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मुंबई, एजेंसियां। नीरज घायवान, जिन्होंने 2015 में मसान जैसी उत्कृष्ट फिल्म से दर्शकों का दिल जीता था, 10 साल बाद सिनेमाघरों में वापसी कर चुके हैं। उनकी नई फिल्म ‘होमबाउंड’ ने आते ही आलोचकों और दर्शकों दोनों का ध्यान खींच लिया है और ऑस्कर्स जैसी अंतरराष्ट्रीय मंचों तक इसका नाम सुर्खियों में रहा। यह फिल्म न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि समाज के संवेदनशील और कड़वे सच को भी सामने लाती है।
कहानी और पृष्ठभूमि
फिल्म की कहानी उत्तर भारत के एक छोटे से गांव में सेट है, जहां शोएब (ईशान खट्टर) और चंदन (विशाल जेठवा) की जिंदगी जाति और धर्म की बेड़ियों से प्रभावित होती है। 2020 का लॉकडाउन और उससे उत्पन्न त्रासदी फिल्म में संवेदनशीलता के साथ दिखाई गई है। शोएब के लिए नौकरी परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए जरूरी है, वहीं चंदन का सपना अपनी मेहनत से पक्का घर बनाना है, ताकि उसकी मां को जीवनभर मजदूरी न करनी पड़े।
एक्टिंग और किरदार
विशाल जेठवा ने चंदन के किरदार में जिस तरह की खामोशी और भीतर के गुस्से को दर्शाया है, वह दर्शकों के दिल को छू जाता है। ईशान खट्टर ने शोएब के किरदार में दर्द, हिम्मत और दोस्ती की गहराई को बखूबी पेश किया। दोनों किरदारों की दोस्ती बेहद असली लगती है, जो जाति और धर्म के भेदभाव के बावजूद इंसानियत की शक्ति को दर्शाती है।
निर्देशन और विजुअल्स
नीरज घायवान और प्रतीक शाह ने फिल्म के विजुअल्स और निर्देशन में कमाल किया है। फिल्म संघर्ष को रोमांटिक या ग्लैमराइज्ड नहीं बनाती, बल्कि उसकी सच्चाई को सीधे और संवेदनशील तरीके से दर्शाती है। फिल्म के विलेन न तो कोई व्यक्ति है और न ही काल्पनिक पात्र, बल्कि जातिगत भेदभाव, धार्मिक पूर्वाग्रह और सरकारी बेरुखी ही कहानी में मुख्य विरोधी के रूप में मौजूद हैं।
क्यों देखनी चाहिए?
‘होमबाउंड’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि अनुभव है। यह फिल्म हंसाती है, रुलाती है और समाज के उन कड़वे सच से रूबरू कराती है जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। यह आपको दोस्ती, इंसानियत और संघर्ष की असली परिभाषा सिखाती है। फिल्म न केवल लॉकडाउन के समय की घटनाओं को दिखाती है, बल्कि आज भी हजारों मील दूर अपनी पहचान और सपनों के साथ जूझ रहे लोगों की कहानी को भी सामने लाती है।
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