रांची में भाजपा का खाता खोला था गुलशन आजमानी ने

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रांची। 90 के दशक के सबसे चर्चित और लोकिप्रय विधायक रहे भाजपा नेता गुलशन लाल आजमानी आज फिर चर्चा में हैं। चारा घोटाले के 27 साल पुराने एक मामले में कोर्ट ने उन्हें तीन साल की सजा सुनाई है। पशुओं के चारा सप्लाई के मामले में वे दोषी पाये गये हैं।

आज गुलशन आजमानी राजनीति में ज्यादा सक्रिय नहीं हैं। पर एक जमाना था, जब वे तेज तर्रार युवा नेता के रूप में जाने जाते थे। युवाओं में उनका क्रेज देखते ही बनता था। भगवा झंडा लहराते जब उनकी गाड़ी निकलती थी, तब समर्थकों का हुजूम उमड़ पड़ता था।

दरअसल, रांची विधानसभा सीट पर गुलशन लाल आजमानी ने BJP का खाता खोला था। या कहे, कि गुलशन आजमानी ने रांची में पहली बार भगवा की जीत का परचम लहराया था। इसके बाद से ही इस सीट पर भाजपा अपराजेय है। रांची से 1990 के बाद भाजपा कभी नहीं हारी।

अब तो रांची भाजपा की सबसे सुरक्षित सीट मानी जाती है। कहनेवाले कहते हैं कि बीजेपी यहां से किसी को भी टिकट दे दे, वो जीतेगा ही। पर 1990 से पहले ऐसा नहीं था। 1951 में जब देश में पहली बार चुनाव हुए, तब रांची में दो विधानसभा सीट हुआ करती थी।

रांची सदर और कांटी रिजर्व। रांची सदर जेनरल सीट थी, जबकि रांची रिजर्व सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी। पहले चुनाव में रांची सदर से झारखंड पार्टी के पॉल दयाल और रांची रिजर्व सीट से कांग्रेस के राम रतन राम जीत कर विधायक बने थे।

इसके बाद 1957 में हुए चुनाव में भी रांची सदर से झारखंड पार्टी जीती थी। तब झारखंड पार्टी के जगन्नाथ महतो यहां से विधायक बने थे, जबकि रांची रिजर्व से राम रतन राम दूसरी बार लगातार जीते। इसके बाद 1962 में उलटफेर हुआ और झारखंड पार्टी हार गई।

रांची सदर से स्वतंत्र पार्टी के अंबिका नाथ शाहदेव जीत कर विधायक बने। इसके बाद झारखंड पार्टी फिर कभी रांची से चुनाव नहीं जीत सकी। वहीं, रांची रिजर्व से कांग्रेस के वीरेंद्र नाथ रे जीते। 1967 में रांची की दो सीटों को मिलाकर एक सीट बनाई गई, जो अनारक्षित थी।

तब भारतीय जनसंघ के ननी गोपाल मित्रा वर्तमान रांची सीट के पहले विधायक बने। 1969 में भी मित्रा दुबारा जीत कर विधायक बने। 1972 में पहली बार कांग्रेस को रांची सीट पर विजय मिली। कांग्रेस के देवीदत्त साहू ने रांची सीट पर कांग्रेस को पहली बार जीत दिलाई।

इसके बाद 1977 में कांग्रेस विरोधी लहर में तब जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे ननी गोपाल मित्रा फिर जीत गये। पर 1980 के चुनाव ने कांग्रेस को एक दिग्गज नेता दिया। उस चुनाव में कांग्रेस ने ज्ञानरंजन को अपना उम्मीदवार बनाया। तब तक भारतीय जनता पार्टी का गठन हो चुका था। ननी गोपाल मित्रा इसके उम्मीदवार थे। पर ज्ञानरंजन की आंधी में वह टिक नहीं सके।

इसके बाद 1985 में ननी गोपाल मित्रा एक बार फिर कांग्रेस के जयप्रकाश गुप्ता से हार गये। इसके बाद आया 1990 का विधानसभा चुनाव और इस चुनाव में उदय हुआ BJP का। इस चुनाव में गुलशन आजमानी की जीत ने बीजेपी का रास्ता खोल दिया।

गुलशन एक ऐसे तेज तर्रार विधायक थे, जिन्हें लोग भूला नहीं सके। गुलशन ने यहां बीजेपी की ऐसी नींव रखी, जिसे आज तक कोई हिला नहीं पाया। जबकि उस समय आडवाणी की रथ यात्रा भी नहीं निकली थी, जिसने बीजेपी को पूरे देश में पहचान दिलाई।

1990 के चुनाव में टिकट बंटवारे से पहले ही गुलशन आजमानी की सक्रियता देख सभी को लगने लगा था कि यह युवा कुछ कर दिखायेगा। उस समय हजारीबाग के सांसद यदुनाथ पांडेय भी गुलशन के दमखम की सराहना करते नजर आते थे।

उम्मीद के मुताबिक गुलशन आजमानी को रांची सीट से टिकट मिली। इसके साथ ही युवाओं में नई ऊर्जा का संचार हुआ और हर तरफ गुलशन आजमानी छाये नजर आने लगे। एक तरफ गुलशन चुनाव की तैयारियों में जुटे थे, वहीं उनके विरोध में कांग्रेस के मौजूदा विधायक जयप्रकाश गुप्ता अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे थे।

बावजूद इसके दोनों ही पार्टियों ने प्रचार में कोई कमी नहीं की। फिर आया चुनाव का दिन। बीजेपी और कांग्रेस के वोटर अपने-अपने क्षेत्र में मतदान कर रहे थे। धीरे-धीरे वोटरों का रूझान कांग्रेस की ओर झूकता दिखने लगा। इसी बीच सूचना आई कि गुलशन लाल आजमानी पर अटैक हुआ है। फिर सूचना थोड़ी स्पष्ट हुई कि हिंदपीढ़ी क्षेत्र में गुलशन आजमानी की पर बम चला है।

शहर में यह सूचना तेजी से फैल गई कि गुलशन आजमानी पर जानलेवा हमला हुआ है। हमले में वह बच गये हैं, पर उनकी गाड़ी क्षतिग्रस्त हो गई है। इसके थोड़ी देर बाद गुलशन आजमानी अपनी जानी पहचानी मारूति वैन में घूमते दिखे। उनकी गाड़ी का पिछला शीशा टूटा हुआ था। गुलशन आजमानी पर हमले की खबर जंगल में आग की तरह फैली और देखते ही देखते एक अलग ही माहौल बन गया।

हालांकि इसके बाद कोई अप्रिय घटना नहीं घटी, पर रांची में बीजेपी का खाता खुल गया। गुलशन आजमानी चुनाव जीत गये। इसके बाद रांची में बीजेपी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। देखते ही देखते गुलशन आजमानी की लोकप्रियता और तेजी से बढ़ने लगी। युवाओं की हर मांग और हर समस्या पर वह साथ खड़े नजर आते थे। तब राज्य में लालू यादव की सरकार थी और गुलशन हर मौके पर सरकार के खिलफ झंडा उठाये दिख जाते थे।

भगवा झंडा लगा मारूति वैन ही उनकी पहचान थी। उन्होंने विधायक रहते भाजपा के लिए युवाओं की ऐसी फौज तैयार की, जो पार्टी के साथ आज भी खड़ी है। इसी दौरान चारा घोटाले की जांच शुरू हो गई। देखते ही देखते इसके लपेटे में गुलशन भी आ गये। घोटाले में गुलशन आजमानी का नाम भी सामने आ गया। उन पर पशुओं के चारा सप्लाई में गड़बड़ी के आरोप लगे।

एफआइआर भी हो गई। इसके बाद 1995 के चुनाव में बीजेपी ने उन्हें टिकट न देकर मौजूदा विधायक सीपी सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया। फिर सीपी सिंह ने रांची सीट पर ऐसा कब्जा जमाया कि कोई दूसरा अब तक सामने आ ही नहीं सका। इधर, वक्त के थपेड़ों ने गुलशन आजामानी को गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया। आज कोर्ट में सजा सुनाये जाने के दौरान घोटालेबाजों की भीड़ खड़ा उन्हें देख, जुझारू तेवर वाला यह नेता लोगों को याद आ गया।

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