6000 साल पुराने इस मंदिर में अपना ही खून पीती है मां छिन्नमस्तिका, दर्शन से पूरी होती है सबकी मनोकामनाएं

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रांची : शारदीय नवरात्र शुरू हो चुका है। इसके साथ ही भक्तों, तंत्र साधकों और अघोरियों का जुटान रजरप्पा के मां छिन्नमस्तिका मंदिर में हो चुका है। 6000 साल पुराना कहे जानेवाले इस मंदिर में स्वयं का रक्त पीनेवाली मां छिन्नमस्तिका विराजती हैं। मां छिन्नमस्तिका को मां पार्वती का ही एक रुप माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहां आकर सच्चे हृदय से मां से कामना करनेवाले भक्तों की कामना पूरी होती है। चूंकि यह शक्तिपीठ है तो यहां तंत्र साधकों को थोड़े प्रयासों से ही सिद्धि मिल जाती है। मंदिर के अंदर मां का शिलाखंड है, जिसमें दक्षिण की ओर मुख किए माता के दर्शन होते हैं। मंदिर के गोलाकार गुम्बद की शिल्प कला असम के कामाख्या मंदिर के शिल्प से मिलती है। मंदिर में सिर्फ एक ही द्वार है।

मां छिन्नमस्तिका मंदिर को मां कामाख्या के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ कहा जाता है। दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ होने के कारण तंत्र-मंत्र की साधना करनेवाले दुनियाभर के साधकों का यहां जमावड़ा लगता है। यह मंदिर झारखंड की राजधानी रांची से करीब 80 किलोमीटर दूर रजरप्पा में स्थित है। यहां छिन्नमस्तिका मंदिर के अलावा, महाकाली मंदिर, सूर्य मंदिर, दस महाविद्या मंदिर, बाबाधाम मंदिर, बजरंगबली मंदिर, शंकर मंदिर और विराट रूप मंदिर के नाम से कुल सात मंदिर हैं। रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित मां छिन्नमस्तिके मंदिर आस्था की एक प्राचीन धरोहर है।

मंदिर की उत्तरी दीवार के साथ रखे एक शिलाखंड पर दक्षिण की ओर रुख किए माता छिन्नमस्तिका का दिव्य रूप अंकित है। शिलाखंड में मां की तीन आंखें हैं। बायां पैर आगे की ओर बढ़ाए हुए वह कमल पुष्प पर खड़ी हैं। पांव के नीचे विपरीत रति मुद्रा में कामदेव और रति शयनावस्था में हैं। मां छिन्नमस्तिके का गला सर्पमाला और मुंडमाल से सुशोभित है। खुले केश, आभूषणों से सुसज्जित हैं। इनके अगल-बगल डाकिनी और शाकिनी (पौराणिक कथा में इन्हें जया और विजया के रूप में बतलाया गया है) खड़ी हैं, जिन्हें वह रक्तपान करा रही हैं और स्वयं भी रक्तपान कर रही हैं। इनके गले से रक्त की तीन धाराएं बह रही हैं। 

माता के सिर काटने के पीछे एक पौराणिक कथा है जिसके मुताबिक, एक समय की बात है मां भगवती अपनी सहचरियों जया और विजया के साथ मंदाकनी नदी में स्नान-ध्यान कर रही थी। उसी समय माता की सहचरियों को तीव्र गति से भूख लगी। बढ़ती भूख की पीड़ा के चलते माता की दोनों सहचरियों का चेहरा मलीन पड़ गया। इस दौरान माता की सहचारियों ने उनसे भोजन की व्यवस्था करने की याचना की। सहचरियों की याचना को सुनकर माता ने कहा, सखियों! आप थोड़ा धैर्य रखें। स्नान करने के पश्चात आपके भोजन की व्यवस्था की जाएगी, लेकिन तेज भूख लगने के चलते माता की दोनों सहचरियों ने पुन: उनसे भोजन प्रबंध की याचना की। इसके बाद मां भगवती ने तत्काल अपने खडग से अपना सिर काट लिया। इससे तत्क्षण मां भगवती का कटा सिर उनके बाएं हाथ में आ गिरा। इससे रक्त की तीन धाराएं निकली। दो धाराओं से सहचरियों आहार ग्रहण करने लगी। वहीं, तीसरी रक्त धारा से मां स्वंय रक्त पान करने लगी। उसी समय मां छिन्नमस्तिका का प्रादुर्भाव हुआ।

आद्या शक्ति अपने स्वरूप का वर्णन करते हुए कहती हैं कि मैं छिन्न शीश अवश्य हूं लेकिन अन्न के आगमन के रूप सिर के सन्धान (सिर के लगे रहने) से यज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित हूं। जब सिर संधान रूप अन्न का आगमन बंद हो जाएगा तब उस समय मैं छिन्नमस्ता ही रह जाती हूं। इस महाविद्या का संबंध महाप्रलय से है। महाप्रलय का ज्ञान कराने वाली यह महाविद्या भगवती पार्वती का ही रौद्र रूप है। सुप्रसिद्ध पौराणिक हयग्रीवोपाख्यान का (जिसमें गणपति वाहन मूषक की कृपा से धनुष प्रत्यंचा भंग हो जाने के कारण सोते हुए विष्णु के सिर के कट जाने का निरूपण है) इसी छिन्नमस्ता से संबद्ध है। शिव शक्ति के विपरीत रति आलिंगन पर आप स्थित हैं। आप एक हाथ में खड्ग और दूसरे हाथ में मस्तक धारण किए हुए हैं। अपने कटे हुए स्कन्ध से रक्त की जो धाराएं निकलती हैं, उनमें से एक को स्वयं पीती हैं और अन्य दो धाराओं से अपनी जया और विजया नाम की दो सहेलियों की भूख को तृप्त कर रही हैं। इडा, पिंगला और सुषुम्ना इन तीन नाडियों का संधान कर योग मार्ग में सिद्धि को प्रशस्त करती हैं।

विद्यात्रयी में यह दूसरी विद्या गिनी जाती हैं। देवी के गले में हड्डियों की माला तथा कन्धे पर यज्ञोपवीत है। इसलिए शांत भाव से इनकी उपासना करने पर यह अपने शांत स्वरूप को प्रकट करती हैं। उग्र रूप में उपासना करने पर यह उग्र रूप में दर्शन देती हैं जिससे साधक के उच्चाटन होने का भय रहता है। दिशाएं ही इनके वस्त्र हैं। इनकी नाभि में योनि चक्र है। ऐसा माना जाता है कि वह व्यक्ति जो माता छिन्नमस्तिका को पवित्र दिल से पूरी तरह से दिल से समर्पित करता है, उसकी सारी इच्छाएं देवी द्वारा पूरी की जाती हैं। झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल के सभी कोनों से भक्त पूरे वर्ष इस पवित्र स्थान पर जाते हैं। मां के मंदिर में मन्नतें मांगने के लिए लोग लाल धागे में पत्थर बांधकर पेड़ या त्रिशूल में लटकाते हैं। मन्नत पूरी हो जाने पर उन पत्थरों को दामोदर नदी में प्रवाहित करने की परंपरा है। यहां दामोदर और भैरवी नदी है। कहते हैं, यहां नहाने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं।

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