल प्लस प्वाइंट है आदिवासी महिला होना, जिसकी तलाश बीजेपी झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य में अरसे से कर रही थी। आशा का प्रोफाइल भी काफी लो रहा है।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से छात्र राजनीति में आई सीधी-सरल सी सांवली लड़की ने बहुत जल्द ही अपनी संगठन क्षमता और व्यवहार कुशलता के बल पर कॉलेज से विश्वविद्यालय होते हुए शहर और राज्य में अपनी पहचान बनाई। अब वह राष्ट्रीय स्तर अपनी पहचान बनाने की ओर अग्रसर हैं। आशा पहली बार 2014 में रांची की मेयर बनीं। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के भरोसेमंदों की सूची में आशा ने जगह बना ली है। अमित शाह भी उन पर भरोसा जता चुके हैं, तब ही तो 2021 में उन्हें पहली बार राष्ट्रीय मंत्री बनाया गया था। झारखंड से राष्ट्रीय मंत्री के पद पर नियुक्त होने वाली आशा लकड़ा एकमात्र महिला हैं।
इसके अलावा वह भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा की छत्तीसगढ़ और अरूणाचल प्रदेश की प्रभारी भी हैं। बताते चलें कि छत्तीसगढ़ में भी बीजेपी को शानदार जीत मिली है और आदिवासी बहुल क्षेत्र में सफलता भी मिली है।
संभवत: इसका ईनाम भी आशा लकड़ा को मिला है। यदि इसी प्रकार वह आगे बढ़ती रहीं, तब वह दिन दूर नहीं, जब वह झारखंड में बाबूलाल के मुकाबले दूसरा आदिवासी चेहरा बन जायें। इसमें भी संशय नहीं होना चाहिए कि आनेवाले समय में राजनीति के किसी मोड़ पर आशा लकड़ा भी बीजेपी के लिए द्रोपदी मुर्मू की तरह ही तुरूप का एक्का साबित हों।








