Vir Kuwar Singh: 1857 में वीर कुंवर सिंह की भूमिका

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Vir Kuwar Singh: 1857 में वीर कुंवर सिंह की भूमिका

1857 के महानायक वीर कुंवर सिंह ने हिला दी थी अंग्रेजों की नींव

महानायक कुवंर सिंह 1857 के बिहार के क्रांतिकारियों के प्रमुख नेता और सबसे ज्वलंत व्यक्तियों में थे।

कुंवर सिंह का जन्म साल 1777 में बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर में हुआ था। उनके पिता साहबजादा सिंह प्रसिद्ध शासक भोज के वंशजों में से थे।

उनके पिता की साल 1826 में मृत्यु हो गई, जिसके बाद वह जगदीशपुर के तालुकदार बने। वह गुर्रिल्ला युद्ध शैली में काफी कुशल थे जिसका प्रयोग उन्होंने 1857 की क्रांति में किया।

कुंवर सिंह जब अंग्रेजों से लड़े, तब उनकी उम्र 80 साल थी। उन्होंने अपनी उम्र को खुद पर हावी नहीं होने दिया और अंग्रेजों को डटकर मुकाबला किया।

1857 के महानायक वीर कुंवर सिंह ने अंग्रेजों की नींव हिलाकर कर रख दी थी। उनका खौफ ऐसा था कि अंग्रेजों ने उन पर ईनाम की घोषणा कर दी थी।

व्रिटिश हुकुमत ने पर्चा जारी कर कहा था कि उस व्यक्ति को 25 हजार रुपए पुरस्कार में दिए जाएंगे, जो बाबू कुंवर सिंह को जीवित अवस्था में किसी ब्रिटिश चौकी अथवा कैंप में सुपुर्द करेगा’।

गवर्नर जनरल भारत सरकार के सचिव के हस्ताक्षर से 12 अप्रैल, 1858 की इस घोषणा से यह साबित होता है कि अंग्रेज सरकार इस महानायक से कितना डरी हुई थी।

वह उन्हें जीवित पकड़ना चाहती थी पर हमेशा असफल रही। कुंवर सिंह को ‘बाबू साहब’ और ‘तेगवा बहादुर’ के नाम से संबोधित किया जाता है।

होली के अवसर पर विशेषकर भोजपुरी भाषी एक गीत गाते है-‘बाबू कुंवर सिंह तेगवा बहादुर, बंगला में उड़ेला अवीर’।

27 जुलाई, 1857 को दानापुर छावनी से विद्रोह कर आए सैनिकों ने बाबू कुंवर सिह का नेतृत्व स्वीकार किया था।

उन्होंने आरा के उस ब्वायल कोठी जिसे आरा हाउस भी कहते थे, उसे घेर लिया था। यहां अंग्रेज छिपे थे।

अंग्रेजों की रक्षा हेतु 29 जुलाई को डनबर के नेतृत्व में दानापुर से सेना भेजी गई। युद्ध में डनबर मारा गया।

डनबर के मारे जाने की सूचना मिलने पर मेजर विसेंट आयर, जो स्टीमर से प्रयागराज जा रहा था, बक्सर से वापस आरा लौटा और दो अगस्त को चर्चित ‘बीबीगंज’ का युद्ध हुआ।

आरा पर नियंत्रण के बाद आयर ने 12 अगस्त को जगदीशपुर पर आक्रमण कर दिया।

हासिल किया अपना गढ़ः

14 अगस्त, 1857 को जगदीशपुर हाथ से निकल जाने के बाद कुंवर सिंह अपने 1200 सैनिकों को लेकर एक महाअभियान पर निकल पड़े।

रोहतास, रीवां, बांदा, ग्वालियर, कानपुर, लखनऊ होते हुए 12 फरवरी, 1858 को अयोध्या तथा 18 मार्च, 1858 को आजमगढ़ से 25 मील दूर अतरौलिया नामक स्थान पर आकर डेरा डाला।

उनके काफिले में 1,000 सैनिक और 2,500 समर्थकों के होने का उल्लेख मिलता है।

आजमगढ़ आने का उनका उद्देश्य शत्रु को पराजित कर प्रयागराज एवं बनारस पर आक्रमण करते हुए अपने गढ़ जगदीशपुर पर पुन: अपना अधिकार स्थपित करना था।

बाबू कुंवर सिह छापामार युद्ध में निपुण थे, अत: आठ माह तक अंग्रेज उनका मुकाबला करने से बचते रहे।

अंग्रेजों को जब उनकी योजना का पता चला तो तुरंत मिलमैन 22 मार्च को सेना लेकर मुकाबले के लिए आया और कुंवर सिंह ने चकमा देकर उस पर आक्रमण कर दिया।

मिलमैन की मदद के लिए आए कर्नल डेम्स को भी 28 मार्च को हार का सामना करना पड़ा।

मिलमैन और डेम्स की फौज कुंवर सिंह की फौज से पराजित हो चुकी थी। इस पराजय से बेचैन लार्ड कैनिंग ने मार्ककेर को युद्ध के लिए भेजा।

500 सैनिकों और आठ तोपों से सुसज्जित मार्ककेर की सहायता हेतु सेनापति कैंपबेल ने एडवर्ड लगर्ड को भी आजमगढ़ पहुंचने का आदेश दिया।

तमसा नदी के तट पर हुए इस युद्ध में लगर्ड पराजित हुआ।

एक वार से काट दी भुजा :

लगातार हार से घबराई अंग्रेजी हुकूमत ने सेनापति डगलस को भेजा। नघई नामक गांव के पास डगलस और कुंवर सिंह की सेना में संघर्ष हुआ।

डगलस भी कुंवर सिंह को पकड़ने में नाकाम रहा। 21 अप्रैल, 1858 को बाबू साहब शिवपुर घाट होकर गंगा नदी पार करने लगे, तभी किसी अंग्रेजी सैनिक की गोली बाबू साहब को लग गई।

तब उन्होंने अपनी कटी बांह को मां गंगा में प्रवाहित कर 22 अप्रैल को अपने दो हजार साथियों के साथ जगदीशपुर में प्रवेश किया।

‘भारत में अंग्रेजी राज’ पुस्तक के लेखक सुंदरलाल के अनुसार, ‘बाबू साहब ने बाएं हाथ से तलवार खींचकर घायल दाहिने हाथ को खुद एक वार में कोहनी से काट कर गंगा में फेंक दिया।

जिससे भयभीत अंग्रेज सेना बाबू साहब का पीछा करने की साहस तक नहीं जुटा पाई थी।’

बाबू साहब के जगदीशपुर पहुंचने की सूचना मिलने पर 23 अप्रैल को कैप्टन लीग्रैंड ने आधुनिकतम एनफील्ड राइफलों एवं तोपों के साथ आक्रमण किया, मगर युद्ध में मारा गया।

शरीर में जहर फैल जाने के कारण 26 अप्रैल को बाबू साहब का स्वर्गारोहण हुआ।

बाबू कुंवर सिंह के स्वर्गारोहण के बाद भी उनके छोटे भाई अमर सिंह ने जगदीशपुर की स्वतंत्रता बचाए रखी।

ऐसे बनें 1857 के नायकः

15 अगस्त, 1857 से 10 फरवरी, 1858 के मध्य बाबू कुंवर सिंह ने अपनी अविराम स्वतंत्र चेतना से युक्त स्वाधीनता की यज्ञाग्नि प्रज्वलित रखी।

कुंवर सिंह के वंशज उज्जैन के परमार वंश के क्षत्रिय थे। इसी वंश के राजा भोज ने भोजपुरी बोली का विकास और विस्तार किया था।

अत: वे भोजपुरी भाषी कुंवर सिंह के लिए सर्वस्व न्योछावर करने हेतु कटिबद्ध थे।

लेखक सुंदरलाल ने अपनी पुस्तक में यह भी लिखा है कि, ‘17 अक्टूबर, 1858 को जब अंग्रेजों ने जगदीशपुर पर सभी दिशाओं से आक्रमण किया तो महल की 150 स्त्रियों ने शत्रु के हाथ में पड़ना गंवारा न किया और तोपों के मुंह के सामने खड़ी होकर ऐहिक जीवन का अंत कर लिया था।’

क्या था 1857 का संग्रामः

1857 का संग्राम ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक बड़ी और अहम घटना थी। इस क्रांति की शुरुआत 10 मई, 1857 को मेरठ से हुई, जो धीरे-धीरे बाकी स्थानों पर फैल गई।

वैसे तो संग्राम में कई लोगों ने अपनी जान की बाजी लगाई लेकिन अंग्रेजों के साथ लड़ते हुए अपने क्षेत्र को आजाद करने वाले एकमात्र नायक बाबू वीर कुंवर सिंह थे।

उन्होंने 23 अप्रैल, 1858 को शाहाबाद क्षेत्र को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराया था।

उन्होंने जगदीशपुर के अपने किले पर फतह पाई थी और ब्रिटिश झंडे को उतारकर अपना झंडा फहराया था। उसी आजादी का पारंपरिक विजयोत्सव दिवस 23 अप्रैल को मनाया जाता है।

80 साल की उम्र में अंग्रेजों से लड़ेः

1857 के संग्राम के दौरान पटना एक अहम केंद्र था जिसकी शाखाएं चारों ओर फैली थीं। पटना के क्रांतिकारियों के मुख्य नेता पीर अली को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी जिसके बाद दानापुर की देसी पलटनों ने स्वाधीनता का घोषणा कर दी।

ये पलटनें जगदीशपुर की तरफ गईं और कुंवर सिंह ने इनका नेतृत्व संभाला। तब उनकी उम्र 80 साल थी।

80 साल की उम्र में भी उन्होंने अंग्रेजों की चुल हिला दी थी। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ कई कामयाबी हासिल कीं।

उन्होंने आरा में अंग्रेजी खजाने पर कब्जा किया। जेलखाने के कैदी रिहा किए। उन्होंने आजमगढ़ पर कब्जा किया।

इतना ही नहीं लखनऊ से भागे कई क्रांतिकारी भी कुंवर सिंह की सेना में आ मिले थे।

जब एक हाथ से लड़े कुंवर सिंह

अप्रैल 1958 में नाव के सहारे गंगा नदी पार करने के दौरान अंग्रेजों ने कुंवर सिंह पर हमला कर दिया था।

वह नदी पार करते समय अपने पलटन के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिकों से घिर गए थे। इस क्रम में उनके हाथ में गोली लग गई।

गोली उनकी बायीं बांह में लगी। गोली लगने के बाद उन्होंने अपने ही तलवार से हाथ काटकर उसे गंगा नदी में अर्पित कर दिया।

हालांकि, घायल होने के बावजूद उनकी हिम्मत नहीं टूटी और जगदीशपुर किले को फतह कर ही दम लिया।

एक ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने उनके बारे में लिखा है, ‘यह गनीमत थी कि युद्ध के समय उस कुंवर सिंह की उम्र 80 थी।

अगर वह जवान होते तो शायद अंग्रेजों को 1857 में ही भारत छोड़ना पड़ता।’

अंग्रेज भी करते थे प्रशंसा :

आरा/ब्वायल कोठी की लड़ाई एक सप्ताह चली। ‘टू मंथ्स इन आरा’ के लेखक डा. जान जेम्स हाल ने आरा हाउस का आंखों देखा दृश्य लिखते समय यह स्वीकार किया है कि कुंवर सिंह ने ‘व्यर्थ की हत्या नहीं करवाई।

कोठी के बाहर जो ईसाई थे वे सब सुरक्षित थे।’ विनायक दामोदर सावरकर द्वारा लिखित अमर ग्रंथ ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ में जिन सात योद्धाओं के नाम से अलग खंड की रचना की गई है, उसमें से एक खंड बाबू कुंवर सिंह और उनके छोटे भाई अमर सिंह को समर्पित है।

बाबू कुंवर सिंह पर इतिहासकार के.के. दत्त की भी पुस्तक है पर फिर भी इतिहास के इस महानायक पर जितना लिखा जाना चाहिए, उतना नहीं लिखा गया।

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