रांची : रांची से करीब दो किमी दूर गुमला के बिशुनपुर प्रखंड से 70 किमी दूरी पर पोलपोल गांव है।
दुर्गम क्षेत्र की जो परिकल्पना आपके मन में होती है, उससे भी दुर्गम क्षेत्र। सखुआ पानी गांव से ढाई किमी की दूरी बिना सड़क के। पहाड़ पर बसा गांव है।
सखुआपानी और पोलपोल के बीच एक नाला है, नदी भी कह सकते हैं। गांव वाले इसके कई नाम बताते हैं।
नाला पर अब पुल बन गया है और यहीं से फिर चढ़ाई चढ़ते हुए कच्चे रास्ते के सहारे हम 40 डिग्री तापमान में नेतरहाट के इस पाट इलाके में पहुंचते हैं।
2013 में घोषित इस आदर्श गांव में पिछले करीब 75 साल से इसी नाले में बने चुआं से पोलपोल की 140 घर की 756 की आबादी अपनी प्यास बुझाती है।
देश-दुनिया को लोहा गलाने की तकनीक देने वाले असुरों का यह गांव अभी भी अपने आदिम रूप में जी रहा है।
विकास के नाम पर इतना हुआ है कि बिजली पहुंच गई है। गांव से इस नाले की दूरी ढाई किमी है। गांव की आबादी सबसे पहले सुबह होते ही दो घंटे का समय पानी उठाने में चला जाता है।
पहाड़ी पर चढ़ना-उतरना इस गर्मी में इतना आसान नहीं। नहाना तो मुश्किल है ही। इस गांव के बीरेंद्र असुर की उम्र करीब साठ साल से ऊपर है।
खेती-बारी ही आजीविका का एकमात्र साधन है। हां, वे कहते हैं, 32 किलो अनाज मिल जाता है। इससे भी गुजर-बसर करने में आसानी हुई है।
पीएम आवास के लिए आवेदन दिए हैं। पर, कहते हैं, बिशुनपुर प्रखंड में वह आवेदन कहां गुम हो गया पता नहीं।
बहुत मायूसी से कहते हैं, बिशुनपुर प्रखंड भी हमारे लिए जाना आसान नहीं हैं। साठ-सत्तर किमी की दूर।
आने-जाने का साधन नहीं। बीरेंद्र कहते हैं, इस बार आबुआ आवास के लिए आवेदन दिए हैं।
वे बताते हैं, गांव में करीब 10-11 लोगों को पीएम आवास मिला है, लेकिन अभी बनना शुरू नहीं हुआ है।
वे एक बात और बताते हैं। कहते हैं, अब लोग पीएम आवास से ज्यादा रुचि अबुआ आवास में ले रहे हैं।
मैट्रिक से आगे राह नहीं, जड़ी-बूटी पर निर्भर जीवन
यहां बहुत हुआ तो जिनके पास थोड़ा साधन हुआ, मैट्रिक तक ही कर लेते हैं। मैट्रिक करना भी किसी दुर्गम पहाड़ की चढ़ाई से कम नहीं।
गांव से ढाई किमी दूर सखुआ पानी में ही आवासी विद्यालय है। यहां मैट्रिक तक ही पढ़ाई होती है। सो, इससे आगे के लिए उन्हें 70 किमी दूर जाना पड़ेगा।
सामाजिक कार्यकर्ता विमलचंद्र असुर भी यहीं से मैट्रिक किए हैं। आगे नहीं पढ़ सके। वे अपने लोगों को राजनीतिक रूप से भी जागरूक करने में लगे हैं।
मतदान को भी लेकर जागरूकता फैला रहे हैं। वे कहते हैं, मैट्रिक के आगे यहां स्कूल-कालेज नहीं खुल सके। अस्पताल भी यहां नहीं हैं।
इसके लिए भी हमें 70 किमी दूर बिशुनपुर जाना पड़ता है। वहां भी रेफरल अस्पताल है। यानी, वे भी रिम्स रेफर कर देते हैं।
पानू असुर कहते हैं कि हम लोग जंगली-जड़ी-बूटी पर ही निर्भर हैं। पहली बारिश में जड़ी-बूटी होती है। हम लोग उसे तोड़ लेते हैं। बुखार हो, हड्डी टूटी हो, पेचिश आदि का इलाज कर लेते हैं।
परंपरागत ज्ञान का बने म्यूजियम
इस गांव में सर्वाधिक जागरूक विमलचंद्र असुर कहते हैं कि हम चाहते हैं, गांव में ही म्यूजियम बने।
असुर बहुत तेजी से विलुप्त हो रहे हैं। सरकार भी हमें विलुप्त जनजाति में रखी है। हमारी भाषा आसुरी भी संकट है।
लोहा गलाने की तकनीक हमारे पास है। अब मात्र तीन लेाग ही लोहा गलाने की तकनीक जानते हैं।
इसका दस्तावेजी करण जरूरी है। म्यूजियम में हमारा जो पारंपरिक ज्ञान है, लोक की गीत है, मिट्टी से लोहा निकालने और लोहा से औजार बनाने की जो पद्धति है, उसका संरक्षण जरूरी है।
माइंस वरदान या अभिशाप…
इस पूरे पाट में बाक्साइट की खदाने हैं। खदाने हैं। यह सब असुर की जमीन पर ही हैं। असुर यहां उन्हीं खदानों में मजदूरी करते हैं।
विमलचंद्र कहते हैं कि यहां माइंस है। बाक्साइट ढोने के लिए तो सड़कें बन गई हैं, लेकिन असुरों की शिक्षा-चिकित्सा पर कोई ध्यान नहीं है।
सीएसआर का एक प्रतिशत भी असुरों के लिए खर्च नहीं होता है। यह बड़े दुख की बात है। हम समझ नहीं पा रहे हैं, यह हमारे लिए वरदान है या अभिशाप।
सिर्फ मतदान की करते हैं
लोकसभा का चुनाव शुरू हो गया। ढाई किमी दूर यहां के असुर अपना वोट डालने जाते हैं। लालदेव असुर कहते हैं कि हमने अपने होश में किसी नेता को यहां नहीं देखा है, जो वोट के लिए आया हो।
आज तक कोई नेता गांव में नहीं पहुंचा। 75 साल के इस लोकतंत्र में ये असुर बस वोट डालते हैं। पिछले दो दशक से असुरों के बीच काम करने वाले गुमला के हफिज उर्र रहमान कहते हैं, आदर्श गांव के बाद भी सूरत नहीं बदली।
वे कहते हैं, एक समय यह पूरा क्षेत्र नक्सलियों का इलाका था। यहां लोगों की हिम्मत नहीं होती थी आने में।
राहुल शर्मा जब डीसी थे तो किसी तरह उन्हें ले आया था और उन्होंने इसे आदर्श गांव घोषित किया था, लेकिन आज तक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया।
हो सकता है, लोकतंत्र के इस पर्व में बदलाव की हवा यहां से भी गुजरे।
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