दयानंद राय
रांची : झारखंड भाजपा में लगभग 20 साल बाद फिर से बाबूलाल युग शुरू हो गया है। इससे पहले झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर उनका 27 महीने का कार्यकाल आज भी याद किया जाता है। सच तो ये है कि झारखंड के वर्ष 2000 में जन्म लेने और धीमे-धीमे कदम बढ़ाने तक के सफर में बाबूलाल ने ही झारखंड का नेतृत्व किया है।
शहर के हरमू मैदान में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने औपचारिक रूप से बाबूलाल को झारखंड भाजपा की कमान सौंपी। हालांकि इसकी शुरूआत इसी साल चार जुलाई को तब हो गयी थी जब पार्टी ने उन्हें भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। हरमू मैदान में जनता के हुजूम और भाजपा कार्यकर्ताओं की उम्मीद भरी निगाहों के बीच नड्डा ने उन्हें पार्टी का नेतृत्व तो सौंप दिया है।
लेकिन बाबूलाल मरांडी के लिए आगे की राह आसान नहीं है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती तो भाजपा प्रदेश कार्यसमिति के गठन की है। यह काम चार महीने पहले ही पूरा होना था पर अब तक लटका हुआ है। इसमें जातियों के समीकरण के साथ पार्टी के नये पुराने नेताओं की अपेक्षाओं पर भी उन्हें खरा उतरना होगा।
यह साफ है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उनके चेहरे पर ही झारखंड में लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ेगी। ऐसे में उनके ऊपर चुनावों में पार्टी के बेहतर प्रदर्शन की भी जिम्मेवारी होगी। चुनावों से पहले भाजपा में कई बड़े नेताओं की वापसी होनी है। इनमें सरयू राय समेत कई नेताओं के आने की अटकलें लगायी जा रही हैं। झारखंड में लोकसभा चुनावों के लिए पांच महीने और विधानसभा चुनावों के लिए लगभग 14 महीने का वक्त बचा है।
ऐसे में चुनावी रणनीति बनाने के साथ ही केंद्रीय नेतृत्व के साथ मिलकर उम्मीदवारों के नाम तय करने का काम भी उनकी जिम्मेवारी होगी। लोकसभा चुनावों में पार्टी को कई उम्मीदवारों के नाम काटने पड़ सकते हैं और ऐसे में उनके बागी होने का भी खतरा रहेगा। ऐसे में इन परिस्थितियों में पार्टी की नैया संतुलित रूप से खेने की जिम्मेवारी भी उनपर रहेगी। चूंकि बाबूलाल मरांडी अब प्रदेश भाजपा के कमांडर इन चीफ हैं तो वे चाहेंगे कि पार्टी लोकसभा चुनावों में कम से कम 12 सीटों पर तो जीत दर्ज करे ही बल्कि विधानसभा चुनावों में झारखंड में अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में आ सके।
राज्य की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को देखें तो यह आसान काम नहीं है। हालांकि बाबूलाल मरांडी को संगठन का पुराना अनुभव है और चुनावी गणित के हिसाब से काम करने में भी वे कुशल हैं पर धारा के विपरीत प्रदेश भाजपा की नाव खेने का काम उनके लिए आसान नहीं होगा।
आंतरिक गुटबाजी से जूझना
हालांकि रघुवर दास की प्रदेश की राजनीति से बाहर होने और अर्जुन मुंडा गुट के ढीला पड़ने के साथ प्रदेश भाजपा में आंतरिक गुटबाजी थोड़ी कम हो गयी है। लेकिन ऐसा नहीं है कि पार्टी में खेमेबंदी अभी भी है। ऐसे में इस गुटबाजी से जूझते हुए उनके सामने चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन बेहतर करने की जिम्मेवारी होगी।
इसके अलावा पार्टी में अभी भी झाविमो से आये नेता और कार्यकर्ता अपना स्थान बनाने के लिए जूझ रहे हैं। उन्हें पार्टी में इस प्रकार समायोजित करना कि उनका सम्मान भी बना रहे और भाजपा के पुराने नेता और कार्यकर्ता असहज न हो इसे इंप्लीमेंट करने की जिम्मेवारी भी उन्हीं पर है। कहने में ये भले ही आसान हो पर यथार्थ के धरातल पर इन चुनौतियों से निपटना आसान काम नहीं है।
हालांकि बाबूलाल मरांडी के लिए अच्छा ये है कि तीन दशक से ज्यादा के राजनीतिक अनुभवों ने उन्हें इतना मांज डाला है कि उम्मीद यही है कि वे प्रदेश भाजपा के बेहतर खेवनहार बनके उभरेंगे और अपनी उपयोगिता सिद्ध करेंगे।








