NEET-PG 2025-26
नई दिल्ली, एजेंसियां। NEET-PG 2025-26 को लेकर नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने एक बड़ा और विवादास्पद फैसला लिया है। खाली पड़ी पोस्ट ग्रेजुएट (PG) मेडिकल सीटों को भरने के उद्देश्य से क्वालीफाइंग कट-ऑफ में अभूतपूर्व कटौती की गई है। इस बदलाव के बाद अब SC, ST और OBC श्रेणी के वे उम्मीदवार भी MD, MS और DNB कोर्स में एडमिशन के लिए पात्र हो गए हैं, जिनका पर्सेंटाइल शून्य (0) है या जिनके अंक माइनस में हैं।
निर्णय विवादों मे
यह फैसला सामने आते ही चिकित्सा जगत में तीखी बहस शुरू हो गई है। जहां सरकार और नियामक संस्थाएं इसे व्यावहारिक जरूरत बता रही हैं, वहीं डॉक्टरों और विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग इसे मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा से जोड़कर देख रहा है।
क्या है नया कट-ऑफ बदलाव?
केंद्र सरकार के निर्देश पर NBEMS ने खाली PG सीटों को भरने के लिए कट-ऑफ को न्यूनतम स्तर तक घटा दिया है। नई व्यवस्था के तहत अलग-अलग श्रेणियों के लिए कट-ऑफ इस प्रकार तय की गई हैः
General / EWS
पहले: 50th Percentile
अब: 7th Percentile
न्यूनतम अंक: 103
SC / ST / OBC
पहले: 40th Percentile
अब: 0 Percentile
न्यूनतम अंक: -40
UR-PwBD
पहले: 45th Percentile
अब: 5th Percentile
न्यूनतम अंक: 90
0 पर्सेंटाइल का का मतलब समझे
तकनीकी रूप से 0 पर्सेंटाइल का अर्थ यह है कि परीक्षा में शामिल हुआ हर उम्मीदवार, चाहे उसके अंक शून्य हों या उससे कम, काउंसलिंग के लिए पात्र होगा, बशर्ते उसका नाम मेरिट लिस्ट में हो।
नेगेटिव मार्किंग और 0 पर्सेंटाइल का मतलब
NEET-PG परीक्षा में नेगेटिव मार्किंग की व्यवस्था है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष सबसे कम स्कोर लगभग -40 तक गया है। ऐसे में 0 पर्सेंटाइल लागू होने का सीधा मतलब यह हुआ कि अब माइनस स्कोर करने वाले उम्मीदवार भी खाली बची PG सीटों के लिए आवेदन कर सकेंगे।
हालांकि, पात्रता (Eligibility) का यह अर्थ नहीं है कि ऐसे उम्मीदवारों को मनपसंद या टॉप क्लीनिकल ब्रांच मिल जाएगी।
कौन-सी सीटों पर मिलेगा मौका?
सरकार और NBEMS ने साफ किया है कि कम पर्सेंटाइल या माइनस स्कोर वाले उम्मीदवारों को केवल वही सीटें मिल सकती हैं, जिन्हें टॉप रैंकर्स ने छोड़ दिया हो। आमतौर पर ये सीटें नॉन-क्लीनिकल ब्रांच जैसे एनाटॉमी, बायोकेमिस्ट्री, फिजियोलॉजी कुछ पैराक्लीनिकल विषय रेडियोलॉजी, डर्मेटोलॉजी, मेडिसिन, ऑर्थोपेडिक्स जैसी हाई-डिमांड ब्रांच अभी भी उच्च रैंक वालों के हिस्से में ही जाएंगी।
सरकार और NMC का तर्क क्या है?
सरकार और नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) का कहना है कि हर साल हजारों PG सीटें खाली रह जाती हैं, खासकर नॉन-क्लीनिकल ब्रांच में। इसका सीधा असर मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की कमी के रूप में सामने आता है।
उनका तर्क है खाली सीटें रहने से मेडिकल शिक्षा प्रणाली कमजोर होती है। फैकल्टी की कमी से MBBS छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होती है। PG सीटें भरने से भविष्य में शिक्षकों और विशेषज्ञों की संख्या बढ़ेगी। इसी कारण कट-ऑफ घटाकर अधिक से अधिक उम्मीदवारों को काउंसलिंग के दायरे में लाया गया है।

