Jan Nayak Karpuri Thakur: जननायक कर्पूरी ठाकुर की जीवनी

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जननायक कर्पूरी ठाकुर की जीवनी

कर्पूरी ठाकुर जीते जी बन गये जन नायक

इसी साल देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से जननायक ‘कर्पूरी ठाकुर’ को नवाजा गया। कर्पूरी ठाकुर की पहचान दलितों के नेता के रूप में की जाती है।

उन्होंने समाज के लिए सारी जिंदगी दावं पर लगी दी। इसीलिए उन्हें जननायक भी कहा जाता है।

स्वतंत्रता सेनानी और अध्यापक के रूप में अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले कर्पूरी ठाकुर एक बार बिहार के उपमुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री रहे हैं।

इसके साथ कर्पूरी ठाकुर दशकों तक विधायक और विरोधी दल के नेता रहे हैं।

वहीं अपनी लोकप्रियता और गरीबों की आवाज बनने के कारण उन्हें जीते जी जननायक की उपाधि मिली थी।

इस वर्ष भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक और राजनीतिज्ञ कर्पूरी ठाकुर की 100वीं जयंती मनाई जा रही हैं।

आइए अब हम जननायक कर्पूरी ठाकुर का जीवन के बारे में जाने।

संक्षिप्त परिचयः

नाम- कर्पूरी ठाकुर

जन्म- 24 जनवरी, 1924

जन्म स्थान- कर्पूरीग्राम, समस्तीपुर, बिहार

शिक्षा- पटना विश्वविद्यालय

पेशा- स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक, राजनीतिज्ञ

पार्टी- सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी

पुरस्कार एवं सम्मान- ‘भारत रत्न’

निधन- 17 फरवरी, 1988

एक नजर में कर्पूरी ठाकुर का जीवन परिचयः

• बिहार के समस्तीपुर जिले में हुआ जन्म

• 1952 में जीता विधानसभा चुनाव

• दो बार रहे बिहार के मुख्यमंत्री

• अंग्रेजी की अनिवार्यता को किया समाप्त

• दिल का दौरा पड़ने से हुआ निधन

स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा रहे कर्पूरी ठाकुर :

जननायक कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी, 1924 को बिहार के समस्तीपुर जिले में पितौंझिया गांव (वर्तमान कर्पूरीग्राम) में हुआ था।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव से ही हुई और वर्ष 1942 में ‘पटना विश्वविद्यालय’ में आने के बाद वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बन गए।

उस दौरान गांधी के आंदोलन में भाग लिया। इस कारण वह अंग्रेजों की नजर में भी आ गये थे।

1952 में कर्पूरी ठाकुर जीते विधानसभा चुनावः

भारतीय गणतंत्र के प्रथम आम चुनाव में कर्पूरी ठाकुर समस्तीपुर की ताजपुर विधानसभा सीट से चुनाव जीते थे।

वहीं इसके बाद वह कभी बिहार विधानसभा का चुनाव नहीं हारे और दशकों तक विधायक और विरोधी दल के नेता रहे।

दो बार रहे बिहार के मुख्यमंत्री

कर्पूरी ठाकुर अपने राजनीतिक जीवन में एक बार बिहार के उपमुख्यमंत्री और दो बार मुख़्यमंत्री रहे।

किंतु दोनों बार ही मुख़्यमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल पूरा न कर सके। वर्ष 1970 में उन्होंने प्रथम बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली लेकिन उनका कार्यकाल केवल 163 दिन का रहा।

वहीं दूसरी बार जब वह सन 1977 में जीत कर आए उस दौरान भी उनका कार्यकाल अधूरा ही रहा।

किंतु ईमानदार छवि और गरीबों की आवाज बनने वाले कर्पूरी ठाकुर ने जो छाप बिहार के समाज पर छोड़ी उससे उनका नाम बिहार की राजनीति में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गया।

अंग्रेजी की अनिवार्यता को किया समाप्त

वर्ष 1967 में जब कर्पूरी ठाकुर बिहार के उप-मुख्यमंत्री थे उस दौरान केंद्र सरकार का राज्य सरकारों से पत्राचार अंग्रेजी भाषा में हुआ करता था।

जिसका कर्पूरी ठाकुर ने विरोध किया और बिहार में अंग्रेजी में पत्राचार की अनिवार्यता को समाप्त किया।

इसके बाद से ही बिहार के सभी विभागों में हिंदी में पत्राचार का दौर शुरू हुआ। इसके अलावा उन्होंने उर्दू को राज्य की दूसरी राजकीय भाषा का दर्जा दिलाया था।

मैट्रिक तक की पढ़ाई मुफ्त कराईः

कर्पूरी ठाकुर देश के पहले मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने अपने राज्य में मैट्रिक तक मुफ्त पढ़ाई की घोषणा की थी।

इसके साथ ही उनके अथक प्रयासों द्वारा मिशनरी स्कूलों में हिंदी पढ़ाना शुरू हुआ था।

दिल का दौरा पड़ने से हुआ निधनः

कर्पूरी ठाकुर कई दशकों तक बिहार की राजनीति का अहम हिस्सा रहे। इसके साथ ही वह गरीब-गुरबों की आवाज बने।

वहीं अपने जीवन काल में ही उन्हें जननायक की उपाधि से सुशोभित किया गया। कर्पूरी ठाकुर का दिल का दौरा पड़ने से 17 फरवरी, 1988 को 64 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

इस वर्ष जननायक कर्पूरी ठाकुर की 100वीं जयंती मनाई जा रही है।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न सम्मान की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्पूरी ठाकुर को सामाजिक न्याय का पथप्रदर्शक बताया है।

राजनीति में ईमानदारी ने बनाया जननायकः

अपने जीवनकाल में कर्पूरी ठाकुर के इतने अहम पदों पर रहने बावजूद उनके पास न तो घर था और ना ही कोई गाड़ी। यहां तक कि उनके पास अपनी पैतृक जमीन भी नहीं थी।

राजनीति में ईमानदारी, सज्जनता एवं लोकप्रियता ने कर्पूरी को जननायक बना दिया था। कर्पूरी का निधन 64 वर्ष की उम्र में 17 फरवरी 1988 को हुआ था।

कर्पूरी ने आजीवन कांग्रेस के विरुद्ध राजनीति की थी। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी उन्हें गिरफ्तार करने में कामयाब नहीं हो पाई।

कर्पूरी सर्वोच्च पद पर पिछड़े समाज के व्यक्ति को देखना चाहते थे। कर्पूरी राजनीति में परिवारवाद के प्रबल विरोधी थे।

ठाकुर ने जीवित रहने तक उन्होंने अपने परिवार के किसी सदस्य को राजनीति में नहीं आने दिया।

देश में लोकसभा चुनाव सिर पर है। इससे पहले केंद्र सरकार ने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से सम्मानित किया है।

ऐसे में इस फैसले को राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। केंद्र सरकार का यह फैसला कई मायनों में अहम है।

कारण कि यह वर्ष कर्पूरी ठाकुर का जन्मशताब्दी वर्ष है। सभी दल अपने-अपने हिसाब से उनकी जयंती मनाने के लिए समारोह-कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं।

जानकार मानते हैं कि देश के सभी दल, बल्कि खासतौर पर बिहार की राजनीतिक पार्टियां खुद को कर्पूरी ठाकुर की सियासी जमीन और प्रभाव के करीब दिखाने की कोशिश में हैं। चुनावों के नजदीक आने पर ऐसा होना स्वाभाविक भी है।

बिहार में इन कार्यक्रम के जरिए करीब-करीब सभी छोटे-बड़े दल कर्पूरी को अपना बताने की होड़ में है।

वह अंत्योदय समाज के प्रति जननायक के योगदान को याद कर रहे हैं। सभी ठाकुर के असली वारिस होने का दावा कर रहे हैं।

भारत रत्न देश का सर्वोच्च सम्मान है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्पूरी को यह सम्मान देने की घोषणा के बाद उन्हें सामाजिक न्याय का पथप्रदर्शक बताया है।

पीएम ने कहा कि कर्पूरी को यह सम्मान उनके योगदान के लिए तो है ही, एक न्यायपूर्ण समाज के लिए काम करते रहने के लिए भी हमें प्रेरित करेगा।

इधर, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि केंद्र सरकार ने बिल्कुल सही फैसला किया है। जनता दल यूनाइटेड की सालों पुरानी मांग अब पूरी हो गई है।

चुनावी वर्ष में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के लिए कर्पूरी इसलिए भी प्रासंगिक हो गए हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वह जिस समाज से आते हैं, उसकी बिहार में आबादी सबसे ज्यादा है।

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