प्रेम में दीवाने शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल के लिए आगरा में ताजमहल बनवा दिया।
कुछ ऐसी ही इमारत बनवाने का ख्वाब सर अली इमाम के जेहन में भी तैरता था।
प्रिंसली स्टेट हैदराबाद के प्राइम मिनिस्टर रहे सर अली इमाम ऐसा तो नहीं कर सके, पर उन्होंने रांची में अपनी बेगम के लिए जो इमारत खड़ी की वो भी कम खूबसूरत नहीं थी। हाल तो ये था कि पूरे एकीकृत बिहार में उस जोड़ की इमारत नहीं थी। उस इमारत का नाम है अनीस कैसल।
लेकिन रांची के लोग उसे इमाम कोठी के नाम से ज्यादा जानते हैं। बदलते वक्त ने इस कोठी की रौनक भले ही कम कर दी हो लेकिन आज भी इसकी खूबसूरती देखते बनती है।
इमाम कोठी की नींव
100 साल पहले जब इमाम कोठी बनकर तैयार हुई थी तो लोग कहते थे कि इमाम साहब ने विला नहीं, बल्कि लाल किला बनवाया है।
लाल किला इसलिए क्योंकि यह इमारत लाल ईंटों और सुर्खी चूने से बनकर तैयार हुई थी।
सर अली इमाम के पोते और हजारीबाग के जाने-माने संस्कृतिकर्मी बुलु इमाम कहते हैं कि सर अली इमाम अपनी बेगम अनीस फातिमा से बेहद प्यार करते थे।
अली इमाम और अनीस फातिमा की प्रेम कहानी एक जिंदादिल वाइफ हसबैंड की प्रेम कहानी है। अनीस बेगम उनके मदर के भाई की बेटी थी और रिश्ते में वह उनकी कजन थी।
उनकी सेकेंड वाइफ का नाम मरियम था और मरियम के इंतकाल के बाद उन्होंने अनीस करीम से शादी की थी।
संभवत: वह अनीस से सबसे ज्यादा प्यार करते थे, इसलिए उन्होंने इस विला का नाम अनीस विला रखा।
इमाम कोठी का निर्माण
इमाम कोठी को उन्होंने स्कॉटलैंड के स्कैंडेनेवियन आर्किटेक्ट स्टाइल में बनवाया था और इसे बनने में 20 साल लगे थे।
इसका निर्माण सन 1913 में शुरू हुआ था और 1932 में कंप्लीट हुआ। उस समय इसे बनाने में 20-30 लाख रुपए की लागत आयी थी।
पहले अनीस कैसल 21 एकड़ जमीन में विस्तृत था और यहां 500 लीची और आम के पेड़ थे, लेकिन आज यह जगह सिमटकर 3 एकड़ में रह गई है।
अब यह इमारत एक गोदाम के रूप में उपयोग में लायी जा रही है।
सर अली इमाम को फाउंडर ऑफ मॉडर्न बिहार कह जाता है, क्योंकि उन्होंने ही 1911 में बंगाल से अलग करके अलग बिहार को जन्म दिया था।
जानकार बताते हैं कि इमाम कोठी प्यार के रंगों में रंगी कोठी है। इसे ब्रिटिश हुकूमत के पहले बिहारी बैरिस्टर और हैदराबाद डेक्कन के प्राइम मिनिस्टर सर सैयद अली इमाम ने अपनी बेगम अनीस फातिमा के लिए बनवाया था।
अनीस बेगम सर सैयद अली इमाम की तीसरी बेगम थी और उन्हीं के लिए उन्होंने रांची में यह इमारत बनवाई थी।
उनकी चाहत तो यह थी कि मरने के बाद उनकी और उनकी बेगम की कब्र साथ रहे, जिससे वे मरकर भी जुदा न हों। लेकिन उनकी यह चाहत पूरी न हो सकी।
तीन तल्लेवाली इस कोठी में 120 कमरे हैं और इसमें प्रवेश करने के लिए छह दिशाओं से दरवाजे बने हुए हैं।
इसमें जिस संगमरमर का यूज हुआ है, वे जर्मनी से मंगाया गया था। मार्बल जर्मनी से इंपोर्ट होकर पहले कोलकाता और फिर कोलकाता से रांची आया।
जब तक इमाम साहब जीवित रहे, इस कोठी की शान बनी रही। बड़े-बड़े अंग्रेज ऑफिसर्स यहां पार्टियां करते थे।
उनके समय में इस कोठी में हमेशा चहल-पहल रहती थी। इमाम कोठी में सर अली इमाम के नौकरों के लिए भी क्वार्टर बने हुए थे।
उनके जिम्मे ही इस कोठी की देखभाल का काम था। लेकिन 1932 में उनके इंतकाल के बाद इस कोठी की रौनक घटने लगी।
सर अली इमाम चाहते थे कि मरने के बाद उनकी वाइफ की कब्र भी उनके कब्र के करीब बने।
उन्होंने अनीस कैसल के पास दो कब्रें बनवाई थीं। एक कब्र में 1932 में अली इमाम के इंतकाल के बाद उन्हें दफना दिया गया, पर दूसरी कब्र आज तक खाली पड़ी है।
अंतिम समय में लेडी इमाम पटना आईं और पटना में ही उनका इंतकाल हुआ। इंतकाल के बाद उन्हें पटना में ही दफना दिया गया।
गोल मेज में भारत का प्रतिनिधित्व करनेवाले पहले भारतीय थे सर अली इमाम
सर सैयद अली इमाम एक बैरिस्टर और स्वतंत्रता सेनानी थे जो 1929 की गोल मेज पर भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले पहले भारतीय थे।
अपने समय में वे भारतीय राजनीति के दिग्गजों में शुमार थे। उन्होंने 1919 से 1922 तक हैदराबाद राज्य के प्रधान मंत्री के रूप में कार्य किया।
सर सैयद अली इमाम का जन्म 11 फरवरी 1869 को बिहार के फतुहा के पास कराई परसारी गांव में हुआ था।
स्कूल और कॉलेज की शिक्षा पूरी करने के बाद नवाब सैयद 1887 में कानून का अध्ययन करने के लिए लंदन गए और मिडिल टेम्पल द्वारा उन्हें अंग्रेजी बार में बुलाया गया।
वह 1890 में भारत लौट आए। बाद में वे बिहार जिला बोर्ड के सदस्य बने। 1909 में, उन्हें बंगाल विधान परिषद में नियुक्त किया गया।
1917 में, इमाम को पटना उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। बाद में, उन्होंने हैदराबाद राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में काम किया ।
उसके बाद, उन्होंने 1920 में निजी प्रैक्टिस फिर से शुरू की और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए।
सर अली इमाम ने मुस्लिम लीग के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया । 1908 में उन्हें नाइट की उपाधि दी गई।
वह इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के कानून सदस्य थे। वह बोर्ड को राजधानी कोलकाता को दिल्ली स्थानांतरित करने के लिए मनाने के लिए जिम्मेदार थे।
इमाम बहुभाषी थे और कई भाषाएं बोलते थे। उन्हें एक अच्छे वक्ता के रूप में भी लोग याद करते हैं ।
17 अक्टूबर 1932 को उनकी मृत्यु रांची में हुई और उन्हें हज़ारीबाग़ रोड के कोकर चौक पर दफनाया गया।
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