रामदास सोरेनः 3 बार विधायक, 2 बार कैबिनेट मंत्री रहे

Anjali Kumari
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Ramdas Soren:

रांची। झारखंड की सियासत में बड़ा नाम और झामुमो के कद्दावर नेता रामदास सोरेन अब इस दुनिया में नहीं हैं। 62 साल की उम्र में दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली।
15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस के दिन उनकी मौत की खबर ने पूरे झारखंड को स्तब्ध कर दिया।

ग्राम प्रधान से की राजनीति की शुरुआतः

कभी ग्राम प्रधान से राजनीति की शुरुआत करने वाले रामदास ने झारखंड आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी और 44 साल के संघर्ष के बाद वे तीन बार विधायक और दो बार कैबिनेट मंत्री बने।

2005 में बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़े थेः

रामदास सोरेन की राजनीति घाटशिला विधानसभा क्षेत्र से शुरू हुई। वे झामुमो के पूर्वी सिंहभूम जिलाध्यक्ष भी रहे। साल 2005 में जब झामुमो-कांग्रेस गठबंधन के कारण घाटशिला सीट कांग्रेस के खाते में चली गई और पार्टी ने टिकट नहीं दिया, तो उन्होंने जिलाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

निर्दलीय मैदान में उतरे और 35 हजार वोट लाकर सभी को चौंका दिया। भले ही वे हार गए, लेकिन उन्होंने साबित कर दिया कि घाटशिला में उनकी पकड़ मजबूत है। यही दौर उनके बड़े राजनीतिक करियर की नींव बनी।

तीन बार विधायक, दो बार मंत्री बनेः

रामदास को 2009 में पहली बार झामुमो ने टिकट दिया और वे विधायक बने। 2014 में भाजपा के लक्ष्मण टुडू से हार गए, लेकिन हार के बाद भी क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहे। 2019 में उन्होंने भाजपा से यह सीट छीन ली। 2024 में तीसरी बार भारी मतों से जीतकर घाटशिला के विधायक बने।

दूसरा कार्यकाल पूरा नहीं कर सकेः

अगस्त 2024 में वे पहली बार जल संसाधन और उच्च शिक्षा तकनीकी मंत्री बने, लेकिन ढाई महीने बाद ही मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ और उन्हें स्कूली शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। हालांकि, वे अपने दूसरे कार्यकाल को पूरा नहीं कर पाए।

मंत्री बनने पर गांव में मनाया गया था जश्नः

मंत्री बनने के बाद रामदास सोरेन के पैतृक गांव खरस्वती में जबरदस्त जश्न मनाया गया। परिवार और समर्थकों ने मिठाइयां बांटीं और ढोल-नगाड़ों की थाप पर खुशी जताई। लेकिन इसी बीच 2 अगस्त 2025 को जमशेदपुर स्थित आवास में वे बाथरूम में गिर गए और सिर में गंभीर चोट लगी।

सिर में ब्लड क्लॉटिंग हुई। स्थिति नाजुक होने पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के निर्देश पर उन्हें एयरलिफ्ट कर दिल्ली ले जाया गया। डॉक्टरों की टीम इलाज में जुटी रही, लेकिन 15 अगस्त को उन्होंने दम तोड़ दिया।

आंदोलनकारी छवि और बॉडी वारंट तक जारी हुआ थाः

रामदास सोरेन सिर्फ राजनेता ही नहीं, बल्कि आंदोलनकारी और समाजसेवी भी थे। 1980 से झामुमो से जुड़े और अलग राज्य आंदोलन में शिबू सोरेन, चंपाई सोरेन, सुनील महतो, सुधीर महतो और अर्जुन मुंडा के साथ संघर्ष किया।

उनकी सक्रियता इतनी थी कि उनके नाम से बॉडी वारंट तक जारी हुआ था। जमीन से जुड़े नेता के रूप में उन्होंने आदिवासी स्वशासन की योजनाओं को आगे बढ़ाया और सामाजिक सरोकारों में हमेशा सक्रिय रहे। यही वजह थी कि उन्हें घाटशिला का जननेता कहा जाता था।

चार बच्चों के पिता, परिवार, सादगी और संघर्ष की मिसालः

रामदास सोरेन के परिवार में पत्नी सूरजमनी सोरेन (56), तीन बेटे सोमेन, रबिन और रूपेश तथा एक बेटी रेणुका सोरेन हैं। राजनीतिक करियर में उन्होंने पंचायत अध्यक्ष से लेकर तीन बार विधायक और दो बार मंत्री बनने तक का सफर तय किया। झामुमो संगठन में वे चार बार जिलाध्यक्ष बने। उनकी मौत से घाटशिला समेत पूरे कोल्हान क्षेत्र में शोक की लहर है। कार्यकर्ता मानते हैं कि वे सादगी और संघर्ष की मिसाल थे।

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