The Raja Saab Review: द राजा साब, प्रभास की फिल्म हॉरर-कॉमेडी के नाम पर फैंटेसी का बिखरा प्रयोग

Anjali Kumari
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The Raja Saab Review

मुंबई, एजेंसियां। फिल्म द राजा साब देखकर सबसे पहला सवाल यही उठता है कि क्या भव्यता ही अब सिनेमा की पहचान बन गई है। प्रभास जैसे सुपरस्टार, भारी बजट, हॉरर कॉमेडी का नया पैक और पैन इंडिया अपील, सब कुछ मौजूद है, लेकिन फिल्म खत्म होने तक यह साफ हो जाता है कि बड़े सेट, महंगे VFX और लंबी लेंग्थ (करीब 3 घंटे) किसी फिल्म को अपने आप मजबूत नहीं बना देते। डायरेक्टर मारुति की यह फिल्म न डराती है, न हंसाती है और न ही इमोशनली बांध पाती है।

कहानी

कहानी राजा प्रभास और उनकी दादी गंगम्मा (जरीना वहाब) से शुरू होती है। अल्जाइमर से जूझ रहीं गंगम्मा अपने लापता पति कनकराजू (संजय दत्त) को नहीं भूल पातीं। दादी की इसी उम्मीद के सहारे राजा अपने दादा की तलाश में निकल पड़ता है।
यह तलाश उसे हैदराबाद से होते हुए एक रहस्यमयी और कथित तौर पर भूतिया महल तक ले जाती है, जहां तंत्र मंत्र, हिप्नोटिज्म, लालच और अतीत के कई राज छिपे हैं। कहानी सुनने में दिलचस्प लगती है, लेकिन पर्दे पर आते आते यह बिखर जाती है। फिल्म बिना ठोस वजह के लोकेशन बदलती है, किरदार आते जाते रहते हैं और दर्शक यह समझता रह जाता है कि असली दिशा आखिर है क्या?
प्रभास स्टारर यह फिल्म तेलुगु (मूल), हिंदी, तमिल, मलयालम और कन्नड़ भाषा में रिलीज की गई है।

अभिनय

प्रभास इस बार हल्के और कॉमिक अंदाज में दिखना चाहते हैं। कुछ सीन्स में उनकी टाइमिंग काम करती है, लेकिन किरदार की गहराई इतनी कम है कि उनसे जुड़ना मुश्किल हो जाता है। कई सीन में उनका लुक और एक्सप्रेशन अननेचुरल लगता है, मानो वे खुद भी पूरी तरह यकीन में न हों। जरीना वहाब फिल्म की सबसे ईमानदार परफॉर्मेंस देती हैं। उनके इमोशनल सीन असर छोड़ते हैं, खासकर क्लाइमैक्स के आसपास।
संजय दत्त का किरदार दमदार हो सकता था, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें भी सीमित कर देती है।
तीनों अभिनेत्रियां मालविका मोहनन, निधि अग्रवाल और रिद्धि कुमार कहानी का हिस्सा कम और सजावट ज्यादा बनकर रह जाती हैं। उनके पास करने के लिए लगभग कुछ भी यादगार नहीं है।
कॉमिक कलाकारों की टीम कुछ जगह राहत देती है, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट उनकी भी ताकत छीन लेती है।
संजय दत्त ने फिल्म में मेन विलेन कनकराजू की भूमिका निभाई है।

निर्देशन और तकनीक

मारुति की सबसे बड़ी चूक यही है कि फिल्म को क्या बनाना है, इस पर स्पष्टता नजर नहीं आती। हॉरर, कॉमेडी, फैंटेसी और इमोशन सब एक साथ परोसे गए हैं, लेकिन बैलेंस कहीं नहीं है। एडिटिंग फिल्म को और भारी बना देती है। करीब तीन घंटे की लंबाई थकाने लगती है।
सिनेमैटोग्राफी एवरेज है और जरूरत से ज्यादा ग्रीन स्क्रीन इस्तेमाल फिल्म को फेक बना देती है।
VFX इतने बड़े बजट के बावजूद कई जगह कमजोर और अधूरे लगते हैं।
फिल्म में बोमन ईरानी ने एक साइकियाट्रिस्ट, हिप्नोटिस्ट और पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर के किरदार में नजर आए हैं।

संगीत

थमन का म्यूजिक इस फिल्म की जान नहीं बन पाता। बैकग्राउंड स्कोर कई जगह जरूरत से ज्यादा तेज है, लेकिन असरदार नहीं। गाने कहानी की रफ्तार तोड़ते हैं और याद रहने लायक कोई धुन नहीं छोड़ते।

फिल्म देखें या नही

द राजा साब एक ऐसी फिल्म है जो कागज पर बेहतर लगती है, पर्दे पर नहीं। इसमें पैसा है, स्टार है, स्केल है, लेकिन आत्मा नहीं। प्रभास की कोशिश नजर आती है, कुछ सीन ठीक हैं, लेकिन कुल मिलाकर फिल्म लंबी, थकी हुई और दिशाहीन लगती है।
400 करोड़ रुपए की फिल्म की इस भव्य यात्रा के बाद हाथ में बस यही सवाल बचता है कि अगर कहानी मजबूत नहीं थी, तो इतना बड़ा महल बनाने की जरूरत क्या थी।

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