अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि भारत के पास कितने परमाणु बम हैं? इस सवाल का सटीक नंबर भले ही जो भी हो, लेकिन यह सच है कि भारत दुनिया के उन 10 चुनिंदा शक्तिशाली देशों में से एक है जिनके पास न्यूक्लियर बॉम्ब बनाने का कोड और ताकत मौजूद है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भारत और दुनिया के अन्य देशों के पास यह महाविनाशकारी ताकत आखिर आई कहाँ से?
- 1. अमेरिका: मैनहटन प्रोजेक्ट और परमाणु युग का आगाज़
- 2. सोवियत यूनियन (रूस): जासूसी और विश्वासघात
- 3. यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन): दोस्तों का धोखा
- 4. फ्रांस: संप्रभुता (Sovereignty) की जंग
- 5. चीन: रिकॉर्ड-तोड़ रफ़्तार
- 6. इसराइल: सबसे बड़ा और गुप्त रहस्य
- 7. भारत: स्माइलिंग बुद्धा और शांतिपूर्ण धमाका
- 8. साउथ अफ्रीका: बनाने और नष्ट करने की अनोखी दास्तान
- 9. पाकिस्तान: ‘घास खाएंगे, लेकिन बम बनाएंगे’
- 10. उत्तर कोरिया (North Korea): सबसे बड़ा खतरा
- क्या कहानी यहीं खत्म होती है?
- समंदर की गहराइयों का डरावना सच (The Power of Submarines)
जब अमेरिका ने दुनिया का पहला न्यूक्लियर बॉम्ब (Nuclear Bomb) बनाया, तो उसे लगा कि बस अब वो दुनिया का बादशाह है और उसे कोई छू भी नहीं सकता । लेकिन अमेरिका गलत था । उस एक धमाके ने दुनिया में हथियारों की एक ऐसी खतरनाक रेस शुरू कर दी जिसने पूरी दुनिया का नक्शा और भू-राजनीति (Geopolitics) हमेशा के लिए बदल कर रख दी । आज दुनिया में 10 ऐसे देश हैं जिनके पास न्यूक्लियर बॉम्ब बनाने का कोड मौजूद है ।
इन देशों का सफर आसान नहीं था। कुछ देशों ने इस तकनीक को हासिल करने के लिए एक-दूसरे की मदद की, तो कुछ ने इसे चुराया । लेकिन लगभग सभी देशों ने जासूसों, धोखे और खुफिया डील्स (Secret Deals) का पूरा सहारा लिया । यह कहानी है उन 10 मुल्कों की जिन्होंने एक-दूसरे से मुकाबला करते हुए दुनिया की सबसे खतरनाक टेक्नोलॉजी बनाई ।

1. अमेरिका: मैनहटन प्रोजेक्ट और परमाणु युग का आगाज़
इस विनाशकारी सफर की असल शुरुआत 1938 में जर्मनी में हुई थी । यह वह वक्त था जब वैज्ञानिकों ने पहली बार न्यूक्लियर फिशन (Nuclear Fission) की खोज की थी । उन्हें पता चला कि एटम्स (Atoms) को तोड़कर चेन रिएक्शन (Chain Reaction) के जरिए मैसिव एनर्जी (Massive Energy) रिलीज़ की जा सकती है । इस ऐतिहासिक डिस्कवरी ने पूरी वैज्ञानिक बिरादरी को हिला कर रख दिया ।
अगले ही साल, महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन ने अमेरिका को एक गंभीर वार्निंग भेजी । उन्होंने अमेरिकी सरकार को बताया कि नाज़ी (Nazis) इस नई साइंस को वेपनाइज (हथियार के रूप में इस्तेमाल) कर सकते हैं ।
इस चेतावनी के बाद इतिहास के सबसे महंगे और सीक्रेटिव साइंस एक्सपेरिमेंट का आगाज हुआ ।
- द मैनहटन प्रोजेक्ट (The Manhattan Project): अमेरिका ने यह विशाल ऑपरेशन लॉन्च किया जिसमें अमेरिका, यूके (UK) और कनाडा के साइंटिस्ट शामिल थे ।
- खर्च: इन देशों ने अपनी पूरी जीडीपी (GDP) का तकरीबन 1% हिस्सा इस एक लक्ष्य पर खर्च कर दिया ।
- वो जानते थे कि जर्मन वैज्ञानिक भी इसी प्रोग्राम पर काम कर रहे हैं, लेकिन जर्मन्स को बहुत कम कामयाबी मिल रही थी । मई 1945 में जर्मनी ने सरेंडर कर दिया और तब तक वे बम नहीं बना पाए थे ।
जुलाई 1945 में न्यू मेक्सिको में ‘ट्रिनिटी टेस्ट’ (Trinity Test) कामयाब हो गया और अमेरिका एक न्यूक्लियर पावर बन चुका था । इसके बाद अगस्त में अमेरिका ने जापान पर दो न्यूक्लियर बॉम्ब्स गिराए और दूसरे विश्व युद्ध (Second World War) का अंत कर दिया ।
2. सोवियत यूनियन (रूस): जासूसी और विश्वासघात
प्रेसिडेंट हैरी ट्रूमेन, जोसेफ स्टालिन और विंस्टन चर्चिल पोस्टडैम कॉन्फ्रेंस (Potsdam Conference) में युद्ध के बाद की दुनिया पर चर्चा कर रहे थे । जब ट्रूमेन ने स्टालिन को बम के बारे में बताया, तो स्टालिन हैरान नहीं हुए, बल्कि उन्होंने सिर्फ सर हिलाया और कहा कि अमेरिका इसे जापान के खिलाफ अच्छी तरह इस्तेमाल करेगा ।
ट्रूमेन को नहीं पता था कि स्टालिन को यह बात पहले से पता थी । सोवियत यूनियन के जासूस मैनहटन प्रोजेक्ट के काफी अंदर तक घुसे हुए थे । अंदर ही अंदर स्टालिन बहुत गुस्से में थे कि अमेरिका ने उनसे पहले यह बम बना लिया ।
सोवियत प्रोग्राम ने फुल स्पीड पकड़ ली ।
- उन्होंने 1941 में ही अपनी रिसर्च शुरू कर दी थी क्योंकि उन्होंने नोटिस किया था कि अमेरिकन और ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने न्यूक्लियर फिजिक्स पर पेपर छापना बंद कर दिया है ।
- सोवियत जासूसों ने बहुत सारा डाटा चोरी किया, लेकिन स्टालिन बहुत शक्की (Suspicious) थे । उन्हें डर था कि अमेरिकन डबल एजेंट्स उन्हें गलत डाटा दे रहे हैं ।
- इसलिए उन्होंने चोरी किए गए डिज़ाइन्स पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया और जर्मन साइंटिस्ट्स को पकड़कर उनसे रिसर्च वेरिफाई करवाई ।
पश्चिम की उम्मीदों से कहीं ज्यादा तेजी से आगे बढ़ते हुए, 1949 में सोवियत ने कजाकिस्तान में अपना आरडीएस वन (RDS-1) बम डेटोनेट किया और अमेरिकी मोनोपॉली को पूरी तरह खत्म कर दिया । कोल्ड वॉर (Cold War) की हथियारों की दौड़ ऑफिशियली शुरू हो गई ।
3. यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन): दोस्तों का धोखा
तीसरा मुल्क ब्रिटेन बना, लेकिन यह सफर आसान नहीं था । ब्रिटिशर्स ने ‘ट्यूब एलॉयस’ (Tube Alloys) प्रोजेक्ट के नाम पर काफी रिसर्च कर ली थी । क्वबैक एग्रीमेंट (Quebec Agreement) के तहत उन्हें अपनी रिसर्च अमेरिका को देनी पड़ी, जिसमें यह तय हुआ था कि दोनों मुल्क टेक्नोलॉजी शेयर करेंगे ।
लेकिन 1946 में अमेरिका ने एक नया कानून पास करके न्यूक्लियर इनफार्मेशन के एक्सचेंज को कट ऑफ कर दिया और एग्रीमेंट को हवा में उड़ा दिया । अमेरिका यह सीक्रेट सिर्फ अपने तक रखना चाहता था, जिससे ब्रिटेन शॉक्ड रह गया । ब्रिटेन को एहसास हुआ कि वर्ल्ड पावर बने रहने के लिए उसे खुद ही कुछ करना पड़ेगा । दुनिया की सबसे बड़ी यूरेनियम सप्लाई और नॉलेज के दम पर उन्होंने काम तेज किया । 1952 में, यूके ने ऑस्ट्रेलिया के साहिल पर ‘ऑपरेशन हरीकन’ (Operation Hurricane) के तहत अपना पहला बम डेटोनेट किया ।
हाइड्रोजन बम (The Fusion Era): 1950 के दशक तक वैज्ञानिक और भी खतरनाक ‘थर्मोन्यूक्लियर वेपंस’ या ‘हाइड्रोजन बॉम्ब्स’ (Hydrogen Bombs) बना रहे थे । एटम्स को तोड़ने की जगह, ये उन्हें आपस में फ्यूज़ करके बनाए जाते थे । ये हिरोशिमा वाले बम से सैकड़ों गुना ज्यादा ताकतवर थे । ओपनहाइमर (Oppenheimer) जैसे वैज्ञानिकों ने वार्निंग दी कि यह इंसानियत को तबाही की तरफ ले जाएगा, लेकिन प्रेसिडेंट ट्रूमेन ने इग्नोर कर दिया । अमेरिका ने 1952 में ‘आईवी माइक’ (Ivy Mike) टेस्ट किया, रूस ने 1955 में और ब्रिटेन ने 1957 में हाइड्रोजन बम टेस्ट कर लिया । तबाही का पोटेंशियल 1000 गुना बढ़ चुका था ।
4. फ्रांस: संप्रभुता (Sovereignty) की जंग
स्वेज क्राइसिस (Suez Crisis) के दौरान फ्रांस को बहुत शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी और उसे लगा कि सुपर पावर्स उसे दबा रहे हैं । इसलिए उसने खुद का डिफेंस बनाने का फैसला किया ।
अमेरिका इसके सख्त खिलाफ था और फ्रांस को रोकने की बहुत कोशिश की । लेकिन फ्रेंच प्रेसिडेंट चार्ल्स डी गॉल (Charles de Gaulle) डटे रहे और कहा कि न्यूक्लियर वेपंस फ्रांस की सोवरेनिटी के लिए जरूरी हैं । अफ्रीका की अपनी कॉलोनीज़ (मेडागास्कर और गैबॉन) से यूरेनियम मंगवाकर, 1960 में फ्रांस ने अल्जीरिया के सहारा डेजर्ट में ‘जेरबोइस ब्लू’ (Gerboise Bleue) नाम से अपना पहला धमाका किया । फ्रांस ने दुनिया को मैसेज दिया कि उसे अब अमेरिकी मिलिट्री की जरूरत नहीं है ।
5. चीन: रिकॉर्ड-तोड़ रफ़्तार
चाइनीस लोग अमेरिकन्स के खिलाफ डिफेंस चाहते थे । शुरुआत में साथी कम्युनिस्ट देश होने के नाते सोवियत यूनियन ने चीन की मदद की । लेकिन जब सोवियत लीडर ख्रुश्चेव (Khrushchev) ने स्टालिन की लेगेसी पर सवाल उठाए और पश्चिम से रिश्ते बेहतर करने चाहे, तो माओत्से तुंग (Mao Zedong) भड़क गए । माओ ने इल्जाम लगाया कि रूस अपनी रेवोल्यूशनरी स्पिरिट खो रहा है ।
दोनों देशों में दरार आ गई और सोवियत ने अपनी सारी टेक्निकल हेल्प वापस ले ली । चीन में उस वक्त कल्चरल रेवोल्यूशन (Cultural Revolution) चल रहा था, फिर भी उन्होंने सारे रिसोर्सेज बम बनाने में लगा दिए ।
- 1964 में चीन ने ‘लॉप नूर’ (Lop Nur) झील पर अपना पहला एटॉमिक बम टेस्ट किया ।
- सिर्फ ढाई साल बाद उन्होंने हाइड्रोजन बम भी टेस्ट कर दिया, जो बेसिक फिशन बम से एडवांस फ्यूजन बम तक जाने की दुनिया की सबसे तेज डेवलपमेंट थी ।
6. इसराइल: सबसे बड़ा और गुप्त रहस्य
इसराइल इस लिस्ट का छठा और सबसे मिस्टीरियस मुल्क है । इसराइल ने आज तक ऑफिशियली नहीं माना है कि उसके पास न्यूक्लियर वेपंस हैं । 1950 में फ्रांस की मदद से नेगेव डेजर्ट (Negev Desert) में एक सीक्रेट फैसिलिटी बननी शुरू हुई, जिसे अमेरिकी स्पाई प्लेन्स ने स्पॉट कर लिया । प्रेसिडेंट जॉन एफ कैनेडी ने इंस्पेक्शन की डिमांड की, लेकिन इसराइलियों ने अंडरग्राउंड फैसिलिटीज को छुपाने के लिए फेक दीवारें और हिडन एलिवेटर्स बना दिए । माना जाता है कि 1967 तक उनके पास बम आ चुका था ।
मोरदेचाई वनूनू (Mordechai Vanunu) की कुर्बानी: दुनिया को इसका पक्का सबूत 1986 में मिला जब इसराइल की सीक्रेट फैसिलिटी में काम करने वाले टेक्नीशियन मोरदेचाई वनूनू ने वहां की फोटो लेकर एक ब्रिटिश न्यूज़पेपर को दे दी । पब्लिश होने से पहले ही इसराइली सीक्रेट सर्विस ‘मोसाद’ (Mossad) ने उसे पकड़ने के लिए एक ट्रैप लगाया ।
- एक फीमेल एजेंट ने लंदन में अमेरिकन टूरिस्ट बनकर वनूनू को फंसाया और उसे रोम ले गई ।
- रोम पहुंचते ही उसे ड्रग दिया गया और किडनैप करके वापस इसराइल लाया गया ।
- उसने 18 साल जेल में गुजारे, लेकिन उसकी वजह से दुनिया जान गई कि इसराइल एक न्यूक्लियर पावर है ।
7. भारत: स्माइलिंग बुद्धा और शांतिपूर्ण धमाका
भारत हमेशा से खुद को ट्रैप (Trap) फील करता था। वह 1962 में चीन से जंग हार चुका था और पाकिस्तान के साथ लगातार लड़ रहा था । कनाडा से लाए गए एनर्जी रिएक्टर के जरिए भारत ने रिसर्च शुरू की और क्लेम किया कि वे बम नहीं बना रहे हैं ।
लेकिन 1974 में भारत ने रेगिस्तान में एक टेस्ट किया जिसका कोड नेम ‘स्माइलिंग बुद्धा’ (Smiling Buddha) था और इसे ‘पीसफुल न्यूक्लियर एक्सप्लोजन’ (Peaceful Nuclear Explosion) कहा गया । कनाडा और अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध (Sanctions) लगा दिए । 1990 के दशक में भारत ने ऑफिशियली अपने प्रोग्राम को वेपनाइज किया और ‘नो फर्स्ट यूज़’ (No First Use) पॉलिसी लागू की—यानी भारत कभी पहले परमाणु हमला नहीं करेगा ।
8. साउथ अफ्रीका: बनाने और नष्ट करने की अनोखी दास्तान
साउथ अफ्रीका की कहानी सबसे अनोखी है । 1970 के दशक तक रंगभेद (Racism/Apartheid) के कारण दुनिया साउथ अफ्रीका से नफरत करती थी और उसे अकेला छोड़ दिया था । अंगोला जैसे पड़ोसी मुल्क कम्युनिस्ट कंट्रोल में जा रहे थे । अल्टीमेट इंश्योरेंस के तौर पर उन्होंने अपने यूरेनियम रिजर्व का इस्तेमाल करके बम बनाना शुरू किया ।
1979 में इंडियन ओसियन में एक मिस्टीरियस लाइट देखी गई, जिसे इसराइल के साथ जॉइंट टेस्ट माना जाता है । 1980 तक उनके पास छह (6) फुल्ली फंक्शनल न्यूक्लियर बम आ चुके थे । लेकिन जब सोवियत यूनियन टूटा और नेल्सन मंडेला (Nelson Mandela) की नई गवर्नमेंट आने वाली थी, तो पुरानी सरकार डर गई । उन्होंने अपने सारे न्यूक्लियर वेपंस खुद डिस्मेंटल (नष्ट) कर दिए, यूरेनियम पिघला दिया और ब्लूप्रिंट्स डिस्ट्रॉय कर दिए । साउथ अफ्रीका दुनिया का अकेला मुल्क है जिसने न्यूक्स बनाए और फिर सब खत्म कर दिए ।
9. पाकिस्तान: ‘घास खाएंगे, लेकिन बम बनाएंगे’
1971 में इंडिया से आधा मुल्क (बांग्लादेश) गंवाने के बाद, प्राइम मिनिस्टर जुल्फिकार अली भुट्टो ने ऐलान किया कि अगर लोगों को घास भी खानी पड़ी, तब भी वो अपना न्यूक्लियर बम बनाएंगे । वो इंडिया को डोमिनेट नहीं करने देना चाहते थे ।
इस प्रोग्राम के हीरो डॉ. अब्दुल कदीर खान (A.Q. Khan) थे । वह नेदरलैंड्स की एक फैसिलिटी में मेटलर्जिस्ट थे ।
- उन्होंने अपनी क्लीयरेंस का फायदा उठाकर सेंट्रीफ्यूजेस के टॉप सीक्रेट ब्लूप्रिंट्स चुराए, उन्हें याद किया और पाकिस्तान ले आए ।
- चीन ने भी उनकी मदद की क्योंकि वह इंडिया को कंट्रोल में रखना चाहता था ।
- अमेरिका सब जानता था, लेकिन उसे अफगानिस्तान में सोवियत से लड़ने के लिए पाकिस्तान की जरूरत थी, इसलिए उसने आंखें बंद कर लीं ।
1998 में भारत के टेस्ट्स के ठीक बाद पाकिस्तान ने भी पहाड़ों (चगाई) में पांच न्यूक्लियर बम टेस्ट किए । भारत के विपरीत, पाकिस्तान की ‘फर्स्ट यूज़ पॉलिसी’ (First Use Policy) है, यानी अगर उन्हें लगा कि वो कन्वेंशनल वॉर हार रहे हैं, तो वो पहले भी मिसाइल लॉन्च कर सकते हैं ।
10. उत्तर कोरिया (North Korea): सबसे बड़ा खतरा
नॉर्थ कोरिया को अपनी रिजीम (Regime) बचानी थी । किम (Kim) फैमिली को लगता था कि बम के बिना अमेरिका उन पर अटैक कर देगा । सोवियत से एनर्जी के नाम पर मदद लेने के बाद वे सीक्रेसी में चले गए ।
नॉर्थ कोरिया वो अकेला मुल्क है जिसने ‘नॉन प्रोलिफरेशन ट्रीटी’ (NPT) साइन की, उसे तोड़ा और उससे विड्रॉ (Withdraw) करके न्यूक्लियर बम बनाया । कहा जाता है कि उन्होंने पाकिस्तान से डिज़ाइन्स खरीदे । 2006 में उनका पहला अंडरग्राउंड टेस्ट एक पार्शियल फेलियर था, लेकिन वो रुके नहीं । 2009, 2013 में बड़े बम और 2017 तक थर्मोन्यूक्लियर हाइड्रोजन बम टेस्ट किया । आज उनके पास इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइल्स (ICBMs) हैं जो थ्योरेटिकली अमेरिका तक पहुंच सकती हैं ।
क्या कहानी यहीं खत्म होती है?
दुनिया में सिर्फ ये 10 देश ही इस तकनीक से नहीं जुड़े हैं:
- शेयर्ड वेपंस: कोल्ड वॉर के दौरान अमेरिका ने बेल्जियम, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड्स और तुर्की में अपने न्यूक्स रखे । रशिया ने भी रिसेंटली टैक्टिकल वेपंस बेलारूस में भेजे हैं ।
- फेल हुए मुल्क: अर्जेंटीना और ब्राज़ील के पास मिलिट्री प्रोग्राम्स थे जो उन्होंने छोड़ दिए । स्वीडन और स्विट्ज़रलैंड ने भी इस पर गौर किया था ।
- मिडिल ईस्ट का संघर्ष: सद्दाम हुसैन के दौर में इराक का अपना प्रोग्राम था, जिसे इसराइल ने 1981 में ‘ऑपरेशन ओपेरा’ के तहत एयर स्ट्राइक करके तबाह कर दिया । 2007 में इसराइल ने सीरिया में भी एक फैसिलिटी पर बम गिराया (जो नॉर्थ कोरिया की मदद से बन रही थी) । अब इसराइल के लिए सबसे बड़ा मसला ईरान है, जो यूरेनियम इनरिच कर रहा है ।
- थ्रेशहोल्ड स्टेट (Threshold State): जापान को एक्सपर्ट्स ‘थ्रेशहोल्ड स्टेट’ कहते हैं । जापान के पास रॉकेट टेक्नोलॉजी और प्लूटोनियम के बड़े रिज़र्व हैं । उनका पैसिफिस्ट कॉन्स्टिट्यूशन उन्हें रोकता है, लेकिन अगर वे चाहें तो कुछ ही महीनों में न्यूक्लियर वेपंस बना सकते हैं ।
समंदर की गहराइयों का डरावना सच (The Power of Submarines)
जमीन पर ट्रीटीज (Treaties) और इंस्पेक्शन होते हैं, लेकिन असल ताकत समंदर की गहराई में है । अमेरिका, रशिया, यूके, चाइना, फ्रांस और इंडिया—सब न्यूक्लियर आर्म्ड सबमरींस (Submarines) ऑपरेट करते हैं । ये पनडुब्बियां महीनों तक पानी के अंदर रहती हैं और इन्हें ट्रैक करना नामुमकिन है । इसका मतलब है कि अगर कोई देश मैप से मिट भी जाए, तो उसकी सबमरीन दुनिया में कहीं से भी पलटवार (Retaliatory Strikes) कर सकती हैं ।
इसे ‘म्यूचुअली अशोर्ड डिस्ट्रक्शन’ (Mutually Assured Destruction – MAD) कहा जाता है । यही वो खतरनाक लॉजिक है जिसने दुनिया को डराकर 80 सालों से अमन कायम रखा हुआ है । जो टेक्नोलॉजी जर्मनी की एक लैब से शुरू हुई थी, वो आज दुनिया के हर कोने में है । न्यूक्लियर क्लब एक से बढ़कर 10 देशों तक पहुँच गया है । तकनीक भले पुरानी हो गई हो, लेकिन ब्लूप्रिंट्स हर तरफ मौजूद हैं ।
आज के दौर में किसी भी नए मुल्क को परमाणु बम बनाने से रोकने वाली वाहिद चीज सिर्फ पॉलिटिक्स है, साइंस नहीं ।









