Jharkhand High Court
रांची। 30 जनवरी 2026 झारखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि यदि शादी से पहले किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाकर सहमति ली जाती है, तो ऐसा विवाह कानून की नजर में टिकाऊ नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि लिव-इन रिलेशनशिप जैसी गंभीर जानकारी छिपाना धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है और ऐसे मामलों में विवाह को शून्य घोषित किया जा सकता है।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए गढ़वा फैमिली कोर्ट के 16 फरवरी 2017 के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें विवाह को शून्य घोषित किया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत का फैसला तथ्यों और कानून के अनुरूप है, इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
मामले के अनुसार
मामले के अनुसार, 2 दिसंबर 2015 को गोरखपुर में हिंदू रीति-रिवाज से विवाह हुआ था। विवाह से पहले और दौरान पत्नी के पिता ने अलग-अलग बैंक खातों में कुल 26.4 लाख रुपये ट्रांसफर किए थे, जिनमें कार खरीद और अन्य खर्च शामिल थे। विवाह के बाद पत्नी को पता चला कि पति पहले से ही एक महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा था, जिसकी जानकारी उससे जानबूझकर छिपाई गई थी।
पत्नी का आरोप
पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि ससुराल पहुंचने के कुछ दिनों बाद उससे 15 लाख रुपये अतिरिक्त दहेज की मांग की गई और मांग पूरी न होने पर उसे मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। अदालत ने इन सभी तथ्यों को गंभीर मानते हुए कहा कि सहमति धोखे से ली गई थी, इसलिए विवाह को शून्य घोषित करना पूरी तरह विधिसम्मत है।











