डॉ करमा उरांव ने अपनी जमीन कभी नहीं छोड़ी

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संजय कृष्ण

डॉ करमा उरांव विश्व प्रसिद्ध मानवशास्त्री थे। देश-विदेश में उन्होंने सैकड़ों पेपर प्रस्तुत किए। उनके अध्ययन के केंद्र में आदिवासी ही रहे। अकादमिक जगत में उनकी एक पहचान थी। पर, इस पहचान के साथ उनकी एक छवि आंदोलनकारी की भी थी। छात्र जीवन से ही वे आदिवासी मुद्दों को लेकर सक्रिय रहे। वे कुछ दिनों तक राजनीति में भी सक्रिय रहे। 1980 में वे जनता पार्टी से लोहरदगा सीट से चुनाव लड़े लेकिन कांग्रेस के कार्तिक उरांव से हार गए। कार्तिक उरांव को 129038 मत मिले थे और डा.करमा उरांव को 59692 मत पर संतोष करना पड़ा था।

वहीं, वे 1980 में ही बिशुनपुर से भी भाजपा के टिकट पर विधानसभा सीट पर चुनाव लड़े लेकिन कांग्रेस के भुखला भगत से चुनाव हार गए। एक लंबे अंतराल के बाद सन् 2000 में वे भाजपा के टिकट पर खिजरी विधानसभा सुरक्षित सीट से चुनाव लड़े। पर, जनता ने इस बुद्धिजीवी के बजाय सावना लकड़ा में अपना विश्वास जताया। सावना लकड़ा कांग्रेस से लड़े थे और उन्हें कुल 49539 मत यानी 46.08% मिला था जबकि डा. करमा उरांव को 38162 मत यानी 35.5% मिला था। मैदान में कुल दस प्रत्याशी मैदान में थे। चुनावी राजनीति में किस्मत हमेशा दगाबाज ही रही।

2005 में एक बार फिर भाग्य आजमाया और लोहरदगा विधानसभा से आदिवासी छात्र संघ के बैनर तेल निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे लेकिन किस्मत दो कदम आगे चल रही थी। कांग्रेस के सुखदेव भगत बाजी मार गए। इसके बाद तो डा. करमा उरांव ने राजनीति की तंग गलियों में जाना ही छोड़ दिया।

उन्होंने अपने पुराने तेवर में एक बार फिर से, नए सिरे से आदिवासी सवालों को सक्रिय हो गए। वे सरना धर्म कोड को लेकर भी लगातार मुखर रहे। वे मानते थे कि सरना प्रकृति पर आधारित विश्व का सबसे पुराना धर्म है। प्रकृति पूजा से ही पृथ्वी में संतुलन और खुशहाली है।

जैसे-जैसे प्रकृति पूजा पद्धति घटी, वैसे-वैसे दुनिया में अशांति व दुख-विपत्ति फैली है। उन्होंने इस बात पर बल दिया था कि यदि पृथ्वी को महाविनाश से बचानी है तो सिर्फ आदिवासी ही नहीं, दुनिया को प्रकृति पूजा की ओर से फिर से लौटना होगा। आदिवासियत से ही पृथ्वी व पर्यावरण की रक्षा हो सकती है। वे सरना धर्म कोर्ड के लिए भी लोगों को जागरूक करते रहे। उन्होंने मंचों से कई बार आदिवासियों को संबोधित करते हुए कहा था- जनगणना में सरना धर्म दर्ज करना है।

दिसंबर 2021 में सरना धर्म कोड को लेकर दिल्ली चलो का नारा भी दिया। इसी साल मार्च में मोरहाबादी मैदान में विशाल रैली को संबोधित करते हुए डा. करमा उरांव ने कहा था, केंद्र सरकार का सरना धर्म कोड देना होगा। यह हमारी आस्था का सवाल है। दो दर्जन अकादमिक संस्थाओं से जुड़े और एक दर्जन से ज्यादा देशों का भ्रमण कर चुके डा. करमा उरांव ने अपनी जमीन कभी नहीं छोड़ी। वे अपनी जमीन की धुरी पर खड़े होकर अपने मन और ढंग की राजनीति करते रहे।

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