Colon cancer
नई दिल्ली, एजेंसियां। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, गलत खानपान, तनाव और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण कब्ज की समस्या बेहद आम हो गई है। अधिकतर लोग इसे मामूली परेशानी मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। हालांकि, जब कब्ज लंबे समय तक बनी रहती है, तो मन में यह सवाल उठने लगता है कि कहीं यह आंत या कोलन कैंसर का संकेत तो नहीं। विशेषज्ञों के अनुसार, ज्यादातर मामलों में कब्ज का सीधा संबंध कैंसर से नहीं होता, बल्कि यह फाइबर की कमी, कम पानी पीने, बैठे रहने वाली जीवनशैली या कुछ दवाओं के साइड इफेक्ट के कारण होती है।
कब्ज किसे कहते है?
कब्ज तब कहलाती है जब व्यक्ति को हफ्ते में दो से तीन बार से कम शौच जाना पड़े, मल बहुत सख्त हो, ज्यादा जोर लगाना पड़े या पेट पूरी तरह साफ न हो। अगर यह समस्या तीन हफ्ते या उससे अधिक समय तक बनी रहे, तो इसे क्रोनिक कब्ज कहा जाता है। आमतौर पर यह स्थिति डाइट सुधारने, पर्याप्त पानी पीने और नियमित व्यायाम से ठीक हो जाती है।
हालांकि कुछ परिस्थितियों में कब्ज को गंभीरता से लेना जरूरी हो जाता है। अगर कब्ज के साथ मल में खून आए, मल का रंग काला हो जाए, बिना वजह वजन तेजी से घटने लगे, लगातार थकान महसूस हो या पेट में लगातार दर्द और गांठ जैसा एहसास हो, तो यह कोलन कैंसर जैसे रोगों का संकेत हो सकता है। इसके अलावा, कब्ज और दस्त का बारी-बारी से होना भी चेतावनी का संकेत माना जाता है।
विशेषज्ञ क्या कहते है?
विशेषज्ञ बताते हैं कि कैंसर की शुरुआती अवस्था में केवल कब्ज होना आमतौर पर लक्षण नहीं होता। जब ट्यूमर काफी बढ़ जाता है और आंत का रास्ता आंशिक रूप से संकरा होने लगता है, तब ऐसी समस्याएं सामने आती हैं। खासतौर पर 45–50 साल की उम्र के बाद अगर पहली बार लगातार कब्ज की शिकायत हो, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी हो जाता है।
इसलिए कब्ज को नजरअंदाज न करें, लेकिन घबराएं भी नहीं। समय पर सही खानपान, लाइफस्टाइल में बदलाव और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह लेना ही सबसे बेहतर उपाय है।







