क्या नीतीश कुमार NDA में वापसी की राह बना रहे

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Bihar Politics: बैठक से पहले ही विपक्षी एकता की हवा कमजोर

पटना। बिहार राजनीति में कुछ नया होने वाला है। राजनीतिकार तो यही कयास लगा रहे हैं। इन दिनों चर्चा है कि बिहार विधानसभा का चुनाव भी लोकसभा के साथ ही हो सकता है। चर्चा यह भी है कि नीतीश कुमार अपने डेप्युटी सीएम तेजस्वी यादव को सीएम नहीं बनने देना चाहते।

दोनों ही बातों में कोई दम तो नहीं है। दोनों ही बातें अटकलों-अनुमानों और हालिया बयानबाजी से पर आधारित हैं। लेकिन एक चर्चा और भी है कि जनाधार खिसकने से सीएम नीतीश कुमार परेशान हैं। आखिर क्या है इन अटकलों के पीछे का सच? क्या सच में चुनाव पहले हो सकते हैं? क्या सच में सीएम नीतीश परेशान हैं? ऐसे कई सवाल हैं।

नीतीश की बातों से विपक्ष को मिली हवा

दरअसल, सीएम नीतीश कुमार ने हफ्ता भर पहले अधिकारियों की समीक्षा बैठक में कहा कि राज्य सरकार की जिन योजनाओं पर काम चल रहा है, उसे निर्धारित समय से पहले पूरा करें। इसलिए कि चुनाव कभी भी हो सकते हैं। जाहिर है कि उन्होंने लोकसभा चुनाव की बात तो नहीं ही की होगी। इसलिए कि लोकसभा चुनाव के लिए राज्य सरकार की योजनाओं का पूरा होना कोई फैक्टर नहीं हो सकता। बहरहाल, यह तो प्रशासिनक आदेश था।

लेकिन खबर सूंघने वालों ने इसे असेंबली इलेक्शन समय से पहले कराए जाने की तैयारियों के तौर पर देखा। इसे हवा दे दी बिहार के विपक्षी दलों के नेताओं ने। बयानबाजी का दौर शुरू हुआ। सब कहने लगे कि नीतीश समय से पहले ही यानी लोकसभा के साथ ही विधानसभा के चुनाव कराना चाहते हैं। तर्क भी दिए गए कि नीतीश बन रही विपक्षी एकता का लाभ लेना चाहते हैं।

क्या टूटने लगा नीतीश का सपना

उन्हें लोकसभा चुनाव में अब कोई रुचि नहीं रह गई है। उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद विपक्षी दल एक साथ आने को पूरी तरह तैयार नहीं हैं। इसीलिए अगर वे विधानसभा का चुनाव पहले करा लेते हैं, तो शायद उन्हें इसका फायदा मिल जाए।

उधर, विपक्षी दलों के नेताओं का कहना है कि नीतीश कुमार का जनाधार अब बचा कहां हैं। उनके कुर्मी-कोइरी वोट पर आरसीपी सिंह और उपेंद्र कुशवाहा घेराबंदी कर चुके हैं। मुस्लिम वोट उनके पलटू राम छवि के कारण अब उन्हें मिलने से रहे। दलितों की गोलबंदी चिराग पासवान, पशुपति कुमार पारस और जीतन राम मांझी कर चुके हैं। सवर्णों के वोट तो बीजेपी का साथ छोड़ते ही नहीं।

जेडीयू के उनके विश्वासी साथी भी अलग राह तलाश रहे हैं। जेडीयू से नेताओं के जाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। उपेंद्र कुशवाहा से इसकी शुरुआत हुई थी। मीना सिंह, सुहेली मेहता, अजय आलोक और मोनाजिर हसन जैसे आधा दर्जन बड़े नेता नीतीश का साथ छोड़ चुके हैं। लोकसभा चुनाव करीब आते ही नीतीश के सिटिंग सांसद और कुछ विधायक भी संसदीय चुनाव लड़ने की मंशा से जेडीयू को बाय बोल सकते हैं।

विपक्षा एकता के प्रयास को धक्का

इधर विपक्षी एकता के प्रयासों को भी धक्का लगा है। कांग्रेस को सामने रख कर नीतीश कुमार ने विपक्षी एकता की जो कवायद शुरू की थी, उसमें 18 दलों के शामिल होने की बात थी। धीरे-धीरे यह संख्या घटती जा रही है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और टीएमसी नेताओं के विरोधाभासी बयान आते रहे हैं। यह साफ है कि दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और बंगाल की सीएम ममता बनर्जी शायद ही बैठक में आएं। आये भी तो उनकी शर्तें कांग्रेस को तो कतई स्वीकार नहीं होंगी।

ममता ने स्पष्ट कर दिया है कि बंगाल में कांग्रेस और वाम गठजोड़ को उनसे मदद की कोई उम्मीद बंगाल में नहीं करनी चाहिए। अरविंद केजरीवाल ने तो अध्यादेश पर साथ देने से कांग्रेस के इनकार के बाद अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं।

केजरीवाल की पार्टी ने कांग्रेस के सामने शर्त रख दी है कि पंजाब और दिल्ली में अगर कांग्रेस साथ देने को तैयार है तो वह राजस्थान और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार नहीं उतारेगी। जाहिर सी बात है कि कांग्रेस न ममता की बात मानने को तैयार होगी और न अरविंद केजरीवाल की ही।

विपक्षी एकता के लिए 2022 से अभियान में जुटे तेलांगना के सीएम केसी राव  ने विपक्षी एकता बैठक से अपने को अलग कर लिया है। उनके साथ दिक्कत यह है कि कांग्रेस से ही उनका तेलंगाना में टकराव है। इसलिए कांग्रेस की मदद के लिए वे अपनी स्थिति खराब नहीं करना चाहते हैं। नेशनल कान्फ्रेंस के नेता और जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला ने बैठक में शामिल न हो पाने की सूचना भेज दी है।

अखिलेश यादव अपने रिश्तेदार और पिता के मित्र लालू यादव की बात मान कर कांग्रेस की मदद की बात करने बैठक में आते भी हैं, तो यूपी में उनकी ही जमीन खतरे में पड़ सकती है। वैसे कांग्रेस से गठजोड़ कर वे इसके नफा-नुकसान का आकलन पहले ही कर चुके हैं। बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने तालमेल या विपक्षी एकता का मोह शुरू में ही त्याग दिया है।

राजनीतिक रणनीतिकार लगा रहे कयास

राजनीतिक विश्लेषक तो यभी कह रहे हैं कि नीतीश कुमार जल्द ही महागठबंधन का साथ छोड़ एनडीए में ही अपना भविष्य तलाशेंगे। नीतीश के कभी भरोसेमंद साथी रहे हम के संरक्षक पूर्व सीएम जीतन राम मांझी भी यह अंदेशा जता चुके हैं। वहीं, जनसुराज यात्रा पर बिहार भ्रमण कर रहे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की भी यही राय है।

इन दोनों का कहना है कि वे नीतीश के स्वभाव और शैली को खूब जानते हैं। मांझी कहते हैं कि नीतीश की नीयत में खोट हैं। तेजस्वी को सीएम बनाने के वादे के साथ वे महागठबंधन में आए थे। लेकिन उनके हावभाव से लगता है कि वे तेजस्वी यादव को बड़ा झटका देने की तैयारी में हैं। वे कभी उनको सीएम नहीं बनने देंगे। उससे पहले ही नीतीश एनडीए की ओर खिसक जाएंगे। प्रशांत किशोर तो दावे के साथ कहते हैं कि लोकसभा चुनाव के बाद नीतीश किसी भी तरह एनडीए में शामिल होने की कोशिश करेंगे।

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