पोइला बैसाख से शुरू होता है बंगाली नववर्ष, जानें कैसे मनाया जाता है यह पर्व

4 Min Read

रांची : हर एक समुदाय की अपनी एक खास संस्कृति होती है। ऐसे ही हर समुदाय के लोग अलग-अलग दिन नव वर्ष मनाते है।

पोइला बैसाख बंगाली समुदाय के लिए न केवल एक महत्वपूर्ण पर्व है, बल्कि यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण घटक है, क्योकि यह नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक होता है। इस दिन को उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

पोइला बैसाख के उत्सव में अनेक परंपरागत और सांस्कृतिक आयाम होते हैं। लोग नए कपड़े पहनते हैं, धार्मिक आराधना करते हैं, गाने और नृत्य करते हैं।

इसके साथ ही, वे एक-दूसरे को बधाई देते हैं और परिवार और मित्रों के साथ विशेष भोजन का आनंद लेते हैं।

इस दिन को बंगाली समुदाय के लोग अपने अटूट संबंधों को मजबूत करने और नए संकल्प बनाने का भी अवसर मानते हैं।

पोइला बैसाख को बंगाल के साथ-साथ झारखंड, त्रिपुरा, असम और बांग्लादेश में भी बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

यह दिन नए व्यापारिक वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है और इस अवसर पर व्यापारी नए बही-खाते बनाते हैं।

इस दिन लोग सुबह जल्दी उठकर सूर्य देवता को प्रणाम करते हैं, स्नान करते हैं, नए कपड़े पहनते हैं और अपने घरों और मंदिरों को सजाते हैं।

पूजा-आराधना के बाद विभिन्न प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं और गौ माता की पूजा भी की जाती है।

इस दिन बंगाली लोग श्री गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं और एक-दूसरे को ‘शुभो नोबो बोरसो’ कहकर नए साल की शुभकामनाएं देते हैं, जिसका अर्थ होता है ‘नए साल की शुभकामनाएं’।

पोइला बैसाख के पर्व से बहुत सारी मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। ऐसा कहा जाता है कि मुगल शासन के दौरान इस्लामी हिजरी कैलेंडर के साथ करों का संग्रह किया जाता था।

लेकिन हिजरी कैलेंडर और चंद्र कैलेंडर मेल नहीं खाता था क्योंकि दोनों कैलेंडर में कृषि चक्र अलग हुआ करते थे।

इसलिए बंगालियों ने दूसरे कैलेंडर की शुरुआत करने का सोचा और उसका नाम बंगबाड़ा रखा। इसी कैलेंडर के हिसाब से उन्होंने नव वर्ष मनाने की शुरुआत की।

वही एक दूसरी मान्यता के हिसाब से बंगाली कैलेंडर को राजा शशांक से जोड़ा जाता है। बंगबाड़ा का उल्लेख दो शिव मंदिरों में पाया जाता है।

इससे यह पता चलता है कि बंगाली कैलेंडर की उत्पत्ति अकबर काल से पहले हुई थी।

इसके अलावा इस दिन बंगाल में जगह-जगह मेले का आयोजन किया जाता है और अनेक प्रकार के शुभ काम जैसे नया घर लेना, विवाह, मुंडन आदि करना अच्छा माना जाता है।

बंगाली नव वर्ष के दिन पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं और महिलाएं पीले रंग की साड़ी तथा पुरुष धोती कुर्ता पहनते हैं।

इस दिन की शुरुआत रवींद्रनाथ टैगोर के संगीत गाते हुए की जाती है और इसे बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।

इस पर्व का महत्व उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पीछे के साथ-साथ उसके आधुनिक रूप में भी होता है।

यह नया साल, नए संकल्प और नई आशाओं का प्रतीक होता है और साथ ही उत्साह और समृद्धि की आशा देता है।

इसे भी पढ़ें

झारखंड जनजातीय विवि के लिए 129 पद मंजूर

Share This Article
कोई टिप्पणी नहीं