खेल राजनीति काः टिकट कटते ही घर वापसी की छटपटाहट

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रांची। लोकसभा चुनाव के लिए टिकटों के बंटवारे के बीच नेताओं के पाला बदलने का खेल भी शुरू हो गया है।

टिकट कटने या टिकट नहीं मिलने के सूरत में ये नेता दूसरों दलों में ताकझाक कर अपने लिए संभावनाएं तलाश रहे हैं।

पूरे देश में ये खेल देखने को मिल रहा है। झारखंड भी इससे अछूता नहीं है। झारखंड के कई नेताओं ने चुनाव लड़ने की इच्छा लिये पार्टी बदली थी, लेकिन दल बदलने के बाद भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी।

अब ऐसे नेता अपने पुराने घर में वापसी के लिए छटपटा रहे हैं। 2019 में चुनाव से पहले राजद नेता और पूर्व मंत्री गिरिनाथ सिंह भाजपा में शामिल हुए थे, लेकिन तब भाजपा ने चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं दिया।

2024 में टिकट मिलने की उम्मीद में उन्होंने 5 साल इंतजार किया। चतरा लोकसभा सीट से वे टिकट के दावेदार थे, लेकिन इस बार भी उन्हें निराशा हाथ लगी।

अब अपने राजनीतिक करियर को बचाने के लिए उन्होंने फिर से राजद का दामन थाम लिया है।

चर्चा है कि वे चतरा से इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार हो सकते हैं। इसी तरह सुनील सोरेन, घूरन राम और शशिभूषण सामड जैसे और नेता भी भाजपा से निराश होकर नया ठिकाना तलाश रहे हैं।

भाजपा ने दुमका के सांसद सुनील सोरेन को पहले टिकट दिया और फिर उनसे टिकट वापस लेकर सीता सोरेन को दे दिया।

सुनील सोरेन को यह काफी नागवार गुजरा है और अब वह झारखंड मुक्ति मोर्चा में वापसी की राह तलाश रहे हैं।

वह झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन के राजनीतिक शिष्य भी रहे हैं। गुरु से बगावत कर उन्होंने भाजपा के टिकट पर कई बार चुनाव लड़कर उन्हें कड़ी टक्कर दी।

2019 में तो उन्होंने गुरुजी को पछाड़ कर बीजेपी को जीत दिला दी। पर इस बार चुनाव से ठीक पहले गुरुजी की बहू सीता सोरेन के भाजपा में आने के बाद पार्टी ने सुनील सोरेन को दिया हुआ टिकट वापस ले लिया।

इससे सुनील सोरेन ने अब प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है। फिर बीते मंगलवार को एनडीए की बैठक हुई।

यह बैठक नाराज सदस्यों को मनाने के लिए थी। पर सुनील सोरेन बैठक में आये ही नहीं। अब उन्होंने अपनी नाराजगी जाहिर कर दी है।

राजनीतिक गलियारे में चर्चा है कि दुमका का राजनीतिक समीकरण बदल सकता है। सुनील सोरेन झामुमो में शामिल हो सकते हैं और झामुमो उन्हें सीता सोरेन के खिलाफ चुनाव मैदान में उतार सकती है।

झामुमो के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि राजनीति में संभावनाओं का द्वार हमेशा खुला रहता है।

इन सबमें सबसे विचित्र स्थिति में तो घूरन राम फंस गये हैं। जैसे ही चर्चा शुरू हुई कि इस बार बीजेपी पलामू में प्रत्याशी बदल सकती है, तो घूरन राम तपाक से राजद से कूद कर बीजेपी में आ गये।

चर्चा भी शुरू हो गई कि वह बीजेपी के लिए पलामू में दमदार उम्मीदवार हो सकते हैं। घूरन राम पिछले कई साल से राजद के टिकट पर पलामू से चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल रही थी।

इस बार राजनीतिक गलियारे में चर्चा थी कि भाजपा पलामू के सांसद बीडी राम का टिकट काट सकती है। मौका देखते ही घूरन राम भाजपा में शामिल हो गये, लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी।

भाजपा ने फिर से बीडी राम को टिकट दे दिया। अब घूरन राम न इधर के रहे न उधर के। चर्चा है कि अब एक बार फिर वह राजद में वापसी के लिए छटपटा रहे हैं।

वह राजद नेताओं और कार्यकर्ताओं के संपर्क में हैं। कहते हैं कि टिकट की उम्मीद में ही भाजपा में शामिल हुआ था, लेकिन टिकट नहीं मिला।

कुछ यही हाल कुणाल षाड़ंगी का भी है जो 2019 के बाद झामुमो छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे। इस बार उन्हें काफी उम्मीद थी कि बीजेपी प्रत्याशी बदलेगी, पर ऐसा हुआ नहीं और उनकी आकंक्षा धरी की धरी रह गई।

अब उन्होंने झामुमो में एंट्री की पूरी तैयारी कर ही ली है। पर यहां भी उनके मंसूबे पर पानी फिरता नजर आ रहा है, क्योंकि हेमंत सोरेन के निर्देश पर झामुमो ने स्पष्ट कर दिया है कि दूसरे दलों से आनेवालों को पार्टी टिकट नहीं देगी।

हालांकि क्या दुमका में पार्टी ऐसा वाकई में कर पायेगी, यह देखना दिलचस्प होगा, क्योंकि वहां से सुनील सोरेन झामुमो में वापसी चाह रहे हैं।

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