Deoghar: देवघर में ऐसे बनते हैं मिलावटी पेड़े [This is how adulterated pedas are made in Deoghar]

IDTV Indradhanush
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झारखंड के बाबाधाम देवघर में सावन मेले के दारान मिलनेवाला पेड़ा पूरे देश में मशहूर है। हर साल यहां सावन के महीने में श्रावणी मेला लगता है। लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से यहां भगवान शिव को जल चढ़ाने और पूजा अर्चना करने आते हैं। पूजा के बाद लोग यहां का प्रसिद्ध प्रसाद खासकर पेड़ा जरूर साथ लेकर जाते हैं। इस बार भी मेले की तैयारियां करीब दो महीने पहले से ही शुरू हो गई हैं। राज्य के पर्यटन मंत्री सुदिव्य सोनू ने मेले को लेकर कई निर्देश दिये हैं। इसमें यह भी निर्देश है कि प्रसाद की कीमत और शुद्धता का खास ख्याल रखा जाये। उनके इस निर्देश से पेड़े बेचनेवाले दुकानदारों के कान खड़ हो गये हैं।

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दरअसल पिछले कई सालों से देवघर के पेड़े की शुद्धता अब सवालों के घेरे में है। हाल के वर्षों में श्रावणी मेले के दौरान पेड़े में मिलावट और अधिक कीमत वसूली की खबरें लगातार आती रही हैं। फूड सेफ्टी की टीमों द्वारा की गई छापेमारी अक्सर सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाती है और ठोस नतीजे नहीं आते। इस बार भी मेला शुरू होने से दो महीना पहले से ही बाजार में मिलावटी पेड़ा करे लिए खोवा तैयार किये जाने की सूचना है। इतना ही नहीं कई नामी दुकानों में सस्ती दरों पर मंगवाया गया पाउडर दूध और ‘लोथ’ नामक घटिया सामग्री को मिलाकर मशीनों से खोवा तैयार किये जाने की तैयारी है।

ये सामग्री ट्रकों के जरिए देवघर, दुमका, रांची, पटना, झांसी, ग्वालियर और बनारस जैसे शहरों से मंगाई जा रही है। बता दे कि एक किलो पाउडर दूध से दो से ढाई किलो तक खोवा बनाया जाता है

जिसमें लोथ की भी मिलावट होती है। लोथ दरअसल बिना मठ्ठा का सूखा खोवा होता है, जिसे कई महीने पहले से दुकानों में स्टॉक कर लिया जाता है। इस खोवा को भूनकर उसमें चीनी मिलाकर पेड़ा तैयार किया जाता है, जो बाद में श्रद्धालुओं को प्रसाद के नाम पर बेचा जाता है।

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सबसे चिंताजनक बात यह है कि पेड़े को जल्दी खराब होने से बचाने के लिए इसमें रिफाइंड तेल का प्रयोग भी किया जा रहा है, जबकि फूड सेफ्टी एक्ट के अनुसार इसमें केवल शुद्ध देशी खोवा और चीनी का ही प्रयोग होना चाहिए। रिफाइंड तेल की मिलावट से पेड़े की लागत में 100 से 150 रुपये प्रति किलो की बचत हो जाती है, जिससे दुकानदारों को भारी मुनाफा होता है। यह मिलावटी प्रसाद स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, लेकिन दुकानदार इसके उत्पादन में हिचकते नहीं। मशीन और मजदूरों के जरिए यह धंधा बड़े पैमाने पर चल रहा है, जबकि छोटे दुकानदार संसाधनों की कमी के कारण इससे दूर हैं।

जिला प्रशासन को भी इल मिलावट की खबर है। प्रशासन ने पिछले साल ही सख्ती दिखाते हुए प्रसाद की दरें तय की थी। साथ ही फूड व ट्रेड लाइसेंस अनिवार्य कर दिया था। इस साल भी प्रशासन को मिलवाटी प्रसाद को लेकर सख्ती करने का निर्देश मिला है। कई श्रद्धालु बताते हैं कि इस मिलावटी कारोबार को रोकने के लिए जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई की जरूरत है। वरना लोगों की आस्था और स्वास्थ्य दोनों के साथ खिलवाड़ होता रहेगा।

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