रांची : नवरात्रि में हम देवी की पूजा करते हैं। देवी आदि शक्ति का ही रूप हैं। पूरा देश देवी की पूजा में तल्लीन हैं और हम सवाल लेकर आये हैं बेटियों की सुरक्षा की। शायद इस चर्चा के लिए यह समय भी उपयुक्त है। झारखंड इन दिनों बेटियों को लेकर चिंतित है। गुहार लगा रहा है माननीयों से, कानून के रखवालों से और समाज से। कब सुरक्षित होंगी हमारी बेटियां। रांची में एक पिता ने मीडिया हाउस में फोन कर अपनी चिंता जताई है। उनकी चिंता बेटियों की सुरक्षा को लेकर है। उनका सवाल है कि आखिर बेटियों को सुरक्षा कब मिलेगी? वे भयमुक्त कब होंगी? एक पिता बिना किसी डर के कब बेटी को बाहर भेजने का साहस करेगा? एक मां कैसे निश्चिंत होकर घर में रहेगी, जब बेटी अकेली निकली हो? स्कूल-कॉलेज या किसी काम से बाहर गई बेटी लौटकर घर नहीं आ जाती, तब तक मां दरवाजे पर टकटकी लगाए रहती हैं, आखिर ऐसा डर क्यों? पुलिस कहां है? कहां है कानून का डर? इस पिता की बातें इतनी झकझोरनेवाली थीं कि कोई भी पत्रकार कलम उठा ले। आइए अब बात करते हैं कि यह पिता आखिर इतना चिंतित क्यों है।
पिछले सप्ताह रांची में दो घटनाएं हुईं। धुर्वा डैम घूमने गई नाबालिग को पांच दरिंदों ने हवस का शिकार बनाया। सुखदेव नगर में 12 साल की बेटी दुष्कर्म का शिकार बनी। ऐसे में एक पिता की चिंताएं झकझोरने वाली हैं। ये घटनाएं समाज के लिए कलंक हैं। माननीयो के लिए चिंतन करने वाली है।
अब बात पुलिस की… तो, अपराधियों में कानून का डर क्यों नहीं है? ऐसा तब हो रहा है, जब सीएम हेमंत सोरेन ने डीजीपी से कह रखा है कि अपराध नियंत्रित करने के लिए आपको खुली छूट दी हुई है। इसके बाद भी न अपराध थम रहा है और न बेटियों व महिलाओं को पुलिस सुरक्षा दे पा रही है।
आंकड़े बताते हैं कि राज्य में बेटियों ती सुरक्षा की स्थिति कितनी भयावह है। रांची ऐसा जिला है, जहां इस साल सितंबर तक दुष्कर्म की 158 घटनाएं हुई हैं। इनमें 13 नाबालिग हैं। जिस राजधानी में 3 एसपी और 19 से अधिक थाने हों, वहां ऐसी घटनाएं चिंताजनक हैं। इसी अवधि में झारखंड में दुष्कर्म के 1327 मामले हुए। इनमें नाबालिगों के साथ 226 घटनाएं हुई हैं।
माननीयों पर लोगों को पर पूरा भरोसा है। पूरी उम्मीद है कि व्यवस्था को सुधारेंगे। उम्मीद है माननीय इस बात पर ध्यान देंगे कि उनके आदेश पर अफसर कितना अमल कर रहे हैं और इसकी वे समीक्षा भी करेंगे। कारोबारियों पर हमला और हत्या पर सीएम हेमंत सोरेन ने कहा था कि जिस थाना क्षेत्र में घटनाएं होंगी, वहां के अफसर पर कार्रवाई होगी। अब जिनके क्षेत्र में बेटियों पर अत्याचार होगा, उन पर भी सख्ती दिखाने की जरूरत है, क्योंकि पुलिस चुस्त होगी तब ही अपराधियों का हौसला पस्त होगा। तभी कानून का राज कायम होगा। इसलिए सख्ती बरतें। झारखंड की बेटियां लाडली तो हैं ही, उन्हें फौलादी बनाने की योजना बनाएं। स्कूल और कॉलेजों में कार्यक्रम शुरू कराये। हालांकि पहले भी ऐसे कार्यक्रम शुरू किये गये, इच्छाशक्ति की कमी और उदासीनता के कारण ये परवान नहीं चढ़ सके।
अब बात करें समाज की… क्योंकि सबसे जरूरी है सामाजिक चेतना। ये महज एक पिता की चिंता या एक परिवार की समस्या नहीं है। इस पर समाज को, सभी लोगों को सोचना होगा। जागना होगा। अपने बच्चों की गलतियां छिपाएं नहीं, उन्हें सही-गलत का बोध कराएं। बेटियों को मजबूर नहीं, मजबूत बनाएं। हमारी बेटियां लाडली हैं, इसलिए उनको मिलने वाली सरकारी योजनाओं के लाभ में उलझे-सिमटे न रहें। बेटियों को लक्ष्मीबाई बनाएं, ताकि वे अकेले पड़ने पर किसी भी परिस्थति में वे हिम्मक न हारें। जरूरत पड़े तो समझदारी दिखाये और किसी से भिड़ सकें। साथ ही वे समाज को लज्जित, कलंकित करने वालों को सबक सिखा सकें। इसके लिए हमारे समाज को ही पहल करनी होगी। यहां बताना जरूरी है कि हर लड़की किसी न किसी की बेटी होती है। ऐसे में जब हम अपनी सामाजिक जिम्मेदारी ईमानदारी से निभायेंगे और हर बेटी को अपनी समझेंगे, तो संभव है, ये अपराधी कानून से पहले हमसे और आपसे डरेंगे, तो ऐसे अपराध 50 फीसदी वैसे ही कम हो जायेंगे। बस जरूरत है एक पहल की।







