Jharkhand EV policy 2025
रांची। झारखंड की खनन भूमि अब केवल अतीत की औद्योगिक विरासत नहीं रह जाएगी, बल्कि आने वाले समय में हरित विकास की मजबूत आधारशिला बन सकती है। पर्यावरण थिंक टैंक आई-फॉरेस्ट (इंटरनेशनल फोरम फॉर एनवायरनमेंट, सस्टनेबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी) की नई अध्ययन रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि खनन भूमि के रणनीतिक पुनः उपयोग, नवीकरणीय ऊर्जा और कम-कार्बन उद्योगों को बढ़ावा देकर झारखंड देश के नेट-जीरो लक्ष्य की दिशा में अहम भूमिका निभा सकता है।
हरित विकास के मार्ग
यह रिपोर्ट राज्य-स्तरीय सम्मेलन “झारखंड में न्यायसंगत संक्रमण और हरित विकास के मार्ग” के दौरान जारी की गई। सम्मेलन में राज्य सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र, उद्योग जगत और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। रिपोर्ट में कहा गया है कि झारखंड में बंद और गैर-संचालित कोयला खदानों से फिलहाल 11 हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि उपलब्ध है, जिसका तुरंत उपयोग किया जा सकता है।
आई-फॉरेस्ट के अध्ययन के अनुसार
आई-फॉरेस्ट के अध्ययन के अनुसार अगले 5 से 10 वर्षों में यह उपलब्ध भूमि बढ़कर करीब 45 हजार हेक्टेयर तक पहुंच सकती है। धनबाद, बोकारो और रामगढ़ जैसे प्रमुख खनन जिलों में इस भूमि का योजनाबद्ध और पर्यावरण-अनुकूल पुनः उपयोग नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं, ग्रीन इंडस्ट्री, ईवी मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में नए अवसर पैदा कर सकता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि खनन भूमि का हरित विकास के लिए इस्तेमाल न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और सतत आर्थिक विकास का भी मार्ग प्रशस्त करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सही नीति और निवेश के साथ इन क्षेत्रों को विकसित किया जाए, तो झारखंड हरित अर्थव्यवस्था के मॉडल राज्य के रूप में उभर सकता है।

