रांची। पांच रुपए देकर शिबू सोरेन की किस्मत पलटने वाले उनके बड़े भाई राजाराम सोरेन नहीं रहे। उन्होंने रांची के बूटी मोड़ के पास स्थित आवास में शनिवार को आखिरी सांस ली।
शिबू सोरेन के संघर्ष की यात्रा में उनके भाई राजाराम सोरेन का बड़ा योगदान रहा है। राजाराम सोरेन और शिबू सोरेन गोला में स्कूल के हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करते थे।
वर्ष 1957 में उनके पिता सोबरन मांझी उन दोनों के लिए चावल पहुंचाने हॉस्टल जा रहे थे, तभी महाजनों के गुंडों ने उनकी हत्या कर दी थी।
पिता की हत्या ने शिबू सोरेन को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया। अब उनका मन पढ़ाई से टूट गया था।
एक दिन उन्होंने अपने बड़े भाई को कहा कि वे पांच रुपया दें, वह घर से बाहर जाकर कुछ करना चाहते हैं।
घर में उस वक्त पैसे नहीं थे, बड़े भाई राजाराम महतो चिंता में पड़ गये। चिंता में बैठे राजाराम को घर में रखे हांडा पर नजर पड़ी।
उनकी मां एक कुशल गृहिणी थी, वह हर दिन खाना बनाने के पहले एक मुट्ठी चावल हांडा में डाल देती थी।
अब राजा राम अपनी मां सोना सोरेन के वहां से हटने का इंतजार करने लगे। जैसे ही उनकी मां वहां से हटी, उन्होंने हांडा से दस पैला चावल निकाल लिया और उसे बाजार में बेच कर पांच रुपया हासिल किया।
संभवतः उनकी मां अगर उस वक्त वहां मौजूद रहतीं, तो उस चावल को बेचने नहीं देती।
पांच रुपये से शिबू सोरेन हजारीबाग के लिए चल पड़े। उस वक्त गोला से हजारीबाग का बस किराया डेढ़ रुपया था।
उस पवित्र चावल से मिले इसी पांच रुपये ने आगे चलकर शिबू सोरेन को संथाल समाज का ‘‘दिशोम गुरु’’ बना दिया।
घर से निकलने के बाद शिबू सोरेन ने लगातार संघर्ष किया। महाजनी प्रथा, नशा उन्मूलन और समाज सुधार तथा शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए विशेष अभियान चलाया गया।
बाद में अलग झारखंड राज्य आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। जिसके कारण आदिवासियों विशेषकर संथाल परगना क्षेत्र में शिबू सोरेन को लोग ‘‘दिशोम गुरु’’ मानने लगे।
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