जानिये क्या है सरना धर्म कोड और क्यों हो रही इसकी मांग

IDTV Indradhanush
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रांची। राज्य के कई आदिवासी संगठन 12 मार्च को महारैली करने जा रहे हैं। यह महारैली राजधानी रांची के मरोहाबादी मैदान में होगी। इसमें देश के अलग-अलग राज्यों से लोग आयेगे। साथ ही नेपाल, भूटान, बांग्लादेश जैसे देशों भी लोग भी रैली में भाग लेंगे। उनकी मांग है कि जनगणना फार्म में सरना धर्म कोड शामिल किया जाये।

बताते चलें कि वर्ष 2020 में झारखंड विधानसभा में सरना आदिवासी धर्म कोड प्रस्ताव पारित हुआ था। इसमें आदिवासियों को अलग धर्म का दर्जा देने की बात कही गई थी। इसे लागू करने के लिए केंद्र की मंजूरी अब तक नहीं मिली है।

कई वर्षों से कर रहे आंदोलन

इस मांग को लेकर आदिवासी संगठन पिछले कई वर्षों से आंदोलन कर रहे हैं। दरअसल सरना धर्म कोड को आदिवासियों के अस्तित्व से जुड़ा बताया जाता है।

 झारखंड में जगह-जगह पर लगे लाल और सफेद झंडे यहां के आदिवासियों की पहचान हैं।  यह जनजातीय समुदाय का पवित्र प्रतीक चिन्ह है। इसे सरना झंडा कहा जाता है।

सरना आदिवासियों के पूजा स्थल को भी कहा जाता है। यहां बताना जरूरी है कि आदिवासियों में प्रकृति पूजा का विधान है। वे यह मानते हैं कि आदिवासी कोई धर्म नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है।

आदिवासी समुदाय की ज्यादातर आबादी  हिंदू धर्म की मान्यताओं एवं संस्कारों के करीब है। ये भी आदि काल से हिंदुओं के आराध्य देवी-देवताओं की पूजा करते रहे हैं। पेड़-पौधे और पहाड़ों की भी ये पूजा करते हैं।

जनगणना में अलग कोड की मांग

इन सबके बावजूद आदिवासियों के लिए अलग से जनगणना में धर्म कोड की मांग हाल के वर्षों में जोर-शोर से उठी है।

बड़े वोट बैंक को देखते हुए झारखंड में सक्रिय सभी राजनीतिक दल इस मुद्दे को हवा देते हैं। तमाम प्रमुख दलों ने अपने चुनावी घोषणापत्र में सरना धर्मकोड की वकालत की है।

गेमंत सोरेन सरकार ने सरना धर्म कोड को मान्यता देने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा है।

साथ ही आग्रह किया गया है कि  जनगणना के दौरान आदिवासियों के लिए अलग से धर्म कोड का कॉलम दिया जाये।

केंद्र पहले भी ठुकरा चुका है प्रस्ताव

बता दें कि, झारखंड के आदिवासियों को जनगणना में अलग से धर्म कोड का प्रस्ताव केंद्र सरकार पहले भी ठुकरा चुकी है।  पूर्व में इस संबंध में विभिन्न आदिवासी संगठनों के आग्रह पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने स्पष्ट कहा था कि यह संभव नहीं है।

इस संबंध में रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया ने कहा है कि पृथक धर्म कोड, कॉलम या श्रेणी बनाना व्यावहारिक नहीं होगा।

अगर जनगणना में धर्म के कॉलम के अतिरिक्त नया कॉलम या धर्म कोड आवंटित किया गया तो बड़ी संख्या में पूरे देश में ऐसी और मांगे उठेंगी।

फिलहाल जनगणना में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन इन छह धर्मो को 1 से 6 तक के कोड नमंबर दिये जाते हैं।

ईसाई मिशनरियां भी ले रहीं दिलचस्पी

झारखंड में इसाई मिशनरियां भी राजनीति में खूब दिलचस्पी लेती हैं। वे दखलंदाजी का कोई मौका नहीं चूकतीं।  सरना धर्म कोड को मान्यता दिलाने के सवाल पर भी इनकी सक्रियता देखते बनती है।

वहीं, कुछ इसाई धर्म गुरु का कहना है कि सरना धर्म कोड लागू होने के बाद भी अगर कोई आदिवासी समाज के लोग इसाई धर्म को स्वीकार करते हैं तो उसे इसाई ही माना जायेगा।

करीब 41 लाख हैं सरना धर्मावलंबी

2011 की जनगणना में पूरे देश में 40,75,246 लोगों ने अपना धर्म सरना दर्ज कराया था। इसमें सबसे अधिक 34,50,523 झारखंड में थे। इसके बाद ओडिशा में 3,53,520, पश्चिम बंगाल में 2,24,704, बिहार में 43,342, छत्तीसगढ़ में 2450 और मध्य प्रदेश में 50 लोगों ने खुद का धर्म सरना बताया था।

अलग-अलग समुदायों में मान्यताएं भी अलग-अलग

झारखंड और इसके पड़ोसी राज्यों में मौजूद जनजातीय समुदाय के लोग खुद को सरना धर्म से जुड़ा बताते हैं। लेकिन ज्यादातर राज्यों के आदिवासी अलग-अलग मान्यताओं से जुड़े हैं।

 झारखंड में 32 आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते हैं। इनमें संताल, मुंडा, खड़िया, गोंड, कनबार, उऱांव, खड़िया, कोल, सावर, असुर, बैगा, बंजारा, बथूड़ी, बेदिया, बिंझिया, बिरहोर, बिरजिया, चेरो, चिक बड़ाईक, गोराइत, हो, करमाली, खरवार, खोंड, किसान, कोरा, कोरबा, लोहरा, महली, माल पहाड़िया, पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया और भूमिज शामिल हैं।

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