दयानंद राय
देश में आदिवासियों की संख्या 11 करोड़ से अधिक है और इनकी परंपराओं में एक प्रमुख परंपरा पत्थलगड़ी है। असल में पत्थलगड़ी आदिवासी समाज की वह परंपरा है जिसके तहत ज़मीन पर एक पत्थर या शिलालेख गाड़ा जाता है। झारखंड में मुंडा, भूमिज और हो जाति के आदिवासी मृत्यु के बाद मृतक की निशानी के तौर पर उत्कीर्ण पत्थरों को खड़ा करते हैं, इस परंपरा को पत्थलगड़ी कहते हैं।
इसका एक खास मकसद होता है और इसपर कोई संदेश लिखा होता है। यह सदियों से आदिवासी परंपरा का हिस्सा रहा है। जब से जनजातियों के पास अपनी कोई लिखित भाषालिपि तक नहीं थी तब से पत्थलगड़ी होती रही है। यह आदिवासियों के स्वशासन का औजार है।
पत्थलगड़ी आदिवासियों के लिए अपनी ज़मीन के मालिकाना हक़ के पट्टे की तरह भी है। पत्थलगड़ी उन पत्थर स्मारकों को कहा जाता है जिसकी शुरुआत इंसानी समाज ने हजारों साल पहले की थी। यह एक पाषाणकालीन परंपरा है जो आदिवासियों में आज भी प्रचलित है।
माना जाता है कि मृतकों की याद संजोने, खगोल विज्ञान को समझने, कबीलों के अधिकार क्षेत्रों के सीमांकन को दर्शाने, बसाहटों की सूचना देने, सामूहिक मान्यताओं को सार्वजनिक करने आदि उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रागैतिहासिक मानव समाज ने पत्थर स्मारकों की रचना की।
पत्थलगड़ी की इस आदिवासी परंपरा को पुरातात्त्विक वैज्ञानिक शब्दावली में ‘महापाषाण’,‘शिलावर्त’और मेगालिथ कहा जाता है। दुनिया भर के विभिन्न आदिवासी समाजों में पत्थलगड़ी की यह परंपरा मौजूदा समय में भी बरकरार है। झारखंड के मुंडा आदिवासी समुदाय इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं, जिनमें कई अवसरों पर पत्थलगड़ी करने की प्रागैतिहासिक और पाषाणकालीन परंपरा आज भी प्रचलित है।
कायदे से पत्थलगड़ी कई प्रकार का होता है। जानकारों का मानना है कि पत्थलगड़ी के कम से कम 40 प्रकार हैं, लेकिन वर्तमान सात प्रकार के पत्थलगड़ी ही प्रचलित हैं। भूमिज और मुंडा आदिवासियों के अनुसार पत्थलगड़ी चार तरह की होती है। इसमें पहली है ससनदिरि: यह दो मुंडा शब्दों ‘ससन’ और ‘दिरि’ से मिलकर बना है। ‘ससन’ का अर्थ श्मसान अथवा कब्रगाह है जबकि ‘दिरि’ का अर्थ पत्थर होता है।
ससनदिरि में मृतकों को दफनाया जाता है और उनकी कब्र पर पत्थर रखे जाते हैं। ससनदिरि में मृतकों की याद में रखे जाने वालों पत्थरों का आकार चौकोर और टेबलनुमा होता है। झारखंड में मुंडाओं का सबसे प्राचीन और विशाल ससनदिरि चोकाहातु गांव में है। रांची से 80 किलोमीटर रांची-जमशेदपुर मार्ग पर सोनाहातु से आगे चोकाहातु स्थित ‘ससनदिरि’7 एकड़ में फैला विशाल मेगालिथ क्षेत्र है।
यहां 7600 से ज्यादा मृतक स्मारक पत्थर है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह कम से कम 2500 साल पुराना है जहां आज भी मुंडा लोग मृतकों को दफनाते हैं या फिर मृतकों के ‘हड़गड़ी’ की रस्म संपन्न करते हैं। पटमदा स्थित गांव के भूमिज हाड़शाली में प्राचीन भाषा में लिखे मेगालिथ है जहां भूमिज लोग आज भी मृतकों के हड़गड़ी का रस्म सम्पन्न करते हैं। पत्थलगड़ी का दूसरा प्रकार बुरूदिरि और बिरदिरि है।
मुंडा भाषाओं में ‘बुरू’ का अर्थ पहाड़ और ‘बिर’ का अर्थ जंगल होता है। इस तरह के पत्थर स्मारक यानी पत्थलगड़ी क्षेत्रों, बसाहटों और गांवों के सीमांकन की सूचना के लिए की जाती है। वहीं, तीसरा प्रकार टाइडिदिरि है। ‘टाइडि’ राजनीतिक अर्थ को व्यक्त करता है। सामाजिक-राजनीतिक निर्णयों और सूचनाओं की सार्वजनिक घोषणा के रूप में जो पत्थर स्मारक खड़े किए जाते हैं उन्हें टाइडिदिरि पत्थलगड़ी कहा जाता है।
वहीं चौथा हुकुमदिरि है। हुकुम अर्थात दिशानिर्देश या आदेश। जब मुंडा आदिवासी समाज कोई नया सामाजिक-राजनीतिक या सांस्कृतिक निर्णय लेता है तब उसकी उद्घोषणा के लिए इसकी स्थापना की जाती है। हालांकि पत्थलगड़ी एक पुरानी परंपरा है पर वर्ष 1996 में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्र का विस्तार) अधिनियम अस्तित्व में आने के बाद आदिवासी कार्यकर्ताओं, पूर्व आईएएस अधिकारी बीडी शर्मा (अब दिवंगत) और आईपीएस अधिकारी बंदी उरांव ने गांवों के बाहर पत्थर लगाने की प्रथा शुरू की, जिसके बाद इस प्रथा को एक नया अर्थ मिला।
उस अधिनियम ने ग्राम सभाओं या पंचायतों को अपनी परंपराओं, सामुदायिक स्थानों और संस्कृति की सुरक्षा और संरक्षण करने का अधिकार दिया और उन्हें भूमि अधिग्रहण में अनिवार्य परामर्श का अधिकार दिया। दोनों सिविल सेवकों ने आदिवासियों के बीच उनके अधिकारों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए पेसा अधिनियम के प्रावधानों को पत्थरों पर उकेरा।
हरे रंग से रंगे ये पत्थर आमतौर पर 15 फीट लंबे और 4 फीट चौड़े होते हैं, और झारखंड के चार जिलों में पाए जाते हैं, जिनमें आदिवासी आइकन बिरसा मुंडा की जन्मस्थली खूंटी भी शामिल है। पत्थरों में पेसा अधिनियम और भारत के संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंश शामिल हैं, जो ‘अनुसूचित क्षेत्रों’ के साथ-साथ उस क्षेत्र में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित है।
पत्थर स्थानीय ग्राम पंचायत द्वारा स्व-शासन का संकेत देते हैं, गांव को संप्रभु क्षेत्र घोषित करते हैं और गांव में बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगाते हैं। आंदोलन के समर्थक ग्राम सभा को सर्वोच्च प्राधिकारी भी घोषित करते हैं और राज्य और केंद्र सरकारों की बात मानने से इनकार करते हैं।
बिरसा मुंडा की मृत्यु के आठ साल बाद 1908 में सीएनटी एक्ट बनाया गया था। यह अधिनियम उत्तर और दक्षिण छोटानागपुर और पलामू प्रमंडलों तक फैला हुआ है। वहीं, एसएनटी अधिनियम 1949 में पारित किया गया था, जो पूर्वी झारखंड में संथाल परगना क्षेत्र में दुमका, साहिबगंज, गोड्डा, देवघर और पाकुड़ तक फैला हुआ था।
साथ में, इन अधिनियमों ने आदिवासियों को विशेष सुरक्षा और भूमि अधिकार प्रदान किए और संबंधित ग्राम सभा की अनुमति के बिना आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों को हस्तांतरित करने या भूमि के व्यावसायिक उपयोग पर रोक लगा दी।
मई 2016 में, भाजपा सरकार ने दो अध्यादेश पेश किए – छोटानागपुर किरायेदारी अधिनियम 1908 (संशोधन) अध्यादेश और संथाल परगना किरायेदारी अधिनियम 1949 (संशोधन) अध्यादेश, जिसने आदिवासी भूमि के व्यावसायिक उपयोग को सक्षम बनाया और इसे आसानी से हस्तांतरणीय बना दिया।
इस अधिनियम ने सरकार को गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए आदिवासियों से कृषि भूमि खरीदने का अधिकार दिया। अध्यादेश लाए जाने के बाद पत्थलगड़ी प्रथा को फिर से प्रमुखता मिली, आदिवासी लोगों ने विरोध के निशान के रूप में नए पत्थर खड़े किए।
उन्होंने इसे ” जल-जंगल-ज़मीन ” (जल, जंगल और ज़मीन) की लड़ाई का नाम दिया । अध्यादेश जून 2017 में झारखंड विधानसभा द्वारा पारित किए गए थे, लेकिन झामुमो, कांग्रेस, वामपंथी जैसे राजनीतिक दलों के साथ-साथ राज्य के निवासियों की आपत्तियों के बाद, झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने सरकार से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा।
बाद में सरकार ने अध्यादेश वापस ले लिये। जून 2018 में, एक एनजीओ की पांच महिलाएं, जो मानव तस्करी के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने के लिए खूंटी जिले में थीं, का कथित तौर पर अपहरण और बलात्कार किया गया था। पुलिस ने इस अपराध के लिए पत्थलगड़ी आंदोलन के नेताओं को जिम्मेदार ठहराया। एक रिपोर्ट के अनुसार, जून 2017 और जुलाई 2018 के बीच 10,000 से अधिक लोगों पर राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया था, जब आंदोलन अपने चरम पर था, जो “संभवतः किसी भी जिले में एक समय में दर्ज किए गए लोगों की सबसे अधिक संख्या है।” भारत”।
इन लोगों पर “सरकार के खिलाफ असंतोष की भावना भड़काने या भड़काने का प्रयास करने” के लिए मामला दर्ज किया गया था। इसके बाद स्थानीय निवासियों ने 2019 के लोकसभा चुनाव का बहिष्कार करने का फैसला किया। हालांकि इस पत्थलगड़ी आंदोलन ने राज्य की तत्कालीन रघुवर सरकार के खिलाफ आदिवासियों का आक्रोश भड़का दिया था। इस घटना के बाद वर्ष 2019 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा और पार्टी सत्ता से बाहर हो गयी।
इसके बाद सत्ता में आयी हेमंत सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट की बैठक में पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े लोगों पर हुए सारे केस वापस ले लिए। हालांकि पत्थलगड़ी आंदोलन की तह में जाए तो साफ होता है कि इसके पीछे की वजह आदिवासी समुदाय की अपनी जमीन बचाने की कोशिश और सरकार का आदिवासियों की जमीन लेने के लिए हर हथकंडा अपनाना ही लगता है।
झारखंड की धरती खनिज संपदाओं से पटी पड़ी है। यहां कोयला, लोहा, यूरेनियम, अभ्रक समेत कई अन्य खनिज संपदा पाए जाते हैं और इसके लिए दर्जनों फैक्ट्रियां हैं जिनमें टाटा, रूंगटा, बिरला, जिंदल के अलावा हाल के दिनों में अडानी तक का कारोबार पसर चुका है।
झारखंड में किस किस तरह की जमीन है जिस पर यहां के आदिवासी-मूलवासियों का अधिकार है, इस बारे में 71 वर्षीय वरिष्ठ अधिवक्ता और झारखंड की जमीनों के कानून के जानकार रश्मि कात्यायन बताते हैं, “झारखंड में करीब 160 गांव खूटकट्टी हैं। इनमें लगभग 150 गांव अकेले खूंटी जिले में है। 2 हजार 482 भुईंहरी गांव है, जो गुमला, सिमडेगा, लोहरदग्गा, लातेहार रांची और खूंटी के कुछ हिस्सों में आते हैं। इस पर आदिवासी-मूलवासियों का सामुदायिक अधिकार है।
खूटकट्टी और भुईंहरी जमीन पर भूमि सुधार कानून लागू नहीं होता है। वे इस जमीन पर कोई टैक्स भी नहीं देते हैं। संथाल परगना में इसी तरह की प्रधानिक खाता की जमीन होती है जिस पर पूरे गांव का अधिकार होता है। राज्य में पिछली रघुवर सरकार ने भुईंहरी जमीन में से वन-थर्ड जमीन को लैंड बैंक में शामिल कर लिया था, जिसकी लड़ाई चल रही है।
यह सब खेतिहर जमीन थी। लैंड बैंक में इस जमीन को चिन्हित किया जाना एकदम गलत है।” स्वामित्व योजना और गांवों में होने वाले ड्रोन सर्वे के सवाल पर वह कहते हैं, “हमसे भी बात हुई थी झारखंड सरकार के राजस्व विभाग से. योजना को लॉन्च करने से पहले राज्य सरकार से भारत सरकार ने इस पर 30 दिनों के अंदर जवाब मांगा था। जवाब में राज्य सरकार ने शायद, पांचवी अनुसूची के तहत प्राप्त स्पेशल प्रोविजन (विशेष प्रावधान) का मामला उठाया है। खूटकट्टी और भुईंहरी जमीन समेत सीएनटी-एसपीटी एक्ट पर केंद्र सरकार से स्पष्टता मांगी है कि सर्वे के दौरान इनका क्या होगा।
क्योंकि यह सारी चीजें राज्य का प्रोटेक्टिव स्ट्रक्चर (संरक्षित ढांचा) है। यहां गांवों में सरना, मसना, चारागाह आदि ये सब तो आएगा नहीं पापर्टी कार्ड में, तो आप इसे सर्वे कार्ड में उड़ा दे रहे हैं न। कोई बात सपष्ट नहीं है अब तक. कम से कम जिन छह राज्यों में प्रॉपर्टी कार्ड दिए गए हैं, उसका एक सैंपल भी मिले, तभी न हमारे जैसा आदमी कुछ कह पाएंगे।” इस योजना को लेकर आदिवासी समाज में जो भय है रश्मि कात्यायन उसे स्वाभाविक मानते हैं। वह कहते हैं, “पिछली राज्य सरकार ने पुराना सारा अधिकार अभिलेख ऑनलाइन कर दिया है और उसमें बहुत हेराफेरी है।
हमें लगता है कि स्वामित्व में भी यही होने वाला है। उस हिसाब से आदिवासी-मूलवासी का डर जायज है। एक सर्वे जमीन पर आपके आखों के सामने होता है लेकिन यह तो हवा में होगा तो आपको पता ही होगा कि क्या हो रहा है, और क्या होगा। जैसे आपने 1932 के खतियान के अधिकार अभिलेख को ऑनलाइन कर दिया और उसमें हुआ यह कि जो अधिकार अभिलेख का 17 ऑफलाइन कॉलम होता था, वह ऑनलाइन में घटकर 13 कॉलम हो गया। आपने बाकी चार कॉलमों को क्यों उड़ा दिया।
इससे विश्वास खत्म होगा ही।” दयामनी बारला का कहना है कि राज्य में पहले से ही खतियान को ऑनलाइन किए जाने का खमियाजा यहां का आदिवासी समाज उठा रहा है। उन्होंने कहा, “हमें जमीन के मामले में पहले ही उलझा कर रख दिया गया है। स्वामित्व और उलझाने और लड़ाई करवाने वाली योजना है । पहले इन्होंने 1932 के खतियान के आधार पर जमीन की रसीद कटवाने की प्रक्रिया को जब से (2016 में पिछली रघुवर दास की सरकार में यह शुरू हुआ था) से आनलाइन किया है तब से आदिवासियों की एक बड़ी आबादी को परेशानी झेलनी पड़ रही है। काफी गड़बडियां कर दी है इन्होंने (सरकार ने)। कहीं किसी का नाम है तो प्लॉट नंबर नहीं है, रकबा नहीं है। कहीं नाम है तो पता गलत है। अब इसे ठीक करवाने के लिए बीते पांच साल से लोग दौड़ रहे हैं लेकिन अबतक ठीक नहीं हो पाया है। इस वजह से लोग टैक्स की रसीद नहीं कट पा रहे हैं। और उस पर से यह स्वामित्व योजना उन्हें और बेघर कर देगी।”
ग्लैडसन डुंगडुंग कहते हैं, “स्वामित्व योजना पांचवी अनुसूची को नष्ट कर देगी। ग्राम सभाओं की ताकत को समाप्त कर देगी। इसके खिलाफ आदिवासी-मूलवासियों को जागना पड़ेगा। हेमंत सरकार से अनुरोध है कि वह संविधान के अनुच्छेद 19 के उप अनुच्छेद 5 व 6 में दिए गए अधिकार का इस्तेमाल कर इस योजना को लागू होने से रोकें. अन्यथा इसका जबरदस्त विरोध होगा, जैसे सीएनटी-एसपीटी एक्ट के संशोधन का हुआ था।” कुछ इसी तरह की बात दयामनी बारला भी कहती हैं। उनके मुताबिक, “पहले इस योजना को नहीं लागू करने की सरकार से अपील करेंगे. अगर सरकार नहीं मानी तो आंदोलन होगा। और इसमें समस्त आदिवासी व मूलवासी समाज मिलकर लड़ेगा, जैसे सीएनटी-एसपीटी एक्ट के संशोधन के खिलाफ लड़ा था।”
झारखंड में बीते तीन साल से अधिक समय से हेमंत सोरेन के नेतृत्व में यूपीए (झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस, राजद) सरकार है। आदिवासियों के मुद्दों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि आदिवासियों के मुद्दों पर हेमंत सोरेन की सरकार को भी सराहा नहीं जा सकता है। इन लोगों के मुताबिक झारखंड की हेमंत सरकार पिछली बीजेपी सरकार की नीतियों को आगे बढ़ा रही है।
लैंड बैंक का अब तक अस्तित्व में रहने को एक बड़े उदाहरण के तौर पर देखते हैं क्योंकि विपक्ष में रहते हुए हेमंत सोरेन ने झारखंड लैंड बैंक को मुद्दा बनाया था और सत्ता में आने पर इसे खत्म करने की बात कही थी। लैंड बैंक के अस्तित्व के सवाल पर झारखंड सरकार के पंचायती राज मंत्री आलमगीर आलम का कहते हैं, “लैंड बैंक अस्तित्व में नहीं है ऐसा समझ लीजिए।”
लेकिन आधिकारिक रूप से तो वह अस्तित्व में है और जो जमीन चिन्हित की गई है, उसका क्या? इस पर वह कहते हैं कि अब नए सिरे से चिन्हित नहीं की जा रही है और जो चिन्हित हुई हैं वे वैसी ही हैं। वह आगे कहते हैं कि सारी चिन्हित जमीनों को ऑपेन (सार्वजनिक) कर दिया जाएगा। क्या जो जमीन ली गई है लैंड बैंक में, उसे लौटाया जाएगा? इसके जवाब में वह कहते हैं कि निश्चित तौर पर उसे लौटाया जाएगा।
लेकिन यह भी सच्चाई है कि बीते एक साल में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कई उद्योगपतियों को झारखंड में निवेश का न्योता दिया है। इसी साल झारखंड औद्योगिक एवं निवेश संवर्धन नीति (जेआईआईपीपी) का बनाया जाना और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय इन्वेस्टर्स समिट में शामिल होकर कारोबारी घरानों से सीधी बातचीत, भविष्य में जल, जंगल, जमीन से जुड़े मुद्दों पर एक बार फिर से बहस और आंदोलन की लकीर खींच सकती है।
झारखंड के 24 जिलों में से 13 जिले पांचवी अनुसूची में आते हैं. यहां के आदिवासी-मूलवासी पेसा कानून, वनाधिकार कानून को सख्ती से और सही लागू किए जाने की मांग लंबे समय से करते आ रहे हैं। दूसरी तरफ सीएनटी-एसपीटी एक्ट है जो कई संशोधन के बाद भी आदिवासियों की जमीनों के लिए एक कवच के तौर पर देखा जाता है. पिछली रघुवर सरकार ने इसमें संधोधन करने की कोशिश की थी, लेकिन राज्य भर में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शन के बाद उसे अपना निर्णय वापस लेना पड़ा था।
इन दोनों एक्ट में जो प्रमुख प्रावधान हैं उसके मुताबिक आदिवासियों की जमीनों की खरीद-बिक्री पर रोक है. एसपीटी यानी संथाल परगना टीनेंसी एक्ट 1949 के तहत कोई बाहरी व्यक्ति जमीन की खरीद-बिक्री नहीं कर सकता है। यहां तक कि एक आदिवासी अपनी जमीन केवल आदिवासी को बेच सकता है। छोटानागपुर टीनेंसी एक्ट यानी सीएनटी के तहत भी कोई बाहरी व्यक्ति जमीन की खरीद-बिक्री नहीं सर सकता है। इसमें सिर्फ एक ही थाना के अंतर्गत आने वाले आदिवासी एक-दूसरे को जमीन बेच-खरीद सकते हैं।
राज्य में पिछली रघुवर सरकार में हुए जमीन से जुड़े पत्थलगड़ी आंदोलन को लेकर देश-दुनिया तक खबर हुई थी। तब कि सरकार ने इस आंदोलन को गैर संवैधानिक बताया था और इससे जुड़े दस हजार लोगों पर देशद्रोह का मुकदमा हुआ था। मौजूदा सरकार ने तब विपक्ष में रहते हुए इस मुद्दे को चुनावी सभा में खूब भुनाया था और कहा था कि उनकी पार्टी सत्ता में आई तो सभी के ऊपर से मुकदमा वापस लिया जाएगा।
हालांकि हेमंत सोरेन ने सत्ता संभालते ही कैबिनेट की पहली बैठक में निर्णय लिया कि पत्थलगड़ी से जुड़े लोगों पर हुए देशद्रोह के मुकदमों को वापस लिया जाएगा लेकिन खबरों की माने तो उन पर से मुकदमा अब तक नहीं हटा है। इन सब बातों से क्या पता चलता है। इनसे यही पता चलता है कि झारखंड ही नहीं पूरे देश में पत्थलगड़ी का इतिहास बेहद पुराना है और यह खासतौर से देश में चर्चा का विषय झारखंड में रघुवर सरकार के कार्यकाल के दौरान बना। आदिवासी अपनी जमीन जाने के डर से पत्थलगड़ी के प्रति आग्रही दिखे और उसके बाद उन्होंने जो किया उसके कारण उनपर मुकदमे भी हुए।
इस मामले में झारखंड की राजनीति भी दो धुव्रो में बंटी दिखती है। एक ओर भाजपा है जिसकी नीतियां आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल करनेवाली लगती हैं वहीं दूसरी ओर झामुमो समेत अन्य दल हैं जो आदिवासियों के हित की बात करते हैं। आदिवासियों को यदि इसका एहसास दिला दिया जाये कि उनके स्वामित्व की जमीन सुरक्षित है उनका हक सुरक्षित है तो शायद पत्थलगड़ी के प्रति के प्रति वे स्वाभाविक रुप से अपनी क्रियाओं को अंजाम देंगे और इसमें कोई बुराई भी नहीं है।
राष्ट्रीय राजनीति और राजनीतिक दलों ने जिस प्रकार लंबे समय से आदिवासियों के अधिकारों को छला है और उनकी इच्छाओं और आकांक्षाओं पर कुठाराघात किया है, उनमें अपना हक छिने जाने को लेकर स्वाभाविक आक्रोश है। अपने हक के लिए लड़ना कोई बुरी बात नहीं है और यही आदिवासी कर भी रहे हैं। उनका क्रोध तब भड़कता है जब अपने हक की बात उठाने और करने पर सत्ता उनका दमन करने लगती है। इस परिदृश्य में झांके तो पत्थलगड़ी एक आदिवासियों के अधिकारों के एक प्रतीक के रूप में उभरती है।
यह उनकी परंपरा का हिस्सा है, जीवन का हिस्सा और पारंपरिक व्यवस्था का भी हिस्सा है। आदिवासियों के हक की आवाज बुलंद करनेवाली यह प्रतीकात्मक व्यवस्था लंबे समय से प्रचलन में है तो यह इसका सबूत है कि इसकी उपयोगिता समय के लंबे कालखंड के बाद भी बरकरार है और यह व्यवहारिक भी है।
अच्छा तो यही होगा कि आदिवासियों की इस पारंपरिक व्यवस्था से सत्ता छेड़छाड़ न करे और उन्हें अपने स्वाभाविक तरीके से जीवन-यापन करने दे। पर यदि फिर भी कोई छेड़छाड़ होती है तो आदिवासी समुदाय यह दिखा चुका है कि अपने हक की आवाज उठाने में वह पीछे नहीं हटेगा। वह लड़ेगा और जीतेगा।













