Herbal gulal for Holi
सरायकेला-खरसावां। झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले में होली को लेकर खास तैयारी चल रही है। इस बार बाजारों में केमिकल वाले रंगों के बजाय प्राकृतिक और पर्यावरण अनुकूल हर्बल गुलाल की धूम है। खरसावां के आमदा गांव की महिलाएं पारंपरिक फूलों और पत्तियों से हर्बल गुलाल तैयार कर रही हैं, जिसकी बाजार में काफी मांग है।
कैसे तैयार किये जा रहे गुलाल
महिलाएं पलाश, पालक, हल्दी, चुकंदर, गेंदा और सिंद्धार फूलों से विभिन्न रंगों का गुलाल बना रही हैं। हरा रंग पालक से, गुलाबी चुकंदर से, पीला हल्दी से और नीला सिंद्धार फूल से तैयार किया जा रहा है। इसमें किसी भी प्रकार के रासायनिक पदार्थ का इस्तेमाल नहीं किया जाता, जिससे यह त्वचा, आंखों और बालों के लिए सुरक्षित माना जा रहा है।
इस पहल को Jharkhand State Livelihood Promotion Society (JSLPS) का सहयोग मिला है। ‘पलाश’ ब्रांड के तहत इन हर्बल गुलाल की पैकेजिंग और बिक्री की जा रही है। महिलाएं फूल तोड़ने से लेकर सुखाने, पीसने, छानने, पैकिंग और मार्केटिंग तक की पूरी जिम्मेदारी खुद संभाल रही हैं।
ऐसे तैयार होता है हर्बल गुलाल
पलाश के फूलों को तोड़कर दो-तीन दिन तक सुखाया जाता है। सूखने के बाद काले हिस्से को अलग कर फूलों को पीस लिया जाता है। फिर इसे छानकर अरारोट पाउडर में मिलाया जाता है। सुगंध के लिए गुलाब जल या एसेंशियल ऑयल डाला जाता है। पूरी तरह सूखने के बाद महीन छलनी से छानकर पैकिंग की जाती है।
सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल विकल्प
बाजार में मिलने वाले कई रंगों में हानिकारक केमिकल होते हैं, जो त्वचा में जलन, एलर्जी और आंखों की समस्या पैदा कर सकते हैं। इसके विपरीत, हर्बल गुलाल पूरी तरह प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल है। यही कारण है कि साल-दर-साल इसकी मांग बढ़ती जा रही है।
यह पहल न सिर्फ होली के रंगों को सुरक्षित बना रही है, बल्कि महिलाओं के सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की मिसाल भी पेश कर रही है। आमदा की महिलाएं स्वास्थ्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन को एक साथ जोड़कर एक नई पहचान बना रही हैं।








