Haq Review:
मुंबई, एजेंसियां। यामी गौतम और इमरान हाशमी स्टारर फिल्म ‘हक’ को गंभीर सामाजिक विषय उठाने के लिए सराहा जा रहा है, लेकिन मजबूत कंटेंट के बावजूद इसमें कुछ बड़ी कमजोरियां हैं जो इसे “परफेक्ट फिल्म” बनने से रोक देती हैं। सुपर्णा वर्मा के निर्देशन में बनी यह फिल्म शाहबानो केस से प्रेरित है और 7 नवंबर को रिलीज हुई। जहां यामी गौतम ने ‘शाजिया’ के रूप में दिल जीता, वहीं कहानी और स्क्रिप्ट की कमजोरियों ने असर को कम किया।फिल्म का विषय गहरा है, लेकिन इसकी रफ्तार कई जगहों पर बहुत धीमी हो जाती है। कई सीन ऐसे लगते हैं मानो कहानी को अनावश्यक रूप से खींचा गया हो। इससे दर्शक का इमोशनल कनेक्शन कमजोर पड़ जाता है।
इमरान हाशमी का अधूरा किरदार:
‘अब्बास खान’ के किरदार में इमरान हाशमी ने मेहनत की है, लेकिन स्क्रिप्ट उनके साथ न्याय नहीं करती। उनका किरदार स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है — वह न पूरी तरह हीरो दिखता है न विलेन, जिससे भ्रम पैदा होता है।वर्तिका सिंह जैसी कलाकारों के बावजूद सहायक किरदारों को पर्याप्त स्क्रीन टाइम नहीं मिला। कुछ महत्वपूर्ण पात्र बस औपचारिक लगते हैं, जिससे कहानी की परतें अधूरी रह जाती हैं।फिल्म के गंभीर विषय को प्रभावी संवाद और भावनात्मक प्रस्तुति से उभारा जा सकता था, लेकिन कई जगहों पर अतिनाटकीय दृश्य कहानी को भारी बना देते हैं।
बेवजह लव स्टोरी का एंगल:
कहानी के मूल सामाजिक संघर्ष को लव ट्रैक से जोड़ने की कोशिश फिल्म को कमजोर करती है। यह भावनात्मक गहराई की बजाय फिल्म को मेलोड्रामा की ओर मोड़ देती है।‘हक’ साहसिक विषय पर बनी एक जरूरी फिल्म है, लेकिन कमजोर पटकथा, धीमी गति और अनावश्यक नाटकीयता के चलते यह अपने प्रभाव को पूरी तरह स्थापित नहीं कर पाती। यामी गौतम का दमदार प्रदर्शन फिल्म का सबसे उजला पक्ष बनकर उभरता है।
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