पदस्थापन की प्रतीक्षा में दिन काट रहे हैं एक दर्जन से ज्यादा आइएएस और आइपीएस पदाधिकारी

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दयानंद राय

रांची : झारखंड विडंबनाओं का प्रदेश है। विडंबनाओं का इसलिए क्योंकि एक ओर जहां यह प्रदेश आइएएस और आइपीएस अधिकारियों की कमी का रोना रोता है। वहीं, दर्जनों आइएएस और आइपीएस अधिकारी पदस्थापन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

इनके अलावा झारखंड प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को भी पदस्थापन की प्रतीक्षा में पेंडुलम की तरह लटका कर रखा गया है। सरकार इन्हें बैठा कर पैसे दे रही हैं। करोड़ों रुपये इनके वेतन पर खर्च हो रहे हैं, पर इनके पास कोई काम नहीं है। अपने-अपने जिलों में उत्कृष्ट काम करनेवाले आइएएस अधिकारियों को वेटिंग फॉर पोस्टिंग में रखा गया है। इनमें भोर सिंह यादव सुशांत रंजन जैसे नाम शामिल हैं।

भोर सिंह यादव ने तो रांची में अपने पदस्थापन के दौरान तेल में मिलावट करनेवाले कारोबारियों पर नकेल कस दिया था। वहीं, सुशांत गौरव अपने कार्यों के लिए प्रधानमंत्री से सम्मानित हो चुके हैं। गुमला जिले का डीसी रहते 16वें सिविल सर्विस डे के मौके पर उन्हें सम्मानित किया गया था। कुल नौ ऐसे आइएएस अधिकारी हैं जो अलग-अलग जिलों के डीसी के रूप में कार्यरत थे और बीते दो सप्ताह से अधिक समय से वे पदस्थापन की प्रतीक्षा में हैं।

अब विडंबना देखिए। झारखंड में आदिवासी कल्याण आयुक्त और उत्पाद आयुक्त जैसे पदों पर किसी की नियुक्ति नहीं की गयी है। कृषि निदेशक, पशुपालन निदेशक, गव्य निदेशक और सहयोग समितियों के रजिस्ट्रार का पद भी खाली पड़ा हुआ है। चूंकि इन पदों पर अधिकारी ही नहीं हैं तो जाहिर है कि यहां के कामकाज पर इसका असर हो रहा है। लेकिन सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही।

अब एक नजर राज्य की कानून व्यवस्था पर डालें। राज्य में हाल में ही माकपा नेता सुभाष मुंडा की हत्या कर दी गयी। इस घटना के बाद भी राज्य की कानून व्यवस्था पर सवाल उठे थे। लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति को सुधारने में सक्षम पुलिस अधिकारियों की फौज रहते हुए भी वे पदस्थापन की प्रतीक्षा के लिए दिन गिन रहे हैं। चंदन कुमार झा, अनुरंजन किस्पोट्टा, सुभाष जाट, चंदन कुमार सिन्हा, अमित रेणु और अनंत प्रकाश जैसे दर्जनों नाम हैं जो पदस्थापन की प्रतीक्षा में हैं।

सिलसिला यहीं नहीं रुकता

यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता। झारखंड बनने के बाद पहली बार राज्य में नगर विकास और आवास विभाग में 78 पदाधिकारियों की नियुक्ति हुई है। इनमें 65 कार्यपालक पदाधिकारी और 15 लेखा पदाधिकारी शामिल हैं। जब इन्हें नियुक्ति पत्र मिला तो इनकी खुशियों का ठिकाना नहीं रहा। इन सबको लग रहा था कि इन्होंने जिंदगी की जंग जीत ली है। अब संघर्ष रंग लाया है, लेकिन इन्हें क्या पता था कि मायूसी फिर इनके हिस्से में आनेवाली है।

प्रशिक्षण पूरा होने के बाद इन्हें लगा कि अब नियमित वेतन मिलेगा और वे पूरी दक्षता से अपना काम करेंगे लेकिन इनका यह ख्वाब टूट गया। हाल यह है कि बीते छह महीने से वे पदस्थापन की प्रतीक्षा कर रहे हैं लेकिन यह प्रतीक्षा खत्म होने का नाम नहीं ले रही है।

चूंकि पदस्थापन नहीं हुआ तो वेतन भी नहीं मिल रहा और वेतन नहीं मिल रहा तो उधार के सहारे जिंदगी चलानी पड़ रही है और बकायेदारों के ताने सुन-सुनकर इनके कान पकने लगे हैं। नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया कि अब तो लोगों को यह बताने में भी शर्म आती है कि हम अफसर हैं। क्योंकि हमारे पास कोई काम नहीं है। दुकानदारों का बकाया इतना हो गया है कि वे कहने लगे हैं कि अब पिछला बकाया चुकाओ तभी नया उधार मिलेगा।

मुख्यमंत्री भी कर चुके हैं कमी की शिकायत

एक तरफ तो काम करनेवाले अधिकारी पदस्थापन की प्रतीक्षा में बैठे दिन काट रहे हैं वहीं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राज्य में आइएएस अधिकारियों की कमी से केंद्र सरकार को अवगत कराया था। कुछ महीने पहले उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर राज्य में आईएएस अफसरों की कमी से अवगत कराया था।

उन्होंने राज्य सरकार से एनओसी लिए बगैर केंद्र द्वारा आईएएस अफसरों की सेवा सीधे केंद्रीय तैनाती पर भेजे जाने के नियम लागू करने के प्रस्ताव पर विरोध जताया था।

बताते चलें कि आईएएस-आईपीएस संवर्ग को मिलाकर राज्य में कुल 373 पद हैं, जिनमें से 88 पद खाली पड़े हैं। झारखंड कैडर के 18 सीनियर आईएएस और 22 आईपीएस अगले कुछ वर्षों के लिए केंद्रीय तैनाती पर हैं। आईएएस के 224 पद हैं, जिनमें केवल 170 अधिकारी ही कार्यरत हैं। इस तरह 54 पद खाली पड़े हैं। दो आईएएस पूजा सिंघल और छविरंजन मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जेल में हैं।

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