Kartik Oraon: कार्तिक उरांव के बहाने आदिवासी राजनीति को साधने में जुटी भाजपा

Satish Mehta
3 Min Read

Kartik Oraon

रांची। झारखंड के प्रख्यात आदिवासी नेता बाबा कार्तिक उरांव के बहाने भाजपा आदिवासियों को साधने में जुट गई है। पंखराज साहेब कार्तिक उरांव आदिवासी शक्ति स्वायत्तशासी विश्वविद्यालय निर्माण समिति झारखंड-छत्तीसगढ़-ओडिशा ने गुमला के रायडीह में 30 दिसंबर को अंतरराज्यीय जन सांस्कृतिक समागम समारोह कार्तिक जतरा का आयोजन किया है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इसमें मुख्य अतिथि के तौर पर शिरकत करेंगी। समिति के संयोजक व अध्यक्ष प्रदेश भाजपा के एसटी मोर्चा अध्यक्ष शिवशंकर उरांव ने कहा कि इस जतरा का उद्देश्य झारखंड-छत्तीसगढ़ और ओडिशा में सांस्कृतिक पुनरुद्धार, सुदृढ़ीकरण और शैक्षिक उत्थान को बढ़ावा देना है। कार्तिक उरांव का सपना था कि इस क्षेत्र में विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय बने।

उन्होंने इसका नाम शांति निकेतन रखने का प्र्रस्ताव रखा था। उन्होंने 1981 में केंद्र सरकार के सामने यह मांग उठाई थी। उन्होंने इसे तीनों राज्यों की सीमा पर खोलने का प्रस्ताव रखा था। वे चाहते थे कि यहां ऐसा विश्वविद्यालय बने, जिसमें आदिवासी बच्चे पहली से पीजी तक की पढ़ाई कर सके। उन्हें रोजगारपरक शिक्षा मिले और आदिवासी संस्कृति की रक्षा हो।

इन विषयों पर भाजपा की नजर है। इस बार के कार्तिक जतरा में इन दोनों मांगों को प्रमुखता से उठाने की रणनीति बनी है। कार्यक्रम में छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड के मुख्यमंत्री के अलावा जनजातीय मामलों के केंद्रीय मंत्री जुएल उरांव और एसटी-एससी विषयक संसदीय समिति के अध्यक्ष फगन सिंह कुलस्ते को भी आमंत्रित किया गया है।

कौन थे कार्तिक उरांवः

कार्तिक उरांव झारखंड के एक प्रमुख आदिवासी नेता और शिक्षाविद थे। लंदन से इंजीनियरिंग की डिग्री लेने वाले वे पहले आदिवासी भारतीय थे। उन्होंने संसद में प्राइवेट बिल लाया था, जिसमें धर्मांतरण करने वाले आदिवासियों को आरक्षण का लाभ न मिलने की वकालत की थी।
आदिवासी अधिकारों, उनकी जमीन और पहचान बचाने के लिए उन्होंने आजीवन संघर्ष किया।

उन्होने 1988 में अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद की स्थापना की, जो शिक्षा और रोजगार पर केंद्रित थी। लोहरदगा लोकसभा सीट से वे तीन बार 1967, 1971, और 1980 में सांसद चुने गए। केंद्र सरकार में उड्डयन और संचार मंत्री रहे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के करीबी थे। ‘ट्राइबल सब प्लान’ जैसी नीतियों के पीछे उनकी गहरी सोच थी। 8 दिसंबर 1981 को उनका निधन हुआ।

Share This Article