बचपन में सुनता था, सोनपुर मेला में क्या नहीं मिलता है। हाथी, घोड़ा, ऊंट से लेकर दुनिया का जो सामान चाहो मिल जायेगा। यह महज कहावत नहीं थी। सच में ऐसा था।
- पशु बिक्री पर रोक से प्रभावित हुआ मेलाः
- सोनपुर मेला के हाथी बाजार सुनसानः
- सोनपुर मेला के घोड़ा बाजार में उमड़ती है भीड़
- सोनपुर मेला में बैल के बाजार में आते हैं वीआइपी
- सोनपुर मेला से गायब हो गई गाय और भैसः
- सिमट रहा ऐतिहासिक सोनपुर मेलाः
- 716 वर्ष का हो गया सोनपुर मेला
- राजनीतिक गतिविधियों का भी केंद्र रहा है सोनपुर मेला
- अफगान से लेकर ढाका तक के सामान की होती थी बिक्री
सोनपुर मेला ही एकमात्र ऐसा मेला था, जहां हाथी भी बिकते थे। इस मेले का नाम दूर-दूर तक प्रसिद्ध था।
जहां लोग मेला घुमने तो आते ही थे, साथ ही खरीदारी भी भरपूर करते थे। ग्रामीण परिवेश के बीच से शुरू हुआ यह मेला लोगों को उनकी जरूरत की हर चीज उपलब्ध कराता था।
इतना ही नहीं, मनोरंजन के लिए उस जमाने यहां एक से एक नाट्य मंडलियां पहुंचती थी। मतलब एक ही मेले में खरीददारी, मनोरंजन और शौक की चीजें सब कुछ उपलब्ध थीं।
धीरे-धीरे समय के साथ मेले का स्वरूप बदलता चला गया।
पशु बिक्री पर रोक से प्रभावित हुआ मेलाः
विश्व प्रसिद्ध एशिया के सबसे बड़े पशु मेला के रूप में पहचान बनाने वाले हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला पर वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम के शिकंजे का व्यापक असर दिख रहा है।
कभी इस मेले में खरीद बिक्री के लिए या जल क्रीड़ा के लिए बड़ी संख्या में हाथी, घोड़े, चिड़िया, बैल, गाय आदि के बाजार लगते थे।
लेकिन सरकार की उपेक्षा पूर्ण नीति और कृषि क्षेत्र में लगातार हो रहे वैज्ञानिक प्रयोगों ने बदलते परिवेश में मेले के लोकप्रिय स्वरूप पर गहरा प्रभाव डाला है।
वहीं वन विभाग द्वारा भी मेला में हाथी, पशु-पक्षी आदि खरीद बिक्री के साथ-साथ उन्हें मेला में लाकर रखने की अनुमति नहीं दिए जाने के कारण मेला के पशु बाजार में हाथी और ऊंट अब नहीं पहुंच रहे हैं।
वन प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत सोनपुर मेला क्षेत्र के 10 किलोमीटर की परिधि में हाथी समेत विभिन्न जानवरों एवं पक्षियों के खरीद बिक्री के साथ-साथ परिवहन पर रोक है।
नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
सोनपुर मेला के हाथी बाजार सुनसानः
सोनपुर मेला में वन्यप्राणी संरक्षण कानून ने पशु मेला में लगने वाले हाथी बाजार को सुनसान बना दिया है।
मेले में हाथियों को लाने और रखने पर प्रतिबंध होने के कारण अब यहां हाथी नहीं आते। इस वजह से मेला आने वाले श्रद्धालुओं को पवित्र स्नान के दौरान या बाद में हाथियों की जलक्रीड़ा का नजारा देखने को भी नहीं मिलता।
वैसे हाथी पालक जो लघु कालिक सांस्कृतिक रीति रिवाज के लिए मेले में हाथी लाना चाहते है उन्हें भी वन प्रमंडल पदाधिकारी से पूर्व में आवेदन देकर अनुमति लेनी पड़ती है।
इस बार भी सोनपुर मेले में पशु एवं पक्षियों के विभिन्न बाजारों में पशु नदारद रहे है।
सोनपुर मेला के घोड़ा बाजार में उमड़ती है भीड़
सोनपुर मेला में अब ऊंट भी नहीं आते। पिछले कुछ वर्षों से यहां एक भी ऊंट बिक्री के लिए नहीं आ रहे। हालांकि घोड़ों ने मेले की लाज बचा रखी है।
घोड़ा बाजार में अब भी खाली जगह नहीं बचती। घोड़ा बाजार हर जगह तंबू और शामियाने से पटा रहता है।
बताते चलें कि कभी मुगल और ब्रिटिश काल में काबुल के घोड़ा इस मेले की जान हुआ करते थे।
पर ये भी अब मेले में नहीं आते। आजादी के बाद इनका आना बंद हो गया है। हां यह जरूर है कि मेले में अब भी घोड़े आ रहे हैं और घोड़ों के प्रेमी भी पहुंच रहे हैं।
घोड़े विक्रेताओं के अलावा घोड़े प्रेमियों भी अपनी शानो-शौकत के साथ मेले में डेरा डालते हैं और मेले की रौनक बढ़ाते हैं।
घोड़े प्रेमियों के तंबू में बंधे कीमती घोड़े अपने स्वामी की महिमा का बखान करते दिख ही जाते हैं।
सोनपुर मेला में बैल के बाजार में आते हैं वीआइपी
मेले में लगने वाला बैल बाजार एवं घोड़ा बाजार आज भी इस मेले में अपना आकर्षण बरकरार रखे हुए है।
मेले में लगने वाला बैल बाजार अपनी रौनक बिखेर रहा है। पहले की तुलना में यहां हजारों की तादाद में सुन्दर व गठीले बैल देखने को तो नहीं मिलते, पर जितने भी बैल आते है उनसे यह बाजार गुलजार रहता है।
हीरा मोती, राम श्याम और न जाने कितने ऐसे ही नाम वाले देशी बैल के जोड़े बिकने के लिए तैयार मिलते है।
गांव देहात के किसानों से लेकर बड़े-बड़े वीआइपी गृहस्थ भी यहां बैल खरीदने पहुंचते हैं।
बैलों के शौकीन और बैल विक्रेता विपिन साह, छबीला राय, सूरज राय आदि बताते हैं कि बैल बाजार में 2.5 लाख से लेकर 46000 तक के बैल उपलब्ध रहते हैं।
बैल बाजार में व्यवसाय की संस्कृति आज भी कायम है।
सोनपुर मेला से गायब हो गई गाय और भैसः
आश्चर्यजनक बात है कि इस मेले में गाय और भैसें अब पूरी तरह गायब हो गई हैं। इसका कारण लोग बताते हैं कि खरीदनेवालों को जब जरूरत होती है, तो बाहर ही मोलभाव कर खरीद लेते हैं।
अब मेले तक का इंतजार नहीं करते। यही कारण है कि यहां बैल तो मिल जाते हैं पर गाय भैस नहीं मिलतीं।
वहीं आज भी सोनपुर मेले में बकरी बाजार की रौनक देखते ही बनती है। बकरी बाजार में साइज के अनुसार ही बकरियों के दाम तय होते हैं।
कई बकरियां अपने साइज से ग्राहकों को लुभाती हैं। हरिहरनाथ द्वार से 100 मीटर पश्चिम गाय बाजार के समीप ही बकरी बाजार सजता है।
यहां राजस्थानी बकरियों की बिक्री खूब होती है। उत्तर प्रदेश के रायबरेली के अलावा कई प्रसिद्ध जिलों से बकरी के व्यापारी यहां राजस्थानी बकरियों को लेकर पहुंचते हैं।
यहां 10 हजार से लेकर 80 हजार तक की बकरियां मिल जाती हैं। स्थानीय स्तर की बकरी 600 से 800 प्रति किलो की दर से बिकती हैं।
सिमट रहा ऐतिहासिक सोनपुर मेलाः
कभी अपनी भव्यता को लेकर प्रसिद्ध सोनपुर मेला अब छोटे से दायरे में सिमट कर रह गया है।
अब ना पशु मेले की वैसी रौनक रह गयी है और ना ही प्रशासन के आला अधिकारियों का जमावड़ा होता है।
मगर, मेले का इतिहास काफी पुराना है। इसके इतिहास को लेकर कई दावे किये जाते रहे हैं।
उनमें से एक पुराना दावा और प्रमाणिक दावा हरिहर नाथ मंदिर के चबुतरे पर लगा शिलापट्ट के आधार पर है।
शिलापट्ट 1306 ई0 का है. उसमें कहा गया है कि हरिहर नाथ मंदिर सनातन से है और यहां कार्तिक पूर्णिमा का उत्सव होता है।
716 वर्ष का हो गया सोनपुर मेला
सोनपुर का ये मेला अब 716 वर्ष पुराना हो गया है। इतिहास के जानकार स्थानीय निवासी बताते हैं कि पुराने समय में मेले में सुई से लेकर दैनिक उपयोग में सभी वस्तुएं मिलती थीं।
अंग्रेजी काल में इसे पशु मेला बना दिया गया था। मेले का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम से भी जुड़ा है।
सन 1857 की क्रांति दबने के बाद भारत के वायसराय लार्ड मेयो ने वर्ष 1871 में यहां दरबार लगाया था।
उसके दरबार में नेपाल के तत्कालीन राजा राणा जंग बहादुर का महिमा मंडन किया गया था, क्योंकि उन्होंने 1857 की क्रांति को दबाने में अंग्रेजों की मदद की थी।
इससे पहले वर्ष 1846 में सोनपुर में ही हरिहर क्षेत्र रिजोल्युशन पास किया गया था। इसमें पीर अली, वीर कुंअर से लेकर ख्वाजा अब्बास आदि लोग थे।
वहीं लोगों में जनश्रुतियां हैं कि चन्द्रगुप्त मौर्य, अकबर और 1857 के गदर के नायक वीर कुंवर सिंह ने भी से यहां हाथियों की खरीद की थी।
लोग वीर शिवाजी द्वारा भी यहां से घोड़ा खरीदने की बात करते हैं। हालांकि इन बातों का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
राजनीतिक गतिविधियों का भी केंद्र रहा है सोनपुर मेला
1908 में सोनपुर मेले में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की एक महत्वपूर्ण बैठक खान बहादुर नवाब सरफराज हुसैन की अध्यक्षता में हुई।
इस बैठक में बिहार कांग्रेस की स्थापना की गई थी। सोनपुर मेला के प्रांगण में ही 1929 में स्वामी सहजानंद सरस्वती की अध्यक्षता में ‛बिहार राज्य किसान सभा’ की नींव पड़ी थी।
अफगान से लेकर ढाका तक के सामान की होती थी बिक्री
अंग्रेजों के समय कलकत्ते की दुकान में लंदन की जो बेहतरीन डिजाइन की वस्तुओं की बिक्री होती थी, सोनपुर मेले में उसे बेचने के लिए लाया जाता था।
हार्ट ब्रदर्स जो एक बहुत अच्छा घोड़ा व्यापारी थे, वे विभिन्न नस्लों के घोड़ों को सोनपुर मेले में लाते थे।
नेपाल और तिब्बत से छोटे-छोटे कुत्ते, चमड़े और जंगली वस्तुएं आया करतीं थीं। मिंडेन विल्सन अपने इतिहास लेखन में लिखते हैं कि ‘टाट और तंबुओं से बने दुकानों में न सिर्फ दिल्ली, कश्मीर और कानपुर के व्यापारियों ने अपनी दुकान लगाई थी, बल्कि अफगानिस्तान का माल भी बेचा जा रहा था।
ढाका के मशहूर जुलाहों की बेशकीमती सिल्क के कपड़े भी यहां बिकते थे।
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