रांची : नृत्य-संगीत आदिवासी समाज की पहचान है। मणिपुर में जो हिंसा हो रही है वह इस संघर्ष की ही पहचान है। यह संघर्ष है, कट्टरपंथियों और जिओ और जीने दो की उदार ताकतों को बीच। संघर्ष है, प्रकृति का विनाश करने वाले और प्रकृति का सहयोगी बनकर रहने वाले लोगों के बीच। देश के 13 करोड़ से ज्यादा आदिवासियों से मैं कट्टरपंथियों के खिलाफ एक साथ लड़ने की अपील करता हूं। बुधवार को ये बातें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहीं। वे बिरसा मुंडा स्मृति उद्यान में आयोजित दो दिवसीय आदिवासी महोत्सव के उद्घाटन समारोह में बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि आज देश का आदिवासी समाज बिखरा हुआ है। हम धर्म क्षेत्र के आधार पर बटे हैं। हमारा लक्ष्य, हमारी समस्या एक जैसी है तो हमारी लड़ाई भी एक जैसी होनी चाहिए। देश में आदिवासियों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ रहा है। हमारी व्यवस्था इतनी निर्दयी है कि उन्होंने यह भी पता नहीं किया कि खदानों, उद्योगों के दौरान कितने लोग विस्थापित और बेघर हुए।
जो लोग इस दौरान विस्थापित हुए उनमें से 80 प्रतिशत आदिवासी हैं। इन्हें अपनी जड़ों से काट दिया गया है। कल का किसान आज साइकिल पर कोयला बेचने को मजबूर है, बंधुआ मजदूर बना हुआ है। राज्य में लाखों एकड़ जमीन कोयला कंपनियों को दी गयी। लेकिन लोगों को उस अनुपात में रोजगार और नौकरी नहीं मिली।
हेमंत ने कहा कि हमारी धरती तप रही है लेकिन कंपनी और केंद्र सरकार कान में तेल डालकर सोई हुई है। किसकी संपत्ति खत्म हुई, किसकी जमीन गयी। जो विकसित हैं वो कौन हैं। इतिहासकारों ने भी आदिवासियों के साथ बेईमानी की और आदिवासियों का जिक्र नहीं किया गया है। देश की आजादी के लिए आदिवासियों ने बलिदान दिया।
इतिहासकारों ने हमारे पूर्वजों को जगह नहीं दी। आदिवासी के अधिकार को किसी और को दिया जा रहा है। लोग हमारे नाम तक छिनने लगे हैं। हम मूल निवासी हैं, प्रकृति का हिस्सा हैं। पर कोई हमें वनवासी कहकर चिढ़ा रहा है और कोई जंगली बता रहा है। आज आदिवासी अपनी पहचान के लिए इतिहास में की गयी उपेक्षा के खिलाफ बोलता है तो उन्हें चुप कराने की साजिश रची जा रही है।
समाज की मुख्य धारा के माध्यम से हमेशा प्रयास किया गया है कि इतिहास में हमारी कोई भूमिका ना रहे। जब हम इतिहास जानने का प्रयास करते हैं तो 1800 ई के पहले का इतिहास नहीं मिलता है। हमें टुकड़ों में बांटकर देखने का प्रयास किया गया है। हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए बहुत कुछ किया। इस देश को गढ़ने में आदिवासी समाज की भूमिका की पुर्नव्याख्या की जानी चाहिए। हमारे पास विश्व में मानव समाज को देने के लिए बहुत कुछ है बस उसकी दृष्टि होनी चाहिए।
कार्यक्रम में दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने कहा कि आदिवासी पूरे देश और पूरी दुनिया में हैं। आदिवासी मजदूरी करता है। हम आदिवासी दिवस मनाते हैं आने वाली पीढ़ी भी मनाती रहेगी। इससे पहले कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए पंचायती राज विभाग में सचिव राजीव अरुण एक्का ने कहा कि आदिवासी सीधे होते हैं। उनके लिए भी योजनाएं बन रही है।
महात्मा गांधी ने 9 अगस्त को भारत छोड़ों की शुरुआत की थी और 9 अगस्त को ही विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। जब से हेमंत सोरेन की सरकार आयी है तब से आदिवासियों के लिए कई कार्य किए गए हैं। कार्यक्रम में झारखंड की लोक गायिका मोनिका मुंडू ने समारोह में अपने गीतों से लोगों को झुमा दिया।
कार्यक्रम में एक साथ 35 पुस्तकों का लोकार्पण किया गया जिसमें कई तरह के रिसर्च और महत्वपूर्ण किताबें हैं। आदिवासी महोत्सव के मौके पर एक खास डाक टिकट का भी लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम में शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन के साथ चंपई सोरेन, विनोद सिंह, जयमंगल सिंह, राजेश कच्छप, झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य, विनोद पांडेय, राज्य के मुख्य सचिव सुखदेव सिंह, राज्य के डीजीपी अजय कुमार, आदिवासी कल्याण सचिव राजीव अरुण एक्का, प्रधान सचिव वंदना, विनय कुमार चौबे, राजेश कुमार तथा कई अन्य मौजूद रहे।









